लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
जिन यूरेशियन आर्य-ब्राह्मणों ने अपने ही आर्य-वंशी-यूरेशियन-क्षत्रियों का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार बंद करके चौथे वर्ण में डालकर उनको ‘शूद्र’ बना दिया। उन शूद्रों के पूर्वज अनेक तेजस्वी राजा हुए थे। बाबा साहब ने ऐसे वीर पूर्वजों के वंशज शूद्रों के बारे में गहन अध्ययन, शोध और विश्लेषण करके ”शूद्र कौन थे” नामक ग्रंथ की रचना की। जिसको भारत सरकार द्वारा 1998 से 2013 तक सात बार प्रकाशित किया जा चुका है। जबकि वर्तमान भारत सरकार इसके प्रकाशन में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। जिसके कारण अम्बेड़करवादियों में नाराजगदी दिखाई दे रही है। इस ग्रंथ में बाबा साहब ने शूद्रों के बारे में क्या अधिकृत जानकारी प्रस्तुत की है? इसे निम्न उद्धरणों से आसानी से समझा जा सकता है:-
1-”मैं निश्चय के साथ कहा सकता हूं कि मैंने अपनी इस खोज में स्वयं को पूर्वाग्रह से मुक्त रखा है। शूद्रों के विषय में लिखते समय मैंने शूद्र इतिहास के अतिरिक्त अन्य शेष बातों पर ध्यान नहीं दियाा है।……यह पुस्तक सरल और अबोध शूद्रों के लिये लिखी गयी है कि उनकी यह दशा कैसे हुई और वे हैं कौन? उन्हें पता नहीं कितने करीने से यह ग्रंथ लिखा गया है।”-कृपया देखें भारत सरकार द्वारा प्रकाशित एवं बाबा साहब लिखित ग्रंथ ”शूद्र कौन थे’ के सातवें संस्करण-2013 के प्राक्कथन का पृष्ठ : 9
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2-”निसंदेह मैं जो इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, वह मेरी जिज्ञासाओं और खोज का प्रतिफल है। इस पुस्तक में दो प्रश्नों का उत्तर पाने का प्रयास किया गया है। (1) शूद्र कौन थे? और (2) उन्हें भारतीय आर्य समुदाय का चतुर्थ वर्ण कैसे बनाया गया? संक्षेप में मेरा उत्तर इस प्रकार है:-
(1) शूद्र आर्यों के सूर्यवंशी समुदाय में से ही थे।
(2) एक समय था जब आर्य समुदाय में केवल तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ही मान्यथा थी।
(3) शूद्रों का अलग से कोई वर्ण नहीं था वे भारतीय आर्य समुदाय के क्षत्रिय वर्ण में आते थे।
(4) शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे और ब्राह्मणों को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े।
(5) शूद्रों द्वारा किये गये उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होकर ब्राह्मणों ने फलस्वरूप शूद्रों का उपनयन संस्कार सम्पन्न करवाना बंद कर दिया।
(6) उपनयन संस्कार से वंचित होने पर शूद्र जो क्षत्रिय थे उनका सामाजिक ह्रास हो गया। उनका दर्जा वैश्यों के नीचे हे गया और वे चौथे वर्ण में गिने गये।–कृपया देखें उक्त का पृष्ठ : 3 एवं 4
3-भारत सरकार द्वारा प्रकाशित एवं बाबा साहब लिखित ग्रंथ ”शूद्र कौन थे’ के सातवें संस्करण-2013 का पृष्ठ : 1-”यह बात प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि शूद्र भारतीय आर्यों के समाज का चौथा वर्ण हैं..”
4-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 10 पर बाबा साहब ने ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के हवाले से लिखा है कि- ”भारतीय आर्य जाति पांच कबीलों के समन्वय से बनी है जो भारतीय आर्य जन में एकीकृत होकर एक समान जाति बन गयी।”
5-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 15 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”सवर्ण शब्द आमतौर पर अवर्ण का विलोम है। सवर्ण का अर्थ है जो चारों वर्णों में से कोई एक है। सवर्ण वह है जिसका चारों वर्णों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सवर्ण हैं।”
6-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 54 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-“आर्यों और दासों तथा दस्युओं के बीच अंतर न तो प्रजातीय था और न ही शारीरिक बनावट का। इसीलिये दास और दस्यु आर्य कहे जा सकते हैं।”
7-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 55 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”पश्चिमी लेखकों ने यह कहानी रची कि आर्यों ने आक्रमण करके दासों तथा दस्युओं को पराजित किया।”
8-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 56 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”यह दावा कि आर्य बाहर से आये और भारत पर आक्रमण किया और यह कल्पना कि दास या दस्यु भारत के मूलनिवासी थे, एकदम गलत है।”
9-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 75 एवं 76 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”प्राय: यह संभावना व्यक्त की जाती है कि दास और दस्यु भारत के मूलनिवासी थे और आर्यों से भिन्न जाति थे। आर्यों ने उन्हें पराजित किया, यह तो एक काल्पनिक उड़ान मात्र है।”
10-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 79 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”जहां तक दस्युओं का प्रश्न है ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि इन्हें अनार्य जाति के रूप में माना जा सकता है।”
11-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 80 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”दस्यु भारतीय मूल वंश के नहीं हो सकते।”
12-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 81 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”दास भारत के मूल निवासी आदिवासी सिद्ध नहीं होते।”
