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कोहराम न्यूज़ के लिए दीप पाठक 

कुछ नहीं मंदिरों की जगह पगोडा/बौद्ध मठ बढ जायेंगे वो लोग सर मुडाए भिक्खु बन जायेंगे, घंटी की जगह हाथ से घुमाने वाला झुनझुना होगा और मुंह में “ऊं मनि पद्मे हुम” मंत्र होगा और वो शेष आबादी के लिए ‘ड़ोम, चमार, हरिजन के समकक्ष एक नया शब्द होगा “अरे ये वोई है ! बौद्ध के खोल में छुपा है ! और बौद्ध भी उसी सामाजिक छूत-पाक का शिकार होगा ! हाल वही होगा अंग्रेजों के जमाने में सरकारी संरक्षण प्राप्ति के आश्वासन के बाद भी पहाड़ के जो दलित इसाई बने शेष कुमांउनी गैर दलित समाज उन्हें हिकारत की नजर से ही देखता था और तब ऐसी व्यंगोक्ति बनी-

“हरिया- हैरी जसुवा- जैका,
कैल नी जाणीं च्याल छन कैका ?
(यानी ये जो दलित हरिया हैरी बन गया और ये जसुवा जैक बन गया कौन नहीं जानता ये किनकी औलादें हैं )

हमारे देश में बौद्ध धरम पैदा हुआ जरुर पर बौद्ध के रुप में भारतीय दलित को नहीं हम दलाई लामा और तिब्बती विस्थापितों को देखने के आदी रहे हैं अगर ये धर्म परिवर्तन अंबेडकर के समय में हो गया होता तो शायद लोग भारतीय बौद्ध को आजतक आम तौर पर देखने समझने के आदी हो गये होते मंदिर-मस्जिद के साथ पगोड़ा/बौद्ध मठों के सांप्रदायिक झगड़े देख चुके होते कोई फरक नहीं पड़ता जहां दो झगड़े थे वहां तीन होते ! इस दलित आबादी को बड़ी तादाद में पंजाब-हरियाणा में डेरों ने बांधा कुछ आपू-बापुओं साध्वियों-माताओं ने समेटा पर फिर भी बहुत बच गये जिनके लिए वहां भी जगह नहीं थी !

दलित और ओबीसी के बीच बहूत बड़ा सफल विभाजन भारत के सत्ताधारी धार्मिक कल्ट पहले ही करा चुके हैं दलित के खिलाफ हिंदू धार्मिक कल्ट ओबीसी को आगे कर देंगे और ये तमाम इंसीडेंट में दिखता भी है हां तब जरुर कोई चुनौती मिलती जब दलित ओबीसी सामूहिक तौर पर मुसलमान बन जाते हिंदू धार्मिक “कल्ट” दहशत में आ जायेगा ! पर इस्लाम ने औरतों की जो नारकीय कैद कायम की है और पांच टैम की नमाज अब वो पाबंदी दलितों को स्वीकार्य नहीं होगी भले कुछ भी हो हिंदू धर्म के भीतर पाबंदियां मरने पैदा होने और शादी में होती हैं और गैर दलित आबादी ने इन परंपराओं के लिए सस्ते तरीके ईजाद कर लिये उनका अपना ब्राह्मण होगा और न्यौता भी अपनी जात बिरादरी में होगा हां यहां आर्थिक हैसियत से मजबूत दलित है तो फिर भौंकाल दिखावा तगड़ा होगा उन बरातों/कार्यक्रमों मे आर्थिक रुप से हीन दलित के साथ दलित जैसा ही उपेक्षा का व्यवहार होता है !

आर्थिक रुप से निम्नतम श्रेणी में क्या मुसलमान क्या दलित क्या ठाकुर क्या ब्राह्मण क्या सिकिलगढ़ क्या रायसिख…… ऐसी बस्तियों में सब रहते हैं पर धार्मिक पहचान उनकी एकता को यहां भी बाधित किये रहती है ! एक से आर्थिक हालात होने के बाद भी उनकी धार्मिक/जातीय पहचान उनकी जीवन शैली को बाहर कुछ और बनाये रखती है और घर में कुछ और !

जातीय समस्या का हल मजहब बदलना नहीं है इसका हल राजनैतिक हल होना चाहिए बेहतरीन शिक्षा बेहतर नागरिक मूल्य व्यापक रोजगार का सृजन….. यहां शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार संविधान में लिखी बाध्यता नहीं है बस भलमसाहत भर है ऐसी भलमंशा का नतीजा ये है कि आजादी के इतने बरस बाद नीता अंबानी 3 लाख की चाय पीती हैं और दूसरी तरफ दो दलित जानें महज 15 रुपये न चुकाने की वजह से चली जाती हैं क्या ये महज अपराध है ? पर इन हत्याओं का खून तो भारतीय सरकार के सर जाता है सुई से लेकर जहाज तक सब पर टैक्स सरकार वसूल करती है मुहल्ले के मुहल्ले तक बीट कांस्टेबल को बांटे गये हैं तो हर झगड़ा हर टंटा हर फसाद की जिम्मेदारी सरकार की है संविधान किताब में दूसरा ही है और घटना के बाद पुलिस का सिपाही दरोगा दीवान जो कानून प्रयोग करता है वो संविधान वाला नहीं ह़ोता वो क्या होता है सभी जानते हैं !

दलितों को यह गर्व है कि बाबा साहब ने संविधान बनाया और उसपर ही देश चलता है पर कितना चलता है ये भी वो जानते हैं संविधान तो समाज में अदृश्य भाव से घुला रहना चाहिए उसका ऐसेंस लोगों के व्यवहार में दिखना चाहिए पर जो दिख रहा है वो तो मध्यकालीन बर्बरता है और यह संविधान की अनुपस्थिति प्रतीत होता है !

(नोट-दलित बौद्ध बनें ईसाई बनें मुस्लिम बनें ये उनका चयन है जहां इंसान का दर्जा मिले वो मजहब चयन करना उनकी समझ और अधिकार है )

deep pathak
लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार है तथा घुमक्कड़ी में दिलचस्पी रखते है देश के कोने कोने से परिचित दीप पाठक पहाड़ तथा पहाड़ी लोगो की समस्याएं उठाने में सवैद आगे रहते है

लेखक के निजी विचार है कोहराम न्यूज़ कोई ज़िम्मेदारी नही लेता. पुन: प्रकाशन के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है 


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