अपनी विफलताएं ढकने के लिए देशभक्ति या राष्ट्रवाद को हवा देने का काम पहले भी होता रहा है, लेकिन अब तो इसे बिल्कुल सड़कछाप शोहदागिरी में तब्दील कर दिया गया है.

जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं

गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ के लिए यह गीत साहिर लुधियानवी ने आधी सदी से भी पहले लिखा था. इसलिए यह इल्जाम लगाए जाने का ख़तरा नहीं है कि इसे मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ लिखा गया है. उल्टे कहा यह जाता है कि साहिर ने नेहरू पर तंज कसते हुए यह गीत लिखा था. अब यह सोच कर कुछ डर सा लगता है कि अगर आज़ादी के उन शुरुआती वर्षों में राष्ट्रवाद का वैसा उफान होता, जैसा अभी है, या नेहरू भक्त मौजूदा भक्तों की तरह ही कम पढे-लिखे होते तो क्या साहिर लुधियानवी हिंदुस्तान की हालत को लेकर ऐसा गीत लिखने के बाद भी बचे रहते? क्या हिंदुस्तान पर नाज न करने के लिए उन पर देशद्रोह का मुक़दमा नहीं चलाया गया होता?

बंटवारे की उन ज़हर घुली फिज़ाओं के बावजूद पूरे माहौल में ऐसी भयानक असहिष्णुता नहीं थी कि लोग अपने लेखकों, बुद्धिजीवियों या विश्वविद्यालयों को बिल्कुल देश का दुश्मन मान कर उन पर हमले करने लगते. ऐसा होता तो पाकिस्तान वाले मंटो को मार डालते और हिंदुस्तान वाले साहिर-शैलेंद्र को जिंदा नहीं छोड़ते.

यह कहना गलत होगा कि उस समय ऐसी मूर्खताएं नहीं होती थीं. नेहरू के ख़िलाफ़ गीत लिखने के आरोप में मजरूह सुल्तानपुरी को जेल काटनी पड़ी थी. आज़ादी के आसपास का ही दौर था जब इस्मत चुगतई की कहानी लिहाफ पर मुकदमा चलाया गया. लेकिन यह सच है कि बंटवारे की उन ज़हर घुली फिज़ाओं के बावजूद पूरे माहौल में ऐसी भयानक असहिष्णुता नहीं थी कि लोग अपने लेखकों, बुद्धिजीवियों या विश्वविद्यालयों को बिल्कुल देश का दुश्मन मान कर उन पर हमले करने लगते. ऐसा होता तो पाकिस्तान वाले सआदत हसन मंटो को मार डालते और हिंदुस्तान वाले साहिर-शैलेंद्र किसी को जिंदा नहीं छोड़ते. बेशक, बहुत सारे लोग लोग कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन पढ़ाई-लिखाई को सम्मान के साथ देखते थे. कोई चुभने वाली बात कहे तो उससे चिढ़ते भी थे लेकिन, अंततः उसे फितूर मानकर किनारे कर देते थे.

लेकिन आज जो कुछ हो रहा है, वह भयानक अपढ़ता, बेरोज़गारी और भविष्यहीनता के बीच सिर्फ और सिर्फ एक उन्माद को हवा देने जैसा है. ऐसी उन्मादी देशभक्ति देश का भला नहीं करती, वह सरकारों और व्यवस्थाओं को इस मायने में तात्कालिक लाभ ज़रूर पहुंचाती है कि उससे उनकी विफलताएं ढक जाती हैं. दरअसल आज जिस देशभक्ति या राष्ट्रवाद को हवा दी जा रही है, उसके पीछे मकसद अपनी विफलताओं को ढकना भी है. यह काम कांग्रेस के राज में भी होता रहा लेकिन मौजूदा दौर में तो इसे बिल्कुल सड़कछाप शोहदागिरी में तब्दील कर दिया गया है.

बेशक, बहुत सारे लोग लोग कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन पढ़ाई-लिखाई को सम्मान के साथ देखते थे. कोई चुभने वाली बात कहे तो उससे चिढ़ते भी थे लेकिन, अंततः उसे फितूर मानकर किनारे कर देते थे.

यही नहीं, इस शोहदागीरी को किस तरह पुलिस तंत्र का खुला समर्थन हासिल है, यह हाल की घटनाएं बताती हैं. पटियाला हाउस कोर्ट में पेशी के वक़्त जिन वकीलों ने छात्रों और पत्रकारों की पिटाई की, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कन्हैया कुमार को पीटा, बाद में टीवी चैनलों पर अपनी बहादुरी और देशभक्ति का बखान करते देखे गए, वे अब तक खुलेआम घूम रहे हैं. जबकि दिल्ली के पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में बता रहे हैं कि अगर उस दिन पुलिस ने लाठी चलाई होती या आंसू गैस छोड़ी होती तो जालियांवाला बाग जैसा माहौल हो गया होता. या तो कमिश्नर साहब जालियांवाला बाग की घटना से बेख़बर हैं या बताना चाहते हैं कि ये वकील भी वैसे ही देशभक्त थे जैसे देशभक्तों पर अंग्रेज सरकार ने गोली चलाई थी.

