शाहिद आज़मी , अब्दुल करीम टुंडा , इकबाल , मोहम्मद सलीम , मुफ्ती अब्दुल कयूम , मदनी , का नाम आपने तब सुना होगा जब ये लोग आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार हुए रहे होंगे , भारत के सभी समाचार पत्र तथा भाँड इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने 24×7 ब्रेकिंग न्यूज के साथ इनकी गिरफ्तारी और पुलिस के बीच में सर झुकाए खड़े इन लोगों को दुर्दांत आतंकवादी प्रस्तुत करके जब इनसे संबंधित मनगढंत स्टोरी चलाई रही होगी तो आप को दहशत हुई होगी कि यह लोग देश के साथ ऐसा क्युँ कर रहे हैं ? ऐसे लोगों को तुरंत फाँसी पर चढ़ा देना चाहिए ।

घृणा भी पैदा हुई होगी और होनी भी चाहिए , जो भी देश से मुहब्बत करता है उसे घृणा करनी भी चाहिए , मुझे भी हुई थी घृणा पर तब उस घृणा में एक शक भी मेरे मन में था कि इनको “ब्राह्मणवादी” और संघ नियंत्रित “आईबी” ने झूठा गिरफ्तार दिखाया होगा और गिरफ्तारी दिखा कर एक तो अपनी पीठ ठोकी और दूसरे अपने पित्र संगठन के लोगों को एक अवसर प्रदान किया कि वह देश के मुसलमानों पर इन आरोपियों का नाम लेकर आक्रमण करें । और जब आज सभी के सभी लोग बाईज्जत बरी हो रहे हैं तो उन समाचार पत्रों और भाँड इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनलों के पास इस सच को दिखाने का उतना तो छोड़िए उसके 5% भी समय नहीं है जितना उस झूठ को दिखाने के लिए था जिसे “आईबी” ने गढ़ा था । माफ कीजिएगा “रवीश कुमार” के पास भी नहीं जो अभी जमानत पर छूटे “कन्हैया” को हीरो बनाने पर तुले हुए हैं पर बाईज्जत बरी हुए लोगों के लिए उनके पास भी प्राईम टाइम में जगह नहीं है।

जाँच का स्तर और पक्षपात का स्तर देखिए कि कल दिल्ली उच्चन्यायालय ने जिस 73 वर्षीय अब्दुल करीम टुंडा को धमाके के सभी चार आरोपों के अंतिम आरोप से भी बरी किया उस अब्दुल करीम टुंडा का नाम , मुम्बई हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान से जो 10 लोगों की मांग की थी उनमें एक था । और घृणा का स्तर देखिए कि “सैयद अब्दुल करीम” जिनकी आयु 73 वर्ष की है उसे भारत सरकार और समाचार पत्र तथा भाँड इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने “टुंडा” का खिताब इसलिए दे दिया कि उनके एक हाथ मुकम्मल नहीं है। किसी की विकलांगता का ऐसा मज़ाक अमानवीय है जो इस पक्षपाती व्यवस्था ने दिखाया है ।

एक फिल्म बनाई गई थी जिसका नाम है ‘शाहिद’।जिसने टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में सुर्खियां बटोरी । फिल्म में दो चरमपंथी घटनाओं से जुड़े अदालती मामलों को दिखाया गया. ये मामले वर्ष 2006 में मुंबई में लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों और साल 2008 में मुंबई पर हुए चरमपंथी हमलों से जुड़े हैं. फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता थे और इसके निर्माताओं में अनुराग कश्यप थे ।

यह फिल्म “शाहिद आज़मी” के उपर बनी थी जिन्होंने भारत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में दिल्ली की तिहाड़ जेल में सात साल काटे थे । लेकिन उनके खिलाफ लगे आरोप कभी साबित नहीं हो पाए, वे आज़ाद हो गए और इसके बाद उन लोगों की आवाज़ बने जो उनकी तरह आरोपों के शिकार हुए थे। शाहिद आजमी नीचे से उठे व्यक्ति थे जो उम्मीद के प्रतीक थे, लेकिन उन लोगों ने शाहिद की हत्या करा दी जिन्हें मुंबई हमलों के अभियुक्त फहीम अंसारी की पैरवी करना पसंद नहीं आया।

शाहिद आज़मी ने अपने सात साल की वकालत के करियर में ऐसे झूठे आरोप में फंसाए 17 मुसलमानों को अदालत से बरी कराया था ।

मुफ्ती अब्दुल कयूम को मुहम्मद सलीम तथा चार अन्य लोगों के साथ सन् 2002 में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर में आतंकवादी घटना के आरोप में गिरफ्तार किया गया था जिसमें 32 श्रृद्धालू मारे गये थे तथा सुरक्षा बलों ने 2 आतंकवादियों को मौके पर ही मार गिराया था , 13 वर्षों बाद उच्चतम न्यायालय ने सभी आरोपियों को बाईज्जत बरी कर दिया गया , मुफ्ती अब्दुल कयूम की लिखी किताब पढ़ें तो रोंगटे खड़े हो जाएँगे कि केवल मुसलमान होने के कारण गुजरात की पुलिस ने उनपर और 5 अन्य आरोपियों पर क्या क्या ज़ुल्म किये और फिर तीन विकल्प दिये कि अपनी पसंद में से एक चुन लो जिसमें तुम सबको आरोपी बनाया जा सके , गोधरा , अक्षरधाम और हिरेन पांड्या हत्याकांड । लिंक देखिए और सोचिए कि पुलिस कैसे और क्या क्या आरोप लगाती है जिसे अन्य लोग कैसे केवल आरोप लगाते ही उस आरोपी के पूरे समुदाय को गालियाँ देना प्रारंभ कर देते हैं ।

