hukum singh

आस मोहम्मद कैफ

गुर्जर एक वफादार क़ौम है और दमदार भी । एक मशहूर गुर्जर नारा है ‘गुर्जर गुर्जर एक समान हिन्दू हो या मुसलमान ‘ । गुर्जर कभी सांम्प्रदायिक नही रहा है बल्कि राष्ट्र को समर्पित मज़लूम का साथी रहा है । 1950 मे जब मुसलमानो के आरक्षण को खत्म किया जा रहा था तो प्रधानमंत्री नेहरू समेत चारो मुसलमान नेता सहमत थे सिर्फ सरदार पटेल मुसलमानो की पैरोकारी कर रहे थे क्योंकि वो अन्याय विरोधी थे और जानते थे कि इस आरक्षण के रद्द होने से गरीब व पिछड़े मुसलमानो की हालात बदतर हो जायेगी और ऐसा हुआ ।

मुसलमानो की हालात दलितों से भी बदतर हो गयी । सरदार पटेल बचाना चाहते थे और मुसलमान नेताओ को बहकाकर नेहरू ने उन्हें डूबा दिया । यह गृहमंत्री सरदार पटेल की दूरदर्शिता और राष्ट्रनेता वाली भावना थी । देश को दूसरे चमत्कारिक गुर्जर नेता मिले राजेश पाइलेट । वो लगभग प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे मगर हादसे ने उन्हें छीन लिया। दोनो नेताओ ने कभी जाति धर्म और नफरत की राजनीति नही की । हमेशा देश की बात की । गुर्जर बहुत बड़ी आबादी है पटेल और कुर्मी भी इसी समाज का हिस्सा है फिर भी पूरे भारत मे पश्चिम उत्तर प्रदेश के गुर्जर का विशेष महत्व है । यहां सबसे बड़ा नाम मुज़फ्फरनगर के बाबू नारायण सिंह का लिया जा सकता है वो उपमुख्यमंत्री रहे । बाद मे उनके बेटे संजय चौहान विधायक और सांसद दोनो रहे । सहारनपुर मे चौधरी यशपाल कृषि मंत्री रहे और गुर्जर शिरमौर बने। नोएडा ग़ाज़ियाबाद बेल्ट मे पायलेट परिवार का दबदबा रहा मगर चूंकि सचिन पायलेट दौसा से चुनाव लड़ने लगे तो इस बेल्ट पर नागर भाटी समूह ने वर्चस्व कायम कर लिया ।

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कैराना भी गुर्जर कैपिटल कहलाती थी। यहां के अख्तर हसन बसपा सुप्रीमो मायावती को हराकर सांसद बने। चौधरी अख्तर हसन 84 गांव के चौधरी बुन्दू के बेटे थे। चौधरी बुन्दू और बाबू हुकुम सिंह आपस मे सगे चचेरे भाई रहे। एक परिवार ने इस्लाम मज़हब अपना लिया ।दोनो कलस्यन खाप से है। इस दौरान हुकुम सिंह ने खूब तरक़्क़ी की। 1991 मे चौधरी अख्तर हसन के बेटे मन्नवर हसन ने अपने ‘दादा’ हुकुम सिंह को कैराना विधानसभा का चुनाव हराकर सनसनी फैला दी ।मन्नवर हसन अचानक से कैराना की पहचान बन गए। गिनीज़ बूक मे उनका नाम लिखा गया । वो चारो सदन का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत के पहले नेता बने। मन्नवर जब हादसे मे चल बसे तो चश्मदीद बताते है की बाबू हुकुम सिंह भी खूब रोय। सहानभूति मे तब्बसुम हसन चुनाव जीत गयी। नाहिद ने उपचुनाव मे हुकुम सिंह के भतीजे अनिल चौहान को हरा दिया। मगर इस दौरान एक नया परिवर्तन हो चुका था।

इसी बेल्ट का एक और शक्तिशाली गुर्जर परिवार जसाला फैमली के नोजवान मनीष चौहान की नए जिले शामली के प्रथम नागरिक बन गए। कैराना कॅपिटल को लगा की अब तक सलाम छोटे चौधरी के हो या बड़े चौधरी एक ही बात थी। अब एक नई चुनोती मिल गयी। कांधला से लगभग 30 साल से भी ज्यादा विधानसभा मे पर्टीनिधितिव करने वाले वीरेंद्र सिंह ने शामली जिले की राजनीति पर वर्चस्व कायम करना प्रारम्भ कर दिया। हुकुम सिंह ताड़ गए।

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जिला पंचायत चुनाव मे हसन परिवार ने अपनी वोट तो वीरेंद्र पुत्र को दी मगर हुकुम सिंह ने मनीष चौहान को हरवा दिया।शायद उन्हें लगा की अगर मनीष दोबारा जीत गया तो जसाला फैमली का शामली जिले की राजनीति पर दबदबा हो जाएगा और वीरेंद्र सिंह तीनो जिलो मे गुर्जरो मे सबसे बड़े नेता हो जाएंगे। हुकुम लड़ाई अपने और हसन परिवार के बीच ही रखना चाहते थे। चूंकि वीरेंद्र सिंह को समाजवादी पार्टी ने एमएलसी भी बना दिया और वो साम्प्रदायिक राजनीति भी नही करते इसलिए हुकुम सिंह के पास सिर्फ केसरिया कार्ड बचा। इससे उन्हें कई तीर सधते दिखाई दिए। वो हिन्दू गुर्जर सम्राट बन सकते थे। केंद्र मे मंत्री बन सकते थे , उनका वर्चस्व हो सकता था । जसाला परिवार लड़ाई से बाहर हो सकता था क्योंकि वो हिन्दू मुस्लिम एकता की बात करता और लोग सुनते नही। इसलिए इंसानियत से पलायन करना पड़ा। अब हुकुम सिंह यह लड़ाई हारते दिख रहे है।

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-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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