आज 31-12-2015 यानी साल का आखिरी दिन। आखिरी दिन है तो यह भी लाजमी है कि हिसाब किताब लगाया जाये कि पिछले एक साल मे हमने क्या ख़ोया और क्या पाया ?? युं तो सबको पता है कि पिछले साल ने क्या क्या नही देखा । इतिहास के पन्ने सदीयों बाद भी पलटे जायेंगे तो साल 2015 के हिन्दुस्तान के इतिहास के काले पन्ने फिर दादरी मे नरभक्षकों के शिकार हुए अखलाक की दास्तां रो रोकर सुनायेगे और शायद हरियाणा मे जलाये गये दलित बच्चे के बारे मे बोलते वक्त तो इतिहास की जुबां भी उस खौफनाक मंजर को बयां करने मे शर्मींदगी महसुस करे ।

2015 मे शायद ही देश का कोई ऐसा कौना बचा हो जहां इंसान को सिर्फ इसलिये बेवजह मार दिया गया क्योंकि वो सत्ता समर्थित स्वर्ण वर्ग की आंखों मे नही सुहा रहा था । मरने वालै का गुनाह इतना ही था कि वो या तो दलित था या फिर स्वर्ण वर्ग द्वारा समझा जाने वाला दलित और देशद्रोही यानी मुस्लमान ।

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जान और माल गंवाने वालों की कमजोरी कहुं या एक वर्ग का दबदबा कि आज साल खत्म हो रहा है लेकिन अभी तक ईंसाफ और न्याय की बात भी जुमलों की तरह सिर्फ टिवी और अखबारों तक ही सीमित नजर आ रही है और मरने वालों को इंसाफ दिलाने के लिये लड रहे लोगों की उम्मीदें भी मरने लगी हैं।इसी साल मे यह भी देखा गया कि एक वर्ग विशेष द्वारा सताये जाने वाला सालों से धर्म की बंदीशों को झैल रहा दलित तबका इन घटनाओं से इतना तंग आ गया कि उसे अपनी मुल पहचान छोडने को मजबुर होना पडा और देश के अलग अलग शहरों से पता चला कि कोई ईसाई तो कोई मुस्लमान बन रहा है लेकिन यह तबका वो तो जो ना तो शिक्षीत था और ना ही आर्थिक स्थिती ऐसी थी कि इन सब जुल्मों का सामना कर सके और उनके धर्म परिवर्तन के फैसले को भारतिय मिडिया ने मजबुरी का नाम देकर असली मुद्दे को ही खत्म कर दिया। ऐसा ही एक मामला आज पुरे देश व राजस्थान मे चर्चा मे है ।

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आज जयपुर मे एक वरिष्ठ आईएएस उमराव सलोदिया ने अचानक एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और सरकार पर अपने दलित होने के कारण परेशान करने का आरोप लगाते हुए स्वैच्छीक सेवानिवृति का ऐलान तो किया ही साथ ही हिन्दु धर्म छोडकर ईस्लाम धर्म अपनाने का भी ऐलान कर दिया ।इस फैसलै के ऐलान के बाद सरकार भी सकते मे आ गया और उससे भी बडा धक्का लगा मिडिया को । मिडिया को यह समझ नही आ रहा कि अब ईसमे कौनसी मजबुरी बताई जाये और किसे इसके लिये जिम्मेदार ठहराया जाये । अगर ठिकरा सरकार की दलित विरोधी के मिथे फोडे तो सरकार की मिडिया से दोस्ती खतरे मे पड सकती है और अगर किसी दुसरे तरीके से इस मामले को घुमायें तो घुमायें कैसे साब आज का हिरो तो आईएएस है ना तो इसे अशिक्षीत या मजबुर बताया जा सकता है और ना ही ऐसा व्यक्ति किसी प्रलोभन के चक्कर मे ऐसा फैसला ले सकता है । और अब तो साब का नाम भी उमराव खान हो गया है त़ो मिडिया इन्हे सहानुभुती से नवाजकर अपने आर्थिक पालक रुपी विशेष वर्ग से भी नाराजगी नही ले सकता । अब सवाल यह है कि इसकी वजह क्या रही जो कलेक्टर,संभागिय आयुक्त और सचिव जैसे उच्च पद पर रहे उमराव सलोदीया को उमराव “खान” बनना पडा??क्या ऐसा संभव नही था कि पद पर रहते हुए ही सलोदिया “खान” बन जाते ??

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युनुस चौपदार राजस्थान मेट्रो न्युज जयपुर ब्युरो


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