आज 14 अप्रैल है आम्बेडकर साहब का जन्मदिन े वो पुष्प जो जमीन पर उगा और फकत आसमान पर खिला, जिसने लाख कठिनाइयाँ झेली पग-पग पर अपमान झेला पर अपना विश्वास नहीं खोया, अपनी मंजिल जिसने खुद तय की, मुश्किलों के पहाड़ों का सीना चीर कर जिसने अपना रास्ता बनाया, राह के कांटे जिसके सिर का ताज बनें जी हाँ आज उस आम्बेडकर का जन्मदिन है। जो मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुआ राजपुत्र नहीं था, जो अर्जुन नहीं था पर अपनी मेहनत, अपनी लगन और अपनी साधना से वो एकलव्य बना, किन्तु वही आम्बेडकर आज आपके सम्मान का मोहताज है। ये बहुत ग्लानि की बात है सोशल मीडिया के नेटवीर आज के दिन उस महापुरुष को कोस रहे हैं जिसकी पगधूलि का वो एक अंश मात्र भी नहीं हैं।

आम्बेडकर साहब को कोसना बहुत आसन है। उन्हें आप आरक्षण के नाम पर कोसिये या उनके धर्म परिवर्तन करने पर आम्बेडकर बनना उतना ही दुष्कर है। कल्पना मात्र कीजिये कि आपको सिर्फ इसीलिए नहीं पढ़ने दिया जाता क्योंकि आप दलित हैं। मारे प्यास के आपका गला सूख रहा है। सामने तालाब है और आप इसीलिए पानी नहीं ले सकते क्योंकि आप अछूत हैं। आप पानी छू भर लेंगे तो शायद गंगाजली भी उसे शुद्ध न कर पाए। आपके छाया भर पड़ने से ब्राह्मण तो छोडिये बनिए तक अशुद्ध हो जायें। जिस उम्र में स्नेह और आशीर्वाद मिलना चाहिए उस उम्र में आपको गालियाँ मिलें। पग -पग पर पल पल पर जातिसूचक शब्दों से आपका ह्रदय बींध दिया जाए। सोचिये आम्बेडकर किन किन परिस्थियों से गुजरे। क्या हश्र होता होगा उस नन्हें बालक का सोचिये जरा ? पर उन विषम हालात में भी उन्होंने आशा न छोड़ी। अपने पूर्वजों की तरह उन्होंने हथियार नहीं डाले। वो लड़े अपने अधिकारों के लिए। वो उन करोड़ों लोगों की आवाज बने जो उठने से पहले कुचल दी जाती थीं।

किसी भी देश का इतिहास उसकी सबसे बड़ी धरोहर होती है। कहते हैं कि इतिहास वो आइना होता है जिसमे भूत को निरख कर वर्तमान संवारा जाता है ताकि सुखद भविष्य की आधारशिला रखी जा सके। लेकिन अपना भारत दुनिया का इकलौता ऐसा मुल्क है जिसमे इतिहास सिर्फ किताबों तक सीमित है। यहाँ इतिहास सिर्फ पढ़ा जाता है कभी गुना नहीं जाता, कभी इससे सीख नहीं ली जाती है, क्योंकि अगर हमने इतिहास में झाँका होता तो आज दलितों को उनका सम्मान कब का मिल चुका होता। आज भी उनके प्रति हमारी दुर्भावना जस की तस है। आप उप्र, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और बिहार में छपने वाला कोई भी अखवार उठा लीजिये उसमे एक खबर जरूर होगी। दबंगों ने नहीं चढ़ने दी दलित की बारात। आज भी पांडे जी का दलित दोस्त अगर गलती से उनके घर आ जाये तो उनकी बुआ कहती हैं कि रे चमरवा ! तोहरी हिम्मत कईसे हुई गईल हमरी द्वारी पे आपन गोड रख्खे की। कभी दलित बस्तियों में बिजली की सप्लाई रोक दी जाती है तो कभी पानी के पाइप काट दिए जाते हैं। क्यों भाई क्यों नहीं चढ़ा सकता दलित अपनी बारात ? क्यों नहीं आ सकता पांडे जी का दलित दोस्त उनके घर पर ? ये लोग इन्सान नहीं है क्या ? क्या ये किसी दूसरी दुनिया से आये हुए लोग है ? क्या ये मानसिकता बदलनी नहीं चाहिए ? क्यों भाई कब सीख लोगे अपने इतिहास से जब खुद इतिहास हो जाओगे तब ?

