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तारिक अनवर चम्पारनी 

जब संसार की सभी आधुनिक सभ्यताएं अंधकार युग (Dark Age) में थी तब ईस्लामिक सभ्यता गोल्डन ऐज से गुज़र रही थी. आज जितनी भी वैज्ञानिक खोज है सभी की बुनियाद ईस्लामिक गोल्डन ऐज में ही डाल दिया गया था. गणित में अलजेब्रा, ज्यामिति, त्रिकोणमिति और कैलकुलस, विज्ञान में एस्ट्रोनॉमी, ऑप्टिक्स, एवोलुशन, एनाटोमी, मेडिसिन, ऑटोमैटिक फ्लूट, समाज विज्ञान में आधुनिक डेमोग्राफी सोशियोलॉजी, हिस्त्रियोग्राफी और अर्थशास्त्र, संस्थानों में हेल्थकेयर, चैरिटेबल और वक़्फ़, कल्चर में कविता, कला, साहित्य, आर्किटेक्ट और फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन इत्यादि ईस्लामिक गोल्डन ऐज में ही अरब ने खोज लिया था. यह कब संभव हुआ? जब अरब की दुनिया केवल अरबी बोलती और समझती थी. शेष की दुनिया से कोई जुड़ाव और लगाव तक नहीं था.


आज मदरसा के आधुनिकीकरण को लेकर बहुत शोर-शराबा है. इस देश के प्रत्येक नागरिक को मदरसा में पढ़ने वाले कुल मुस्लिम छात्रों की मात्र 3.96% बच्चे की फ़िक्र हैं. मेरे गाँव के प्राथमिक विद्यालय के पास अपनी ज़मीन भी नहीं है, उसकी किसी को फ़िक्र नहीं हैं. मैं मदरसा के पाठ्यक्रम में बदलाव का समर्थक हूँ लेकिन भारत सरकार द्वारा के आधुनिकीकरण नीति का विरोधी हूँ.


पुर्तगाल के पुनर्विजय को याद कीजिये, फिलिप-प्रथम ने मुसलमानों और यहूदियों से क्या शर्त रखी थी? पुर्तगाल में रहने के लिए ईसाई बनना जरुरी था, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आरक्षण के लिए हिन्दू बनना आवश्यक है. इसके पीछे एक सुनियोजित चाल थी. मुसलमानों की संस्थायें और भाषा को नष्ट करना. यह दोनों छीन ली गई और अब पुर्तगाल में गिनती के लिये भी मुसलमान नहीं बचे है.


इस मदरसा आधुनिकीकरण के पीछे भी देश की वामपंथी और संघी ब्रिगेड को दो महत्वपूर्ण चाल है. एक, मदरसा को इंटेलिजेंस नेटवर्क से जोड़ना और दूसरी आधुनिकीकरण के नाम पर मदरसों की स्वयत्तता को समाप्त कर धीरे-धीरे ही सही मगर मुसलमानों की संस्थाओं को समाप्त कर देना. जब संस्थायें समाप्त हो जायेगी तो मुसलमानों मे स्वयं का कोई चिंतन और विचार ही शेष नहीं रह जायेगा.

गाँधी का नाम आते ही बहुजनवादी और संघी मिलकर गाँधी को कोसते है, भगत सिंह का नाम आते ही संघी और वामपंथी दोनों एक भाषा बोलते है, सेकुलरिज्म का नाम आते ही वामपंथी और समाजवादी एक पटरी पर खड़े होते है, आरक्षण का नाम लेते ही समाजवादी और बहुजनवादी भाई-भाई हो जाते हैं. यानि सभी विचार के लोग एक निश्चित समय पर सुविधानुसार एक पाले से दूसरे पाले में हो लेते हैं. इसलिये मैं लोड नहीं लेता हूँ क्योंकि मुसलमान का नाम आते ही वामपंथी, संघी, बहुजनवादी और समाजवादी एक ही बोली “मुसलमान कट्टर है” बोलते हैं. यानि की इन्साफ से वंचित रखने का इससे अच्छा फॉर्मूला हो ही नहीं सकता.

स्वतंत्रता के बाद तक मुसलमानों की दर्जनों बिरादरियां शेड्यूल कास्ट में शामिल थी. पंडित जवाहर लाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद की मिलीभगत से दलितों को हिन्दू बनाये रखने के लिए धर्म का क़ैद लगाकर मुसलमानों और ईसाईयों को शेड्यूल कास्ट से बाहर कर दिया. एक सेक्युलर राष्ट्र के एक सेक्युलर संविधान की पहली पहली बार दो तथाकथित सेक्युलर नेताओं ने मिलकर सामूहिक रूप से धज्जी उड़ा दिया. स्वयं को निष्पक्ष और इंसाफपसंद कहलाने वाली वामपंथी, समाजवादी, बहुजनवादी और सेक्युलरवादी ने इस मुद्दे पर चर्चा करने तक का साहस नहीं किया. मुझे, आपकी सेकुलरिज्म से कोई समस्या नहीं हैं. कोई भी विचारधारा आदर्शवादी या कोई भी समाज यूटोपियन सोसाईटी नहीं बन सकती है. मगर, आपके सेकुलरिज्म के दोगलापन से समस्या है.

लेखक समाजसेवी है तथा पिछड़ो एवम दलितों से सम्बंधित एनजीओ से जुड़े है
लेखक समाजसेवी है तथा पिछड़ो एवम दलितों से सम्बंधित एनजीओ से जुड़े है

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