सच तो यह है कि पटियाला हाउस कोर्ट में मारपीट पर उतारू हुज़ूम की तुलना जालियांवाला बाग में शांति के साथ बैसाखी का त्योहार मना रहे लोगों से करना उन लोगों का भी अपमान है, अपने इतिहास का भी और अपने स्वाधीनता संग्राम का भी. काश कोई बस्सी साहब से पूछता कि ऐसी तुलना की हिम्मत उनके भीतर कहां से पैदा हुई?

पटियाला हाउस कोर्ट में मारपीट पर उतारू हुज़ूम की तुलना जालियांवाला बाग में शांति के साथ बैसाखी का त्योहार मना रहे लोगों से करना अपने स्वाधीनता संग्राम का अपमान है. काश कोई बस्सी साहब से पूछता कि ऐसी तुलना की हिम्मत उनके भीतर कहां से पैदा हुई?

यह सबसे ख़तरनाक स्थिति है- पूरी व्यवस्था का ऐसे शोहदों को बढ़ावा देना जो देशभक्ति ब्रिगेड के लठैतों की तरह काम करें. लेकिन क्या यह देशभक्ति इस लायक है कि इसे देश की सेवा में लगाया जा सके? इसका जवाब हरियाणा में मिलता है जहां जाट आंदोलन के दौरान मारपीट, तोड़फोड़, लूटपाट और लड़कियों के साथ बदसलूकी तक हुई. लेकिन कन्हैया और उनके दोस्तों को देशभक्ति का सबक सिखाने चली सरकार ने इस जाट आंदोलन की दादागिरी के आगे घुटने टेक दिए. सबको सड़क पर उतर कर देशभक्ति सिखाने वालों को भी सांप सूंघा हुआ है. अभी तक पुलिस यह मानने को तैयार नहीं है कि वहां किसी महिला के साथ कोई बदसलूकी हुई है. जिन लोगों ने करोड़ों की संपत्ति जलाकर ख़ाक कर दी, जिनकी वजह से उद्योग जगत अपने 35000 करोड़ के नुक़सान का रोना रो रहा है, उनसे देश को खतरा नहीं है, जेएनयू में लगे चंद नारों से है- यह समझ बताती है कि देश की परिभाषा इन लोगों की नज़र में क्या है.

दरअसल आप एक देश चाहते हैं तो आपको उस देश के लायक बनना पड़ता है. देश आपसे कुरबानी चाहता है. सीमा पर देश की रक्षा के लिए इसी जज़्बे से लोग जाते हैं. यह विडंबना ही है कि इस कुरबानी को दिल्ली में बैठी सत्ता अपने राजनीतिक चारे की तरह इस्तेमाल करती है और ऐसे युद्धवादी नारे देती है जिससे किसी का भला न हो. देश का गृह मंत्री यह नहीं बताता कि पाकिस्तान से घुसपैठिए पठानकोट के एयरबेस में कैसे घुस आए और उनके ख़िलाफ़ चली सुरक्षा बलों की कार्रवाई इतने सवालों से क्यों घिरी रही- वह एक फिल्मी संवाद बोलता है कि अगर पाकिस्तान से एक गोली चली तो इधर से इतनी गोलियां चलेंगी कि पाकिस्तान गिन नहीं पाएगा.

दरअसल गोली इस गृह मंत्री को न चलानी है न खानी है, गोली सीमा पर बैठा वह गरीब जवान चलाता और खाता है जिसे अपने देश की रक्षा करनी है.

दरअसल गोली इस गृह मंत्री को न चलानी है न खानी है, गोली सीमा पर बैठा वह गरीब जवान चलाता और खाता है जिसे अपने देश की रक्षा करनी है. लेकिन उसे गोली चलाने या खाने की नौबत न आए अगर सरहद के आरपार बैठे नेता अपने राजनीतिक व्यवहार में कुछ संयम और अपने प्रशासनिक फैसलों में थोड़ा लोकतंत्र और बड़प्पन ले आएं.

मगर यह बड़प्पन सिर्फ दिखावे का नहीं, व्यवहार का भी होना चाहिए. हम अपने देश से इसलिए प्यार करते हैं कि हमें उसके अपना होने का एहसास होता है, और यह एहसास प्रेम, न्याय और बराबरी के सूत्रों से बंधा होता है. अगर ये सूत्र कमज़ोर पड़ते हैं तो देश कमज़ोर पड़ता है. दुर्भाग्य से इस देश के अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़ों और कई प्रांतों के लोगों को एक परायेपन का एहसास होता है क्योंकि सत्ता अपने सिद्धांत और व्यवहार में इस परायेपन को बढ़ावा देती है.

लेकिन यह परायापन दूर करने की जगह सरकार अपने शोहदों को सड़क पर उतार देती है, उन्हें पुलिस संरक्षण देती है और यह माहौल बनाती है कि जो उसके साथ नहीं है, वह देश के साथ नहीं है. अगर हम चाहते हैं कि देश एक घर की तरह हो तो यह जरूरी है कि इस घर में न किसी को सौतेलेपन का एहसास हो और न किसी को यह गुरूर कि वह अपने संख्या बल से सबकुछ हड़प लेगा. हम ऐसा ही घर बनाने निकले थे लेकिन बना नहीं पा रहे- यह साहिर के आधी सदी पुराने एक गीत की सहसा चली आई याद भी बताती है. (satyagrah)


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