अच्छी सूरत भी क्या बुरी शय है

जिस ने डाली बुरी नज़र डाली.

आदमी की सोच बदली है. लिहाज़ा ज़माने का नज़रिया भी बदल गया है. सबकी निगाहें तरक्की पर गड़ी हैं. और होड़ चौपायों के भागते झुंड की तरह मची है. ऐसे में उस तरक्की का मर्म क्या है. ये शायद ही किसी के मन में हो. इसीलिए औरत जो समाज को वजूद बख्शने वाली है. जो शक्ति स्वरूपा है. जो ईश्वर के सृजन का बेहतरीन नमूना है. वो अब बाज़ारू बना दी गई है. आख़िर हर विज्ञापन में नारी क्यों.

सूचना प्रौद्योगिकी का ये दौर है. हर हाथ में स्मार्ट फोन है. जो ज़माने की तरक्की की पहचान भी बनता जा रहा है. वही ज़माना जो अंदर से कितना खोखला हो चुका है. सीरत के तौर पर कितना पोंगापंथी हो चुका है कितना खोखला हो चुका है. इसका अंदाज़ा इसके वजूद मिटने के बाद जब वजहें तलाशी जाएगी. शायद तब निकलकर आए. आज दुनिया ग्लोकल हो चुकी है. जिसकी जननी हैं बाज़ारवादी ताक़तें. बाज़ारवाद को इसकी रीढ़ कहें तो भी ग़लत नहीं होगा. इन्हीं ताक़तों की कठपुतली बन गई हैं. आज दुनिया की छोटी सभ्यताएं. छोटे देशों की संस्कृतियां. समाज को सहेजने वाली परंपराएं. तहस-नहस हो रही हैं. भारत जैसा देश जहां महिला शक्ति स्वरूपा है. जहां नारीवादी आदर्श परिपाटी परंपरा ही नहीं ज़िंदगी का मकसद भी रहे हैं. उसका आज पूरी तरह से क्षरण हो चुका है. पहले तो इस नारी को लाज के पहरे का ताना दे देकर इन बाज़ारवादी ताक़तों के एजेंटों ने घूंघट से निकाला. फिर इंसानियत की आज़ादी का हवाला देकर घर की दहलीज़ को पांव की बेड़ियां बताकर सड़क पर ला खड़ा कर दिया. और अब स्वच्छंदता के नाम पर नंगेपन की हर दुहाई दी जा रही है. कभी पर्दे को दमघोंटू बताकर इसकी अस्मत को नीलाम किया. तो कभी तन और मन की आज़ादी का हवाला देकर चरित्र की बंदिशों और आदर्श की बेड़ियों को ग़ुलामी की ज़िंदगी बताकर विद्रोह कराया. जिसके नतीजे में ये औरत जिसका वजूद उसके अस्मत से था. उसे बिकने वाली चीज़. बाज़ार की वस्तु बनाकर छोड़ दिया है. ये शब्द बाज़ारवादियों को चुभेंगे. और उन बाज़ारवादी एजेंटों को खलेंगे. जो समाजवादी और समतावादी और नारीवादी चोले ओढ़कर बैठे हैं. लेकिन यही सच है. और इस चीज़ को अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी कई व्यवस्थाओं ने और पोषित किया है. क्या बात है आज एक नज़र देखने भर से इसी नारी की शिकाय़त पर कोई सलाखों के पीछे पहुंच जाता है. जबकि तरह तरह के विज्ञापनों में बेतरतीब बिना किसी आधार के. कुतर्कों की तरह नंगी निढाल औरतों को उपभोक्तावादी आंखों के सामने परोसा जा रहा है.

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क्या बाज़ारवाद इतना खोखला हो चुका है. कि इसे नारी के अस्तित्व पर निर्मभर रहना पड़ गया है. क्या बाज़ारवाद इतना संवेदनहीन हो गया है. कि इसे इंसान और सामान में फ़र्क़ नज़र नहीं आता. या जीवन की हर पल की संवेदनाओं को लाभ की चवन्नियों की खनकती आवाज़ में दबाया जा रहा है. कुछ विज्ञापन जूते का है. लेकिन औरत का दिखाना ज़रूरी है. वो भी बिकनी में. बेचनी गाड़ी है. लेकिन औरत का नंगाबदन उससे कहीं ज़्यादा दिखाया जा रहा है. बेचना ख़ुशबू और बॉडी स्प्रे है. लेकिन एक मर्द से चिपकी आधा दर्जन बिकनी वाली लड़कियां दिखाना ज़रूरी है. और जब कांडोम या गर्मभनिरोधक पिल्स के विज्ञापन हों. तो क्या पूछना. जैसे पिंजरे में क़ैद परिंदे को खुला आसमान मिल गया हो. संवेदनहीनता के सबसे बड़े रेगिस्तान को पार करते ये बाज़ारवाद हर उस पल की संवेदना को प्रकट करता है. हर उस आहट को तस्वीर बनाता है. हर उस दर्द को आवाज़ देता है. जिससे पत्थर में तब्दील होती इंसानियत समाज का पोंगा पंथी धड़ा एकटक खिंचा चला आए. क्या ये सामान के बिकने की गारंटी होता है. नहीं. असल में ये एक नशा पैदा करने की ओछी और घिनौंनी कोशिश है. जो हर स्तर पर कामयाब होती जा रही है. क्या इस बाज़ारवाद का चरित्र इसी नंगेपन की आह और परछाइयों से बना है. आज ये बाज़ारवाद कितना विकृत हो चुका है. कितनी घिनौनी सोच के बूते आर्थिक तरक्की की गाड़ी को रफ़्तार दिया जा रहा है. क्या इस रफ़्तार की कोई मंज़िल है. आखिर कब रुकेगा संवेदनाओं के दोहन का ये दौर. चरित्र हनन का ये सिलसिला.