13-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 82 एवं 83 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”शूद्र आर्यों (ब्राह्मणों) के विरोधी थे, (इससे) यह तात्पर्य नहीं निकलता कि शूद्र आर्य नहीं थे। वास्तव में वे भिन्न (आर्य) वर्ग या समूह के आर्य थे।”
14-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 85 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”व्याख्या कोई भी हो किन्तु तथ्य फिर भी स्पष्ट है कि सातवीं पीढी में शूद्र परिस्थिति विशेष में ब्राह्मण हो सकता था। शूूद्र यदि आर्य नहीं होते तो इस प्रकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।”….”अर्थशास्त्रियों के अनुसार शूद्र अनार्य नहीं थे।”
15-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 86 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”कौटिल्य (चाणक्य) ने अपने अर्थशास्त्र में शूद्रों को स्पष्ट रूप से आर्य घोषित किया है।”
16-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 86 एवं 87 पर बाबा साहब ने शूद्रों के क्षत्रिय-आर्य होने के प्रमाण जुटाते हुए लिखा है कि-
(1) ”शूद्र क्षत्रिय राजाओं के राज्याभिषेक में सम्मिलित होते थे।”
(2) ”युधिष्ठर के राजतिलक समाराह में ब्राह्मणों के साथ शूद्र भी आमंत्रित किये गये थे।”
(3) ”शूद्र प्रतिनिधियों का ब्राह्मण भी विशेष रूप से सम्मान करते थे।”
(4) ”शूद्र मंत्री होते थे और उनको ब्राह्मणों के बराबर ही प्रतिनिधित्व प्राप्त होता था।”
17-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 89 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”शूद्र यदि मूलत: अनार्य नहीं थे तो कौन थे? मेरे मतानुसार इसके तीन उत्तर निम्न प्रकार हैं:—
(1) —”शूद्र आर्य थे।”
(2) —शूद्र क्षत्रिय थे।
(3) —शूद्र क्षत्रियों में इतने उत्तम और महत्वपूर्ण वर्ण थे कि प्राचीन आर्यों के समुदाय में अनेक शूद्र तेजस्वी और बलशाली राजा थे।
18-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 106 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”शूद्र आर्य ही थे।…यह तो असंदिग्ध है कि वे आर्य और क्षत्रिय थे।”
19-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 124 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”शूद्र क्षत्रियों की ही एक शाखा थे।”
20-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 130 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”ब्राह्मण परशुराम ने क्षत्रियों का संहार कर दिया था तथा जो बच गये थे उनका मूलोच्छेदन मगध के शूद्र राजा महापदम नंद ने कर दिया था। अत: क्षत्रियों का सम्पूर्ण विनाश हो गया। केवल ब्राह्मण और शूद्र बचे थे।”
21-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 138 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”शूद्रों से बदला लेने के लिये ब्राह्मणों ने शूद्रों के विरुद्ध उपनयन (यज्ञोपवीत) विरोध को एक भीषण अणुबम के रूप में प्रयोग कर उन्हें गर्त में ढकेल दिया और उन्हें शमशान तुल्य बना दिया।”
22-उक्त ग्रंथ के पृष्ठ : 164 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”शूद्र यह समझ नहीं पाये कि उपनयन बंद हो जाने के क्या फलितार्थ होंगे।”
23-उक्त ग्रंथ के अन्तिम अध्याय पृष्ठ : 165 पर बाबा साहब ने निष्कर्ष रूप में लिखा है कि-
(1) शूद्र सूर्यवंशी आर्यजतियों के एक कुल या वंश थे।
(2) भारतीय आर्य समुदाय में शूद्र का स्तर क्षत्रिय वर्ण का था।
(3) एक समय आर्यों में केवल तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही थे। शूद्र अलग वर्ण नहीं था, बल्कि क्षत्रिय वर्ण का ही एक भाग था।
(4) शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों में निरन्तर संघर्ष चलता रहा, जिससे ब्राह्मणों को (शूद्रों का) अत्याचार, उत्पीड़न और अपमान सहना पड़ा।
(5) शूद्रों के अत्याचार व उत्पीड़न से त्रस्त ब्राह्मणों ने प्रतिशोध के कारण उनका उपनयन बन्द कर दिया।
(6) उपनयन (यज्ञोपवीत) पर प्रतिबन्ध से शूद्रों का सामाजिक पतन हुआ और (शूद्र) वैश्यों से निचली सीढी पर आ गये। उनका स्तर वैश्यों से भी निम्न हो गया। परिणामस्वरूप वे समाज का चौथा वर्ण बन गये।
24-उक्त ग्रंथ के अन्तिम पृष्ठ : 168 पर बाबा साहब ने लिखा है कि-”मुझे यह कहने का पूरा अधिकार है कि शूद्रों की उत्पत्ति और पतन के संबंध में मेरा मत शुद्ध और त्रुटिहीन तथा युक्तिसंगत है। मेरा कथन है केि इस विषय पर कोई और रचना इससे बेहतर नहीं हो सकती।
लेखकीय टिप्पणी : बाबा साहब के ग्रंथ के उक्त उद्धरणों से शूद्रों को मूलनिवासी जैसे असंगत शब्द के बहाने बहकाकर भारत के मूलवासी सिद्ध करने वाले बामण मेश्राम की हकीकत भी आसानी से समझी जा सकती है। इसके अलावा उक्त विवेचन से यह भी स्वत: प्रमाणित है कि शूद्र वर्ण में केवल आर्य—क्षत्रियों के वंशज—शूद्रों में ओबीसी और आदिवासी शामिल नहीं हैं।
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@—लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’, राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोशिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक), पूर्व रा महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, दाम्पत्य विवाद सलाहकार तथा लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में एकाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। वाट्स एप एवं मो. नं. : 9875066111/दि.13.02.2016/06.33 PM

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