आतंकवाद के आरोप में पकडे गए निर्दोष मुसलमान. जिस तरह जेलों में 5-5 , 10-10 सालों तक निर्मम , अमानवीय यातनाएं सहने के बाद एक-एक कर के बा इज्ज़त बरी होते जा रहे हैं , और जिस तरह इसके बाद भी हर अलर्ट के बाद मुसलमानों को गिरफ्तार किया जा रहा है , उस एकबारगी तो यह लगता है कि यह सारा घटनाक्रम देश के मुसलमानों के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी षड्यंत्र का हिस्सा है . इस षड्यंत्र में पुलिस,प्रशासन,ए टी एस और यहाँ तक कि धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली सरकारें भी शामिल हैं.दूसरी तरफ पिछले कुछ अरसे पहले हमने देखा था कि ” बार एसोसिएशन ” ने एक आदेश जारी कर के मुस्लिम-आतंकियों के केस न लड़ने का फरमान जारी किया था .

जो वकील इन आरोपियों के मुकदमे लड़ रहे थे , उन पर अदालत परिसर में हमले तक किये गए .शाहिद आज़मी जैसे नवजवान वकील को इसी ” अपराध” में मौत के घाट उतार दिया गया. ये सारी घटनाएँ और वाक्यात देश के मुसलमानों को न्याय और संविधान -प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने कि एक परियोजना का हिस्सा लगते हैं जिन पर यदि समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया तो देश में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए एक गंभीर ख़तरा उत्पन्न हो सकता है

मैने आतंकवाद के मामले मे निर्दोष मुसलमानों की गिरफ़्तारी का विरोध बगैर उनके फ़िरक़े को ध्यान मे रखे हमेशा किया है . मुझे कई लोगों ने आग्रहपूर्वक कहा कि आप वहाबी आतंकवाद पर कुछ लिखिए , ,मगर मैने उनको स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि जब लगभग सारे वहाबी आतंकवादी निर्दोष साबित हो कर अंततः जेल से रिहा होते जा रहे हैं ,ऐसे मे वहाबी आतंकवाद को मुद्दा बनाना सिरे से ही गलत है . मस्लकी मामले मे हमारा उनसे सख्त इख्तिलाफ है, मगर यदि दुनियावी मामले मे वे निर्दोष हैं तो हम उन्ही के पक्ष मे फ़ैसला देंगे , जैसे हुज़ूर पाक सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने एक यहूदी के पक्ष मे फैसला दिया था , इंसाफ के उच्च मानदंडों को क़ायम करते हुए

पिछले दिनों जैशे-मोहम्मद से सम्बन्ध रखने के आरोप में दिल्ली पुलिस ने 11 लड़कों को गिरफ्तार किया , जो तबलीगी जमात से सम्बन्ध रखते हैं (जिनमें से 4 को छोड़ दिया गया है ) . . कई दोस्तों ने मुझे मेंशन , बल्कि टारगेट करते हुए कहा है कि आज उन खुदशाख्ता शेरो की कोई पोस्ट क्यों नहीं आ रही है ! जबकि मैंने किसी भी मुसलमान पर होने वाले ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने में कभी किसी का मसलक नहीं पूछा चाहे वो दंगों के शिकार हों या आतंकवाद के मामले में गिरफ्तार हों . मस्लकी इख्तेलाफात अपनी जगह हैं , मगर इंसाफ के मामले में मैं इस फरमाने -इलाही को सामने रखता हूँ –” किसी कौम की दुश्मनी तुमको इस बात पर आमादा न कर दे कि तुम उनके साथ बेइंसाफी करने लग जाओ , बल्कि हर हालत में इंसाफ करो ,क्योकि अल्लाह इंसाफ करने वालों को पसंद करता है .”

