जब से याक़ूब मेमन को फांसी देने की तारीख तय हुई, तभी से कुछ लोग उसकी फांसी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने लगे हैं। उनके अपने तर्क हैं जैसे कुछ ने कहा कि याक़ूब जब पाकिस्तान से भारत आया था तो उसे कुछ आश्वासन मिले थे कि उसके साथ नरमी बरती जाएगी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उसने दाऊद और आइएसआइ के बारे में बहुत पुख़्ता सबूत दिए हैं और इस लिहाज़ से उसके साथ वैसा ही सलूक किया जाना चाहिए जैसा कि किसी वायदामाफ़ गवाह के साथ किया जाता है।

मैं इन तर्कों की इज़्ज़त करता हूं क्योंकि जो ये दलीलें दे रहे हैं यदि उनमें सच्चाई है तो वाक़ई याक़ूब के साथ अन्याय हुआ है। यदि याक़ूब को कोई आश्वासन दिया गया था और उसने प्रॉज़िक्यूशन की मदद की है तो फांसी की सज़ा देकर उसके साथ छल हो रहा है जो कि ग़लत है।

लेकिन मैं ‘उन लोगों का तर्क’ नहीं समझ रहा हूं जो यह कह रहे हैं कि फांसी देना ही ग़लत है और किसी की जान लेकर हम भी वही बर्बरता दिखा रहे हैं जो याक़ूब और उसके साथियों ने सैकड़ों की जान लेकर दिखाई। उनका कहना है कि राज्य को क़ातिलों के स्तर पर नहीं उतरना चाहिए।

अभी जब मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूं तो एक मच्छर मुझे काट रहा है। बताइए, मुझे क्या करना चाहिए? गुडनाइट जलाकर उसे भगा देना चाहिए ताकि वह कल फिर आए और फिर मुझे काटे? क्या यह सही होगा कि मैं बार-बार उसे उड़ाता रहूं और वह बार-बार मुझे काटता रहे? या मैं एक झटके में उसका काम तमाम कर दूं ताकि मैं आराम से यह ब्लॉग पूरा कर सकूं?

जो मेरा इशारा समझ रहे हैं, वे कहेंगे, मैं इंसान की तुलना मच्छर से कर रहा हूं। चलिए, कोई और उदाहरण लेते हैं। मैं स़ड़क पर अपने छोटे-से परिवार के साथ पैदल जा रहा हूं। एक रईसज़ादा शराब और दौलत के नशे में 120 की स्पीड में गाड़ी चलाते हुए आता है और मेरी बेटी और पत्नी को कुचल देता है। ऐसे में मुझे या राज्य को क्या करना चाहिए? क्या उसे सुधार गृह भेज देना चाहिए जहां उसे ठीक से गाड़ी चलाने की शिक्षा दी जाए? या अधिक से अधिक तीन साल की सज़ा देकर उसे घर जाने दिया जाना चाहिए ताकि वह बा़क़ी ज़िंदगी इसी तरह गाड़ी चलाते हुए और इंसानी ज़िदगियों की जान जोखिम में डालता रहे? और मैं क्या करूं — ज़िंदगी भर अपनी बेटी और पत्नी के लिए रोता-बिलखता रहूं? ग़लती उसने की और सज़ा मैं झेलूं? यह कैसा न्याय है?

अब फिर से याक़ूब पर आते हैं। 1992 में बाबरी मस्ज़िद ढहा दी गई और उसका बदला लेने के लिए दाऊद इब्राहीम और उसकी टीम ने मुंबई में सीरियल बम धमाके किए जिनमें 257 लोगों की जानें गईं। कौन थे वे लोग जो उन विस्फोटों में मारे गए? क्या उनमें से एक भी इंसान  बाबरी मस्ज़िद गिराने का ज़िम्मेदार था? क्या मरनेवालों में ठाकरे या आडवाणी थे? नहीं। जो मरे, वे  सभी आम लोग थे — हम-आप जैसे लोग जिनका बाबरी मस्ज़िद या राम मंदिर से कोई लेना-देना नहीं था। उनमें मैं भी हो सकता था और मेरा कोई अजीज़ भी। आख़िर उनको क्यों मरना चाहिए था? याक़ूब या किसी को भी उन लोगों को मारने का क्या हक़ था?

ठीक वैसे ही  जिन लोगों ने गुजरात में गोधरा कांड के बाद सैकड़ों मुसलमानों को मारा, उनको भी क्या हक़ था उनकी हत्या करने का! उन मुसलमानों ने तो ट्रेन में आग नहीं लगाई थी। गुजरात में गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में हुई हिंसा भी उतनी ही अन्यायपूर्ण थी जितने बाबरी मस्जिद विध्वंस की प्रतिक्रिया में हुए मुंबई धमाके। और इसीलिए उन दंगों के दोषियों को भी वही सज़ा मिलनी चाहिए जो याक़ूब मेमन को दी गई है।

लेकिन नहीं। बाबू बजरंगी को फांसी की सज़ा नहीं मिली न ही माया कोडनानी को। निचली अदालत ने उन दोनों को  नरोडा पाटिया में 90 से ज़्यादा निर्दोंष मुसलमानों की हत्या का दोषी पाया था लेकिन उसने उनको फांसी की सज़ा न देकर केवल उम्रक़ैद की सज़ा दी। प्रॉज़िक्यूशन चाहता था उसके ख़िलाफ़ अपील करना लेकिन मोदी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने उसके ख़िलाफ़ अपील की इजाज़त नहीं दी। यहीं… इसी मोड़ पर मेरे जैसे कुछ लोगों के ज़ेहन में सवाल उठता है कि क्यों इस राज्य द्वारा, यहां की न्यायपालिका, यहां की संसद और यहां के मीडिया द्वारा याक़ूब और बाबू बजरंगी में फ़र्क़ किया जाता है? क्यों अफ़ज़ल गुरु और दारा सिंह के अपराधों को अलग-अलग चश्मे से देखा जाता है?

है किसी के पास है कोई जवाब?

ये लेख नवभारत टाइम्स के ब्लॉग कॉलम से लिया गया है जिसके लेखक नीरेंद्र नागर है 


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