जब से नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये हैं , सांप्रदायिक ताकतों को एक खुला मैदान मिल गया है जिसमे बीजेपी और संघ के अनुषांगिक संगठन विभिन्न तरीकों से नए नए खेल खेल कर देश में अपना सांप्रदायिक एजेंडा लागू करने के अनवरत प्रयास में निशि दिन लगे हुए हैं .आगामी 21 जून को देश में ” योग-दिवस ” मनाने की घोषणा उसी सांप्रदायिक परियोजना का एक हिस्सा है /// .

आर एस एस की मुस्लिम -विरोधी रणनीति की खासियत यह है कि अगर मुसलमान उसका विरोध न करें तो भी उसमे जीत आरएसएस की ही है , और अगर मुसलमान उसका विरोध करें तो भी बाज़ी उसी के हाथ में रहती है . मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने इस मुद्दे पर अपना विरोध व्यक्त करते हुए कहा कि उसका विरोध योगा से नहीं है , वरन ” सूर्य नमस्कार ” से है क्योकि ऐसा करना इस्लाम की तौहीद की अवधारणा के खिलाफ है . बोर्ड की आपत्ति को मानते हुए अब इस कार्यक्रम से सूर्य नमस्कार को हटा दिया गया है .ओवैसी की पार्टी मीम ने भी इसका विरोध किया है . सवाल यह उठाता है कि आखिर इसके पीछे संघ की दोहरी नीति क्या है . ? संघ जानता है कि अगर ऐसे मुद्दे उछाले जायेंगे तो मुसलमान उसका विरोध करेंगे . जैसे ही मुसलमान उसका विरोध करेंगे , देश के हिन्दुओं में तुरंत इसका यह सन्देश जायेगा कि मुसलमान इस देश की परम्पराओं अर्थात हिन्दू परम्पराओं या हिन्दू -धर्म से सम्बंधित हर बात का विरोध करते हैं .यह बात हिंद्दुओं के मन में मुसलमानों के लिए एक अलगाव की भावना पैदा करेगी .वह समझने लगेगा कि मुसलमान कभी भी इस देश में हिन्दू समाज के साथ समरस बन कर रहना नहीं चाहता , वह हमेशा उसका विरोध करता है और देश की मुख्यधारा से कटा कटा रहता है . इस तरह एक हिन्दू के मन में मुसलमानों की राष्ट्र निष्ठां संदिग्ध हो जाएगी और जब आर एस एस कहेगा कि मुसलमान इस देश के प्रति समर्पित नहीं हैं और उनके लिए देश नहीं , उनका धर्म पहले है तो वह संघ के इस आरोप को सही मान लेगा और यही बात उसके और मुसलमानों के बीच एक अलगाव और दूरी पैदा कर देगी और यहीं पर आ कर संघ अपने एजेंडे में सफल हो जायेगा ///

. …जो लोग कहते हैं कि योग का हिन्दू-धर्म से कोई समबन्ध नहीं है और यह विशुद्ध रूप से एक शारीरिक व्यायाम के सिवा और कुछ नहीं है , वे गलती कर रहे हैं . योग की विचारधारा हिन्दू-धर्मशास्त्र का एक अंग है ,. योग न तो इस्लामी धर्म-संस्कृति का हिस्सा है , न इसाई , न सिख या किसी और धर्म-संस्कृति का . अगर शारीरिक व्यायाम की ही बात है तो सारी दुनिया जानती है कि ” नमाज़ ” भी एक प्रकार का शारीरिक व्यायाम है . क्या सरकार सारे स्कूलों में नमाज़ को अनिवार्य या अनिवार्य नहीं तो स्वैच्छिक तौर पर लागू करवा सकती है कि स्कूल के सारे बच्चे कयाम , रुकू , सजदा , कअदा जैसे रुक्न करते हुए व्यायाम करें , भले ही वे इस दौरान ” अल्लाह ” का नाम न लें ??? ज़ाहिर है , सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योकि नमाज़ चाहे शारीरिक व्यायाम है , मगर यह विशुद्ध रूप से इस्लाम का एक हिस्सा है . उसी तरह से चाहे योगा को आप कितना ही व्यायाम का नाम दें , यह हिन्दू-धर्म का एक अंग है , इसलिए इसे स्कूल में लागू करवाना निश्चित रूप से एक ” धर्मं निरपेक्ष राष्ट्र ” के सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे लागू करने का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ संघ के हिन्दू-राष्ट्र के एजेंडे को पिछले दरवाज़े से लागू करना है , इसके सिवा और कुछ भी नहीं ///