ऐसे ही मौलाना मदनी भी बाईज्जत बरी हुए जिन्हें कोयम्बटूर बम धमाकों का मुख्य आरोपी बनाया गया था और वर्षों तक वह जेल में रहे।

आतंकवाद एक गंभीर समस्या है, इस बात से किसी को इंकार नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हज़ारों लोगों को भेड़-बकरियों की तरह जेलों में ठूंस दिया जाए, मुसलमानों को इसके लिए निशाना बनाया जाए, प्रतिशोध की भावना के तहत कार्यवाही की जाए और मीडिया को हथियार बनाकर देश में नफरत का माहौल पैदा किया जाए ।

इस पर ध्यान देना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि आज वे लोग बाइज्जत बरी हो रहे हैं, जिन्हें आतंकवाद के झूठे आरोपों में 10 या 12 वर्ष पहले गिरफ्तार किया गया था । निचली अदालतों ने जिन्हें फांसी या उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी, आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें सभी आरोपों से बरी किया जा रहा है. ऐसे में, सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर ये फर्ज़ी आतंकवादी थे, तो असली आतंकवादी कहां हैं ? फर्जी आरोप लगाकर असली आतंकवादियों को बचाने में पुलिस ने मदद की कि नहीं ? बिलकुल की ।

जिस समय ये लोग गिरफ्तार किए गए, उस समय पुलिस द्वारा बताई गई बातों पर विश्वास करते हुए मीडिया के एक बड़े हिस्से ने उन्हें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन और न जाने कौन-कौन से आतंकवादी संगठनों का सदस्य बताया था, लेकिन आज जब वे रिहा हो रहे हैं, तो कोई भी यह ख़बर चलाने को तैयार नहीं है । रवीश कुमार भी नहीं , तो महसूस होता है कि कुछ फर्क तो है मुसलमान होने के कारण ।

उपरोक्त 6-7 उदाहरण तो वह हैं जिसे सब जानते हैं जबकि सैकड़ों की तादाद में ऐसे फर्जी झूठे आरोप लगाकर फंसाये गये मुसलमान अदालतों द्वारा बाईज्जत बरी हो चुके हैं । तो उनपर झूठे आरोप लगाकर उनका और उनके परिवार के जीवन को बर्बाद कर देने वालों को क्या दंड दिया गया है ?

एक रिपोर्ट है Framed, Damned, Acquitted। ये रिपोर्ट जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने निकाली है, इसमें ऐसे 100 से अधिक केसों के बारे में जानकारी है, जिनमें मुस्लिम युवकों को पुलिस की स्पेशल सेल ने पकड़ा, उनपर आतंकी होने का आरोप लगाया लेकिन कोर्ट ने उन्हें बरी किया क्योंकि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं थे। इनमें से कई लोग काफी लंबे समय तक जेल में रहे, इनकी जिंदगी के कीमती साल जेल में बीत गए, क्या उसका मुआवजा उन्हें मिला? क्या उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था की गई ?

ध्यान दीजिएगा कि यह सब झूठी गिरफ्तारियाँ कांग्रेस के शासन के समय की हैं जो अब बाईज्जत बरी हो रहे हैं , ऐसे ही जो लड़के आइएस के नाम पर मोदी सरकार गिरफ्तार करा रही है वह अगली सरकार तक अपने जीवन के 10-15 वर्ष जेल में बर्बाद करके निर्दोष साबित होंगे ।

इन 10-15 वर्ष की कीमत कौन देगा ? या भारत का संविधान संघ नियंत्रित “आइबी” को इतना अधिकार देती है कि नागपुर स्थिति अपने आकाओं के इशारे पर वह जिसे चाहे झूठे आरोप में अंदर कर दे , आरोप झूठे साबित होने पर ऐसे अधिकारियों पर दंड की व्यवस्था क्युँ नहीं है संविधान में जिससे किसी की जवानी खराब करने वालों का बुढ़ापा खराब हो सके और इस डर से वह झूठे आरोप लगाना बंद करें ।

गुजरात में सत्ता परिवर्तन होने दीजिए “गोधरा” का सच भी सामने आ जाएगा । इशरतजहाँ जीवित रहती तो उसे भी बाईज्जत बरी किया जाता , या इन सब बाईज़्ज़त बरी आरोपियों को इशरतजहाँ की तरह मारा गया होता तो हेडली इनको भी लश्कर का आतंकवादी बता रहा होता । पुलिस और सत्ता के झूठ की यही हकीक़त है । – मोहम्मद जाहिद


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