श्रीमान कमल बी पाशा,
न्यायाधीश, उच्च न्यायालय, केरल

7 मार्च 2016 को कोझिकोडे में एक सभा को संबोधित करते हुए आपने इस्लाम धर्म की कानून व्यवस्था पर इल्जाम लगाते हुए ये कहा कि इस्लाम धर्म में महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव किया जाता हैं एवं महिलाओं को उनके अधिकार नहीं दिये जाते हैं क्योंकि इस्लाम में पुरुषों को तो चार पत्निया रखने का अधिकार हैं परन्तु महिलाएं एक से ज्यादा पति नहीं रख सकती। हालांकि ये इल्जाम जो आपने इस्लाम पर लगाया हैं ये बिल्कुल बेबुनियाद हैं। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि आप में ज्ञान की कमी हैं और साथ ही वो कहावत भी सिद्ध हो गई कि “अधूरा ज्ञान खतरनाक होता हैं”।

अगर आप इस्लाम को सही तरीके से जानने की कोशिश करते तो कभी भी इस्लाम पर इस तरह का बेहूदा इल्जाम नहीं लगाते। क्योंकि इस कानून के पीछे इस्लाम की बहुत ही नेक (अच्छी) सोच हैं। इस्लाम ने यह कानून महिलाओं के महत्व को कम करने के लिए नहीं बल्कि उनको उनका अधिकार दिलाने के लिए बनाया है। और इन्शा अल्लाह (इश्वर ने चाहा तो) इस लेख से यह साफ हो जाएगा कि इस्लाम सही हैं और आप गलत हैं।

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अगर इस्लाम ने पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने की अनुमति दी हैं तो इसका मुख्य कारण विधवाओं को सामान्य जीवन जीने का अधिकार दिलाना हैं। पहले के जमाने में जब भी किसी महिला का पति मर जाता तो उस महिला को उसके पति की चिता के साथ जिन्दा जला दिया जाता और अगर किसी महिला को जिन्दा नहीं भी जलाया जाता तो उसे मनहूस मानकर किसी काल-कोठरी में रखा जाता और उनको किसी भी नेक (शुभ) काम में शामिल नहीं किया जाता और नाहीं उनकी दुसरा विवाह करवाया जाता था। इस प्रकार विधवाओं पर बहुत अत्याचार किये जाते थे। और हमारे देश में आज भी कई इलाकों में विधवाओं को मनहूस माना जाता हैं और नाहीं उनका दुसरा विवाह करवाया जाता हैं।

इसी सन्दर्भ से मैं यहाँ UN (सन्युक्त राष्ट्र) की 2011 की एक रिपोर्ट का हवाला दे रहा हूँ जिसके अनुसार दुनिया में करीब 24.5 करोड़ विधवाएं हैं जिनमें से 11.5 करोड़ विधवाएं बहुत ही गरीब हैं और बेहद दयनीय जीवन व्यतीत कर रही हैं। तो अगर पुरुष एक से अधिक विवाह नहीं करेंगे तो इन करोड़ों महिलाओं से कौन विवाह करेगा? और उनके बच्चों को कौन अपनाएगा? इनकी हालत कैसे सुधरेगी? क्या वे अपना पूरा जीवन ऐसे ही दयनीय स्थिति में व्यतीत करेगी?

तो आज से तकरीबन 1500 वर्ष पहले जब विधवाओं पर अत्यधिक अत्याचार किये जाते थे तब एक नौजवान जिसकी उम्र 25 साल थी ने एक 42 साल की विधवा से विवाह करके पुरी दुनिया को यह मैसेज दे दिया कि विधवाएं मनहूस नहीं हैं बल्कि उनको भी एक सामान्य जीवन जीने का पूरा अधिकार है। और वह नौजवान कोई और नहीं बल्कि इस्लाम के पेगम्बर हजरत मुहम्मद साहब (स.अ.व.) थे। उन्होंने इस्लाम के मानने वालों से फरमा दिया कि जब तुम किसी विधवा और उसके बच्चों को देखो तो उन्हें अपनाओ क्योंकि ये बहुत ही पुण्य का काम हैं।

वो तो पेगम्बर हजरत मुहम्मद साहब (स.अ.व.) थे जिन्होंने उस जमाने में अपना पहला ही विवाह एक विधवा से किया अन्यथा आज के समय भी किसी कुवारे पुरुष में इतना साहस नहीं कि वह किसी विधवा से विवाह करें। इसीलिए इस्लाम ने पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने की अनुमति दी हैं। तो आज अगर दुनिया में करोड़ों विधवाओं की हालत सुधारनी हैं तो जरुरत हैं कि इस्लाम के इस कानून को लागू किया जाए।

और इस्लाम महिलाओं को चार पति रखने की अनुमति नहीं देता हैं तो उसका एक बहुत ही सामान्य तर्क हैं। अगर किसी पुरुष की चार पत्निया है तो जब भी उनकी कोई औलाद होगी तो यह पता लगाना आसान है कि उसके माता पिता कौन हैं? पर अगर पत्नि एक हैं और उसके पति चार हैं तो यह तो पता चल जाएगा कि माता कौन हैं पर यह कैसे पता चलेगा कि पिता कौन हैं? क्योंकि वह चारों पतियों के साथ रहती है। तो क्या उस बच्चे के चार पिता हैं? जब उससे उसके पिता का नाम पूछा जाएगा तो क्या वो ये कहेगा कि उसके चार पिता हैं?

तो चाहे UN (सन्युक्त राष्ट्र) की रिपोर्ट की बात करें अथवा तर्क की बात करें, एक से अधिक विवाह करने की आवश्यकता महिलाओं को नहीं पुरुषों को हैं। इस्लाम का सिर्फ यही कानून नहीं बल्कि प्रत्येक कानून इन्सानियत की भलाई के लिए हैं बशर्ते आप इस्लाम को सच्चे दिल से पढ़ें और समझें।

मोहम्मद जुनेद टाक (बाली) राजस्थान।
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