कल्पना कीजिये कि यदि किसी स्कूल में योग का आयोजन किया गया है . उस स्कूल के मुसलमान बच्चे यदि तौहीद के खिलाफ कुछ करते हैं तो संघ के लिए यह ख़ुशी की बात होगी कि उसने इनको अपनी मज़हब से कुछ देर के लिए ही सही , विचलित कर दिया . लेकिन यदि मुस्लिम बच्चे तौहीद के खिलाफ समझ कर योगा ( सूर्य नमस्कार ) नहीं करते , तब भी बाज़ी संघ के हाथों में ही रहेगी क्योकि ऐसा करने से स्कूल के बच्चों के बीच एक स्पष्ट धार्मिक-विभाजन तैयार हो जायेगा . स्कूल में बच्चों के दो ग्रुप बन जायेंगे , जिसमे एक ग्रुप सूर्य नमस्कार करने वालों का होगा और दूसरा ऐसा न करने वालों का होगा . हिन्दू बच्चे समझ जायेंगे कि मुसलमान हमसे अलग हैं ,इसलिए हमारे साथ योगा नहीं कर रहे हैं .. मुसलमान बच्चे के दिल में यह बात बैठ जाएगी कि हिन्दू जो काम करता है ,, मुसलमान को वह काम नहीं करना है . इस तरह बचपन से ही बच्चों के दिलों में अलगाव वाद के बीज बो दिए जायेंगे जिन पर संघ और भाजपा लगातार साम्प्रदायिकता की बारिश करते रहेंगे और आगामी आने वाले बरसों में वोटों की फसल काटने को तैयार रहेंगे ///

. सवाल यह उठाता है कि अगर अपने हिन्दू-वोटों की राजनीति के चलते संघ-भाजपा ऐसे शिगूफे उठाते ही रहेंगे , तो ऐसी हालत में क्या किया जाये .मेरा मानना तो यह है कि ऐसे मुद्दों पर मुसलमानों को देश और चेनलों पर हल्ला करने की बजाय चुपचाप अपने काम को अंजाम देना चाहिए . अगर स्कूल में यह कार्यक्रम आयोजित होते हैं तो मुसलमान अपने बच्चों से कहें कि बिना कोई शोर मचाये वे इस कार्यक्रम से खुद को अलग रखें . कोई बोर्ड या कोई मजलिस के प्रवक्ता टीवी चेनल्स पर आ कर शोर न मचाएं कि यह इस्लाम के खिलाफ है लिहाज़ा हम इसका विरोध करते हैं . बल्कि ख़ामोशी के साथ समाज के हर फर्द को शिक्षित किया जाये कि कौन सा कदम इस्लाम के खिलाफ है और किस काम को हमें ख़ामोशी से नज़रंदाज़ करते हुए आगे बढ़ना है और देश वासियों के साथ मिलकर रहना है , ताकि हिन्दुओं में यह सन्देश न जाये कि हम उनके हर क़दम का विरोध करते हैं और उनकी और हमारी पटरी कभी मेल नहीं खा सकती .एक हिन्दू भी समझता है कि हर धर्म की मान्यताएं अलग-अलग होती हैं , अतः यदि मुसलमान दूसरों की हवनों का सम्मान करते हुए किसी मान्यता पर अमल नहीं करता तो इसे उसका व्यक्तिगत मामला मानते हुए कोई अन्यथा नहीं लेता . बात तब बिगडती है जब अपनी मान्यताओं को बचाने के प्रयास में हम दूसरों की मान्यताओं पर हमला कर देते हैं और इस तरह उनकी नज़रों में हम कट्टरपंथी और ” पराये ” घोषित हो जाते हैं /// .

बीफ पर प्रतिबन्ध का मामला आपके सामने है . संघ-भाजपा को उम्मीद रही होगी कि बीफ प्रतिबन्ध के मामले में मुसलमान खुल कर विरोध करेंगे , सड़कों पर उतरेंगे और इसके बाद वे मुसलमानों को ” गौ-हत्यारों ” के रूप में पूरे देश में बदनाम कर देंगे . मगर ख़ुशी की बात है कि मुसलमानों ने समझदारी का परिचय दिया और इस मुद्दे को लेकर ना कोई शोर मचाया , न सड़कों पर उतरे . लिहाज़ा सांप्रदायिक ताकतों के मंसूबे फेल हो गए . यही कारण है कि हिंदुत्व का गढ़ समझे जाने वाले राजस्थान में बीफ पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया और विभिन्न कारणों को दर्शाते हुए वसुंधरा राजे सिंधिया ने बीफ की बिक्री को जारी रखने की अनुमति प्रदान कर दी /// .

इस देश में जब तक मुसलमान रहेगे , संघ-भाजपा के पास मुद्दों की कोई कमी नहीं रहेगी .आने वाले दिनों में फिर नए नए मुद्दे उछले जायेंगे , जिनका सम्बन्ध मुसलमानों से होगा . मुसलमानों को पूरी सावधानी और अक्लमंदी से काम लेना होगा और उनकी सांप्रदायिक-राजनीति को विफल करना होगा .इसी में मुसलमानों की भलाई है और इसी में इस महान देश की धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की दीर्घजीविता भी निहित है /// .

( मोहम्मद आरिफ दगिया ) 08/06/2015


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