नई दिल्ली: “मैं बहुत तकलीफ़ से कह रहा हूं कि लोग मेरे पास डेलिगेशन लेकर आते हैं कि घरेलू काला धन पर नरम रहें क्योंकि आख़िरकार ये आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा है लेकिन इस तरह के तर्क से तो आज की कोई अर्थव्यवस्था नहीं चल सकती।”

काला धन आएगा या आकर चला जाएगा9 सितंबर 2015 के इंडियन एक्सप्रेस में पीटीआई के हवाले से वित्त मंत्री का बयान छपा है। बयान अंग्रेज़ी में छपा है जिसका मैंने हिन्दी में अनुवाद किया है। वित्त मंत्री बता रहे हैं कि कैसे लोग उनसे दल बनाकर मिलने आते हैं कि घरेलू काला धन को लेकर थोड़ा नरम रहें। 29 फ़रवरी 2016 को जब उन्होंने अपना तीसरा बजट पेश किया तब क्या वे घरेलू काला धन को लेकर इतने व्यथित थे या सख्त थे?
31 अक्टूबर 2015 के बिज़नेस स्टैंडर्ड की ख़बर है कि वित्त मंत्री ने सीबीडीटी की समीक्षा बैठक में कहा है कि घरेलू काला धन पर निगाह रखी जाए। उनका पता लगाया जाए। वित्त मंत्री बजट में यह बताने से रह गए कि कितना घरेलू काला धन पता लगाया गया। उन्होंने घरेलू काला धन को लेकर बजट में जो एलान किया है वो उनकी छह महीने पहले की चिन्ता से मेल नहीं खाता है।

मई 2015 में वित्त मंत्री काला धन कानून पास कराने में सफल रहे, जिसके तहत जुलाई से सितंबर के बीच विदेशों में रखे काला धन के बारे में बता देना था। तय समय सीमा के भीतर बताने पर 90 फीसदी टैक्स और जुर्माना भरना था और उसके बाद पकड़े जाने पर 120 फीसदी टैक्स और जुर्माने के साथ दस साल की जेल का भी प्रावधान किया गया है। लेकिन सितंबर के बाद आयकर अधिकारियों ने इस कानून के तहत कितनों को पकड़ा और कितना पकड़ा इसकी कोई पुख़्ता जानकारी सार्वजनिक नहीं है।

ये जरूर पता है कि जुलाई से सितंबर के बीच 600 से अधिक लोगों ने 3770 करोड़ रुपये की घोषणा की है। इस दौरान ख़ुलासा करने वालों को बेनामी एक्ट के प्रावधानों से भी छूट दी गई। लेकिन घरेलू काला धन को लेकर वित्त मंत्री क्या नरम हुए हैं? जून से सितंबर के दौरान लोग अपना काला धन बताएंगे और मात्र 45 प्रतिशत का कर देकर सफेद बना लेंगे जबकि विदेशों में रखे काला धन बताने पर साठ फीसदी टैक्स और जुर्माना देना था। देसी काला धनखोरों पर इतनी मेहरबानी क्यों। क्या इतनी मेहरबानी नियमित टैक्स भरने वालों से होने वाली चूक के बाद की जाती है? काला धन कानून की तरह सितंबर के बाद घरेलू काला धन न घोषित करने वालों के साथ क्या सख़्ती की जाएगी यह स्पष्ट नहीं हो सका।

वित्त मंत्री ने कई मौकों पर कहा है कि देश के भीतर बहुत बड़ी मात्रा में काला धन है। अब हम यह नहीं जानते कि इसका बड़ा हिस्सा उन्हीं लोगों का है जिन्हें हम रसूखदार लोग कहते हैं या आम लोगों का भी है। रसूखदार लोगों को राहत क्यों दी जाती है? इस योजना का लाभ उठाकर कहीं उनका काला धन सफेद तो नहीं हो जाएगा। काला धन वाले तो सस्ते में छूट जाएंगे या फिर वित्त मंत्री ने इस बार विदेशी काला धन लाने के कानून से व्याप्त भय को दूर किया है?

1997 में चिदंबरम ऐसी योजना लेकर आए थे जिसे हम वीडीएस के नाम से जानते हैं। तब 33000 करोड़ काला धन घोषित हुआ था और सरकार को करीब नौ से दस हजार करोड़ का कर मिला था। लेकिन क्या उसके बाद काला धन बनना बंद हो गया? क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि अगले चार महीनों में इसका कई गुना काला धन सामने आयेगा और वित्त मंत्री का ख़ज़ाना लबालब होगा। हालांकि उन्होंने ज़ोर देकर कहा है कि उनकी योजना की तुलना 1997 की योजना से न की जाए। दोनों में कोई समानता नहीं है।

लेकिन विदेशों में रखे काला धन और देश के भीतर मौजूद काला धन की उगाही के लिए एक कानून क्यों नहीं हो सकते? किसे बचाया जा रहा है और किसका फायदा हो रहा है? काला धन लाया जा रहा है या लोगों को सफेद करने का मौका दिया जा रहा है! (NDTV)


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