कामरान गनी सबा
बिहार में शिक्षा की स्थिति कितनी दयनीय है इसका अंदाज़ा 2017 के इंटरमीडिएट के परिणाम से लगाया जा सकता है. ज्ञात रहे कि इस वर्ष इंटरमीडिएट साइंस में 70 प्रतिशत और कला में 63 प्रतिशत विद्यार्थी असफल हुए हैं  इससे पहले भी कई बार बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठते रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर बिहार में शिक्षा में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है?
 
शिक्षा के गिरते स्तर के लिए ज़िम्मेदार कौन ?
बिहार में शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सरकार, शिक्षा विभाग, शिक्षण संस्थान, शिक्षक और अभिभावक सभी ज़िम्मेदार हैं. परन्तु सबसे अधिक ज़िम्मेदार सरकार और शिक्षा विभाग है. सरकार शिक्षा विभाग के माध्यम से पठन-पाठन को बेहतर बनाने के लिए नए-नए नियम लागु करती रहती है. कई बार इन नियमों पर सख्ती से पालन भी कराया जाता है. विशेष अभियान और कार्यक्रमों के नाम पर कई बार शिक्षकों की छुट्टियाँ तक रद्द कर दी जाती हैं. शिक्षक या स्कुल प्रशासन की तरफ से किसी भी प्रकार की ढील पर उनके खिलाफ सख्त करवाई भी की जाती है. परन्तु शिक्षा विभाग और सरकार की तरफ से यदि कोई ढील होती है तो उनसे प्रश्न करने का हक किसी को नहीं है. `
 
ताज़ा उदाहरण: 
देश के सभी सरकारी विद्यालयों में कक्षा 1 से 8 तक की पाठ्य पुस्तक निशुल्क प्रदान की जाती है. परन्तु बिहार में हर साल कई जगह तो पूरा का पूरा सत्र गुज़र जाने के बाद भी छात्र-छात्राओं को पुस्तकें नहीं मिल पाती हैं. इस साल भी गर्मी की छुट्टियाँ होने तक पाठ्य पुस्तकों की छपाई का काम पूरा नहीं हो सका है. ऐसे में शिक्षक बिना पुस्तक या पुरानी पुस्तकों से ही काम चला रहे हैं. उर्दू दैनिक इंक़लाब की एक रिपोर्ट के अनुसार सितम्बर-अक्तूबर से पहले बच्चों को किताबें मिलने की कोई संभावना नहीं है.
 
शिक्षक संघ भी ज़िम्मेदार: 
शिक्षा के स्तर में गिरावट के लिए एक ओर जहाँ सरकार ज़िम्मेदार है वहीँ शिक्षक समुदाय और शिक्षक संघ भी कम ज़िम्मेदार नहीं है. अपनी मांगो के लिए सड़को पर उतर आने और स्कूलों में ताला तक जड़ देने वाले शिक्षक आखिर छात्र-छात्राओं के हित में धरना प्रदर्शन क्यों नहीं करते? इससे साफ ज़ाहिर होता है कि शिक्षक समुदाय को केवल अपने हित की ही फ़िक्र है.
 
मासूम अभिभावक:
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक आम तौर से कम पढ़े-लिखे और सीधे-सादे होते हैं. उन्हें तो यह भी नहीं पता होता कि सरकार ने उनके और उनके बच्चों के लिए कौन-कौन सी योजनायें बनायीं है. यही कारण है कि वे अपना हक हासिल करने के लिए आगे नहीं बढ़ पाते हैं. 
 
ऐसे में कौन करे पहल: 
सरकारी शिक्षक संस्थानों विशेष रूप से प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए शिक्षक संघों को ही आगे आना होगा. यदि शिक्षक संघ विद्यार्थियों और अभिभावकों के हितों की लड़ाई में उसी प्रकार रूचि लेना शुरू कर दे तो निसंदेह उसे विधार्तियों, अभिभावकों और समाज का भी सहयोग प्राप्त होने लगेगा. 

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