शिकायत मुझे आम नागरिको से नहीं हैं । शिकायत है मुझे उन तथाकथित धर्म ध्वजा रक्षकों से जो आज भी दलितों को उनका हक देने के लिए तैयार नहीं है। जो हिन्दुत्व के पुरोधा हैं जो आद्य शंकराचार्य की परम्परा से हैं े वो कैसे किसी दलित से घृणा कर सकते हैं ? हमारे यहाँ तो महर्षि वाल्मीकि को भगवान् का दर्जा दिया गया है। स्वयं मयार्दा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम शबरी के झूठे बेर खाते हैं और उन्हें अपनी माँ कहते हैं। उन्हीं भगवन श्रीराम का एक परम मित्र भील समुदाय से होता है । फिर उन भगवान श्रीराम के वंशज दलितों का तिरस्कार भला कैसे कर सकते हैं ? विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम का पाठ पढाने वाली उदारमना हिन्दू संस्कृति क्या इतनी निष्ठुर हो सकती है जो अपने ही एक अंग को अपृश्य घोषित कर दे ? आम्बेडकर साहब ने भी तो बस इसी के खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्होंने समानता का अधिकार ही तो माँगा था। हमारे पूजनीय धर्मगुरु क्या उन्हें सम्मान से जीने का हक भी नहीं दे सकते ? अगर ये संभव नहीं तो मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं है कि मेरे मन में आम्बेडकर साहब का स्थान किसी भी शंकराचार्य की गद्दी से ऊँचा है।

कल्पना मात्र कीजिये कि क्या हाल हुआ होता आपके हिंदुत्व का यदि आम्बेडकर साहब ने मुस्लिम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया होता ? वो तो शुक्र मनाइए वीर सावरकर और प.पू. गुरूजी का जिनके परामर्श से उन्होंने बौद्ध बनना स्वीकार किया और हिंदुत्व को शर्मशार होने से बचा लिया। इसीलिए हे सुबह शाम अनर्गल प्रलाप करने वाले हिन्दू महारथियों कृपया वीर सावरकर और प.पू. डॉ. साहब के अथाह परिश्रम पर पानी मत फेरो। इससे अच्छा है कि अपनी 10% उर्जा दलित उत्थान पर खर्च कर दोे अगर आप अपना थोडा समय भी दलित बस्तियों में बिता दोगे तो शायद आप हिंदुत्व का ज्यादा भला कर पाओगे ेतभी शायद उनके सपनों के भारत के निर्माण में अपना योगदान दे पाओगे।
बाबा साहब माफ करना हमें शायद अभी तक हम उस समाज का निर्माण नहीं कर सके हैं जिसकी कल्पना आपने दशको पहले की थी। एक जातिमुक्त समाज जिसमे कोई छोटा या बड़ा न हो े जिसमे कोई अपृश्य न हो, अछूत न हो। जिसमे सभी को सामान अधिकार और सम्मान मिले े आज हम आपके 125 वीं जन्मजयंती पर ये संकल्प लेते हैं कि अपने प्रिय भारतवर्ष को जाति मुक्त देश बनायेंगे। भेदभाव मिटायेंगे े आपके अनथक परिश्रम को सफल करेंगे। आपकी जन्मजयन्ती पर आपको शत बार नमन।

-अनुज अग्रवाल


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