उसी तरह कुछ वहाबी हजरात ने सुन्नियों को इंगित करते हुए लिखा है कि आज तो सुन्नियों के कलेजे में ठंडक पहुँच गयी होगी कि 11 वहाबियों को गिरफ्तार किया गया है . यह बात भी आधारहीन है जिसका सच्चाई से कोई सम्बन्ध नहीं है . एक और मित्र ने कहा कि अगर बरेलवी हजरात आरएसएस का साथ न दें तो पुलिस किसी भी तबलीगी को गिरफ्तार नहीं कर पायेगी ! यह भी एक हास्यास्पद आरोप है ,क्योकि इसका अर्थ यह होता है कि इन तब्लिगियों की गिरफ़्तारी के पीछे बरेलवियों का हाथ है ! कुछ हजरात ने तो बाकायदा इसके लिए सूफी कांफ्रेंस में ओलेमा के दिए गए वक्तव्य और तालकटोरा के बयान को ज़िम्मेदार ठहराया . मेरा उनसे सवाल है कि तालकटोरा का सम्मलेन तो अभी अभी हुआ है और मुसलमान युवाओं की गिरफ़्तारी तो दसियों सालों से पुलिस और आतंक रोधी दस्ते के द्वारा लगातार की जा रही है . तब उनको किसने वहाबियों को गिरफ्तार करने को कहा था ? तब किसने ” वहाबी आतंकवाद ” का जुमला इस्तेमाल किया था ?? जब आईबी के जॉइंट डायरेक्टर रहे मलय धर कृष्ण कहते हैं कि ख़ुफ़िया विभाग के आनंद पर्वत स्थित दफ्तर में आर एस एस की विचारधारा के अनुसार अधिकारियों को ट्रेनिंग दी जाती थी , तो समझ लेना चाहिए कि मुस्लिम युवकों की गिरफ़्तारी के पीछे किसका या किनका हाथ है . इसके लिए सुन्नियों को ज़िम्मेदार ठहराना असली अपराधी को बचाना ही है .मुझे समझ नहीं आता कि इन वहाबी हजरात के दिलों में ये बातें कौन डालता है और सुन्नी-वहाबी मतभेदों को और ज्यादा बढ़ाने की साजिश कौन कर रहा है ???

यहाँ मैं बरेली के हजरत तौकीर रज़ा साहब को उद्धृत करना चाहूँगा ,जिन्होंने कहा था कि मस्लकी इख्तेलाफत को मस्जिदों , मदरसों और मुनाजरों तक सीमित रखा जाये तो बेहतर है ,इन मतभेदों को सड़क पे नहीं लाया जाना चाहिए .वरना कल को यह होगा कि जिस तरह सड़कों पर हिन्दू-मुस्लिम या शिया-सुन्नी दंगे होते हैं , उसी तरह सुन्नी-वहाबी दंगे भी सड़कों पर देखने को मिलेंगे ///

इसलिए ख़ास कर ओलेमाओं से मेरी मोअद्दबाना गुजारिश है कि ” वहाबी आतंकवाद :” का जुमला उछालना बंद कर दें , क्योकि यद्यपि आतंकवाद के मामले के साभी आरोपी वहाबी ही हैं / थे , मगर अदालत में भी वहाबी -आतंकवाद साबित नहीं हो पाया है . उनके सारे आरोपी अदालत से बरी हो रहे हैं , उनके 10-10 , 20-20 साल जेलों में बर्बाद हो रहे हैं और उनके नाम पर देश में कार्यरत एक सांप्रदायिक तबका इस्लाम को बदनाम कर रहा है , सो अलग ///

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि ” दुर्भाग्यवश जब भी अदालतों ने पुलिस या जांच अधिकारियों को निर्दोष मुसलमानों को फंसाए जाने का आरोपी पाया ,इन अधिकारियों के खिलाफ कभी कोई कठोर ,कारगर कार्रवाई नहीं हुई . न उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच हुई , न ही अदालतों में उन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का कोई मुक़दमा चला .इससे इन पुलिस अधिकारियों को शह मिलती गयी और वे निर्बाध ढंग से मुस्लिम लड़कों को गिरफ्तार करते रहे .अगर ऐसे अधिकारियों को कठोर दंड नहीं मिला तो ये आगे भी इसी तरह की कार्रवाई करते रहेंगे और मुस्लिम युवाओं की जिंदगियों को बर्बाद करते रहेंगे /// ”

जो कुछ हो रहा है , वह पूरे मुसलमानों के खिलाफ एक षड्यंत्र है , एक अपराध है. इसको सिर्फ वहाबियों से सम्बद्ध करना और इन गिरफ्तारियों के लिए सुन्नियों को ज़िम्मेदार ठहराना सच्चाई पर पर्दा डालना है . चाहे वहाबियों से हमारी कट्टर मस्लकी दुश्मनी हो , चाहे हम फतवों की रु से उन्हे काफिर मानते हों , मगर हम उस अपराध का उन पर इलज़ाम नहीं लगा सकते , जो उन्होंने किया ही नहीं है . हमारे ऐसा करने से चाहे वहाबियों पर कोई असर हो या न हो , मगर उस साझा-शत्रु पर ज़रूर भयानक असर पड़ेगा ., जो मुसलमानों की बर्बादी के मनसूबे बाँध रहा है और सुन्नी-वहाबी मतभेदों को बढ़ावा दे कर इस मंसूबे की तकमील का सपना देख रहा है ///

मोहम्मद आरिफ दगिया


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