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इंसानी वजूद ज़िंदगी की डोर से बंधा सदियों से चला आ रहा है. ज़िंदगी और ज़रूरतें इंसानी वजूद के दो पहलू बन चुके हैं. ये ज़िंदगी ही है. जो हर सुबह हर शाम. दिन दोपहर औऱ रात अपने आप को चलाते रहने के लिए ज़रूरतें पेश करती रहती है. और इन्हीं ज़रूरतों ने पैदा किया बाज़ार. और ये बाज़ार पटा पड़ा है विलासिता की वस्तुओं से. और बाज़ार जो अब ज़रखेज़ बन गई है. इस पर क़ब्ज़ा इंसानों का तो कम धन पशुओं का ज़्यादा हो गया है. वो धन कुबेर जो सामान बेचते बचते हर चीज़ को सामान की नज़र से ही देखने के आदी हो गए हैं. और नज़रिये का ये असर उनके चरित्र में रच-बस गया है. तभी तो इनकी नज़र में बहू हो या बेटी बच्ची हो या जवान. हर वो औरत जिसकी सुन्दरता का मोल मिल सकता है. जिसकी ख़ूबसूरती किसी को अपनी ओर खींच सकती है. वो इस बाज़ार की रौनक बना दी गई है. सामान छोटा हो या ब़ड़ा. ज़रूरी हो या ग़ैर ज़रूरी सबको बेचने के लिए औरत की नुमाइश का बस बहाना चाहिए. तभी तो हर दूसरे विज्ञापन में औरत की नुमाइश को जैसे अनिवार्य बना दिया गया है. भले ही वो बदहज़मी की कोई गोली हो. पीने का पानी या फिर बूढ़े और बच्चों का डाय़पर हो. ऐसे में इस बाज़ारवादी युग से इस बाज़ारवादी समाज से एक बड़ा सवाल है. कि हर विज्ञापन में नारी क्यों. क्या इसका वजूद बस नुमाइश है. इसके सिवाय कुछ भी नहीं.

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लोग अशिया की तरह बिक गए अशिया के लिए.

सरे-बाज़ार तमाशे नज़र आए क्याक्या.

ज़िंदगी है. तो ज़रूरतें हैं. और जब ये ज़रूरतें आराम की मखमली चादर ओढ़ने लगें. तो समझिए अब ये लग्ज़री बन गई हैं. इनसे तौबा कीजिए. क्योंकि विलासिता ज़िंदगी और समाज के ढर्रे को बदल देती  है. समाज और क़ौमों में आयी गिरावट के चश्मे से अगर इसे देखें. तो ये ऐय्याशी का सामान ही कही जाएगी. और जब किसी क़ौम की औरतें ऐय्याशी का सामान बनने लगें. तो समझिए उस देश के बुरे दिन आ गए हैं. सामाजिक समरसता और सभ्यताओं की रीढ़ इन्हीं महिलाओं से तैयार होती आयी है. जिसे अब पूंजीवाद ने दिखावे का सामान बनाकर रख दिया है. ग़नीमत है. इस बाज़ारवादी ताक़त के चंगुल में पूरी क़ौमें. सारी सभ्यताएं पूरी तरह से नहीं आयी हैं. वक्त रहते इस चंगुल से ख़ुद को आज़ाद कराना होगा. वरना. वो दिन दूर नहीं. जब बर्बादियों के क़िस्से पढ़-पढ़कर आने वाली पीढ़ियां आज के समाज को कोसेंगी. और हमारे पास पछताने और टीस दबाने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा. सोचिए. बार-बार सोचिए. कहीं देर ना हो जाए.

शाहिद परवेज़, वरिष्ठ पत्रकार


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