गुलामी प्रथा का इतिहास बहुत पुराना है। दुनिया के अलग-अलग देशों में इसका जिक्र आता है। एक जमाना था जब लोग गुलाम रखते थे और उन्हें इस रिवाज में कोई बुराई नजर नहीं आती थी।

गुलाम भी इसे अपनी किस्मत का फैसला समझकर मंजूर कर लेते थे और इसी में उनकी जिंदगी खत्म हो जाती थी। कई देशों में लोग इसके समर्थन और विरोध में एकजुट हुए। वहां गृहयुद्ध तक हुए।

पैगंबर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने करीब डेढ़ हजार साल पहले ही कह दिया था कि ईश्वर के सामने सभी इंसान बराबर हैं। न किसी अरबी को गैर-अरबी पर प्राथमिकता है और न कोई गैर-अरबी किसी अरब वाले से बड़ा है।

उनके महान जीवन में ऐसी कई घटनाएं आती हैं जब उन्होंने गुलामों से न केवल बहुत अच्छा, बहुत नरमी का बर्ताव किया बल्कि उन्होंने गुलामों को आजाद तक कर दिया था। पढ़िए उनकी बेमिसाल जिंदगी की एक घटना जब उन्होंने एक गुलाम को आजाद कर दिया।

मुहम्मद साहब (सल्ल.) की पत्नी का नाम खदीजा था। खदीजा के एक भतीजे थे, नाम था- हुकैम-बिन-हिजाम। एक दिन खदीजा उनसे मिलने गईं तो एक गुलाम भी साथ ले आईं। वह एक लड़का था।

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मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने उनसे पूछा- यह कैसा लड़का है खदीजा?

खदीजा ने कहा- हुकैम जो मेरे भतीजे हैं, सीरिया से कुछ गुलाम लाए थे। एक मुझे दे दिया।

आपने फरमाया- खुदा की कसम, इसके चेहरे पर शराफत की चमक है। अक्लमंदी और सूझबूझ की अलामतें भी हैं।

खदीजा ने उन्हें बताया- कहा जाता है कि ये बहुत ही प्यार से पला हुआ है। इसे हिबाशा के बाजार में बेचा गया था।

गौरतलब है कि हिबाशा अरब का मशहूर बाजार था। जिस समय इस बच्चे को बेचा गया था, उसकी उम्र 8 साल थी।

आपने गुलाम को बहुत स्नेह भरी निगाहों से देखा और पूछा- बेटे, तुम्हारा नाम क्या है?

बच्चे ने कहा, मेरा नाम जैद है।

आपने पूछा, किस वंश से ताल्लुक रखते हो?

बच्चे ने बताया, मेरे पिता का नाम हारिसा है। दादा का नाम शुरहबील है और परदादा का नाम है – कअब। मेरी मां का नाम सौदा है। वे सालिबा की बेटी हैं और तय कबीले से आई हैं।

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आपने खदीजा से फरमाया, क्या अब ये गुलाम मेरा नहीं है?
खदीजा- हां, हां, क्यों नहीं, यह आप ही का है।

आपने उसी समय जैद को आजाद कर दिया और अपना बेटा बना लिया। फिर उसके मां-बाप के पास आदमी भेजा।

खबर मिलते ही जैद के पिता और चाचा मक्का आ गए। उन्होंने आपसे निवेदन किया।

उन्होंने कहा, हमसे मुंह मांगे दाम ले लीजिए, लेकिन बेटे को छोड़ दीजिए।
आपने कहा, एक सूरत है।
दोनों ने पूछा, क्या?

आपने फरमाया, मैं उसे बुलाता हूं और उसकी खुशी पर छोड़ता हूं। अगर वह साथ जाना पसंद करे तो आप लोग उसे ले जाएं। मुझे दाम देने की जरूरत नहीं और अगर उसने मेरे साथ रहना पसंद किया तो फिर मैं भी उसे नहीं छोड़ता जो मुझे नहीं छोड़ता।

वे बोले, यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है।

आपने जैद को बुलाया और पूछा- देखो बेटे, ये दो मेहमान आए हैं। क्या इन्हें पहचानते हो?

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जैद ने कहा, हां पहचानता हूं। ये मेरे पिता हैं और ये चाचा हैं।

आपने फरमाया, तुम्हारी इच्छा है। चाहो तो इनके साथ घर चले जाओ और दिल चाहे तो मेरे साथ रह जाओ।

जैद फौरन आपसे लिपट गया, बोला – नहीं, नहीं, मैं तो आप ही के साथ रहूंगा।
जैद के पिता को गुस्सा आ गया। उन्होंने जैद से कहा, मां-बाप और वतन को छोड़कर तू गुलामी पर क्यों राजी है?

जैद ने कहा, इन्होंने मुझे गुलाम नहीं बनाया है। इनमें ऐसी खूबियां हैं कि मैं इन्हें कभी नहीं छोड़ सकता।

आपने जैद का हाथ पकड़ा और उसे लेकर कुरैश के पास आए आैर फरमाया- आप लोग गवाह रहें, यह मेरा बेटा है।

जब जैद के पिता ने यह देखा तो वह बहुत खुश हुआ। वह अपना बेटा आप ही के पास छोड़कर खुशी-खुशी अपने घर चला गया। उसे सुकून था कि जो बच्चा आपके पास रहेगा, उसकी फिक्र करने की उसे कभी जरूरत नहीं होगी।


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