सोमवार को नवभारत टाइम्स में एक लेख छपा है जिसमें मशहूर अंग्रेज़ी पत्रकार स्वामीनाथन अंकलेश्वर अय्यर ने बताया कि भारतीय शास्त्रों के अनुसार अतीत में गोमांस खाया जाता था और परोसा जाता था। उन्होंने अपने लेख में भवभूति के नाटक ‘उत्तररामचरित’ का हवाला दिया है जिसके एक प्रसंग में  ऋषि वसिष्ठ के स्वागत में बछड़ा काटे जाने का ज़िक्र है।

कई पाठकों ने इस लेख पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ये सब लेखक की काल्पनिक बातें हैं और ऐसा वेदों या शास्त्रों में कहीं नहीं लिखा है। शास्त्रों का ज्ञाता मैं भी नहीं हूं लेकिन मैंने सोचा कि मैं उन शंकालु पाठकों से शेयर करूं कि स्वामी विवेकानंद जिनके बारे में शायद ही कोई कहे कि उन्होंने शास्त्रों और वेदों का अध्ययन नहीं किया था, इस बारे में  क्या कहना था। नीचे मैं कुछ उद्धरण दे रहा हूं जो स्वामी विवेकानंद के भाषणों, पत्रों और अख़बारी रिपोर्टों से लिए हुए हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट कर दूं इस लेख का यह मतलब कतई नहीं है कि विवेकानंद गोमांस खाने के समर्थक थे। उल्टे वह गोमांस खाने के प्रबल विरोधी थे और कहीं भी, कभी भी उसका समर्थन नहीं किया है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह आज के ‘हिंदुत्ववादियों की तरह’ मूढ़ नहीं थे कि सच को सच मानने से इनकार कर दें। पहले क्यों गोमांस खाया जाता था और बाद में क्यों इस पर रोक लगी, इसका बहुत ही समझदारी से उन्होंने विश्लेषण किया है।

    • हर मनुष्य, हर देश और हर काल में प्रचलित स्थितियों के अनुसार आचरण करता आया है। यदि स्थितियां बदलती हैं तो विचार भी बदलते हैं। गोमांस भक्षण कभी नैतिक था। मौसम ठंडा था और अनाज  उगाने के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। तब मांस ही भोजन का एकमात्र ज़रिया था। सो उस दौर में और उन मौसमी हालात में गोमांस एक तरह से अपरिहार्य था। लेकिन आज गोमांस खाना अनैतिक है।(स्रोत देखें।)
    • एक समय था जब ब्राह्मण गोमांस खाते थे और शूद्रों से विवाह भी करते थे। अतिथि के स्वागत के लिए बछड़ा काटा जाता था। शूद्र ब्राह्मणों के लिए खाना पकाते थे।(स्रोत देखें)
    • इसी भारत में ऐसा भी एक समय था जब गोमांस खाए बिना कोई भी ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं बना रह सकता था; आप वेदों में पढ़ते हैं कि जब कोई संन्यासी, कोई राजा या कोई महापुरुष घर में आता था तो सर्वश्रेष्ठ बैलों को मारा जाता था; लेकिन समय बीतने के बाद लगा कि हम तो कृषक जाति हैं, अपनी सर्वश्रेष्ठ गोसंपदा को मारते रहेंगे तो गोवंश ही समाप्त हो जाएगा। इसी कारण गोवध का प्रचलन बंद कर दिया गया और गोवध के खिलाफ़ आवाज़ उठाई गई।(स्रोत देखें)
    • आपको आश्चर्य होगा यदि मैं आपको बताऊँ कि प्राचीन रीति-रिवाज़ों के अनुसार जो गोमांस नहीं खाता, वह श्रेष्ठ हिंदू नहीं माना जाता था। कुछ अवसरों पर सांड़ का वध कर उनका भक्षण अनिवार्य था। अब यह सब घिनौना लगता है। आज देश के सारे हिंदुओं में इस बात पर समानता है कि वे गोमांस नहीं खाते। प्राचीन बलिप्रथाएं और प्राचीन ईश्वर, अब वे अतीत का हिस्सा हो गए; आधुनिक भारत वेदों के आध्यात्मिक संदेश का वाहक है। (स्रोत देखें)

गोमांस खाना चाहिए या नहीं खाना चाहिए, इस पर विवेकानंद के अपने विचार हैं लेकिन उन्होंने माना है कि अतीत में हिंदुओं द्वारा गोमांस खाया जाता था।  इसलिए जो पाठक यह कहते हैं कि स्वामिनाथन अंकलेश्वर्य अय्यर ने अपने मन से यह सब लिख दिया है, उन्हें अपने मत पर पुनर्विचार करना चाहिए। वैसे जो न मानना चाहें, वे विवेकानंद की समझ को भी नकार सकते हैं।

 

जैसा कि हमने ऊपर विवेकानंद के हवाले से पढ़ा, समय के साथ आचार-विचार बदलते हैं, खानपान बदलता है, लिबास और भाषाएं बदलती हैं। बिल्कुल सही है। पहले कुछ और था, आज कुछ और है, कल कुछ और होगा। इसलिए जो हिंदू गोमांस खाने के विरोधी हैं, उनको इस बात पर झेंपने या बौखलाने की कतई ज़रूरत नहीं है कि अतीत में क्या होता था। अतीत में भी गोमांस खाने और नहीं खाने पर बहस होती थी। आज भी बहस हो। जिसको खाना हो, खाए,  न खाना हो न खाए। लेकिन जबरदस्ती किसी पर न की जाए।

 

मैं ख़ुद भी निरामिष हूं। गोमांस तो क्या, मैं किसी भी तरह का मीट-मछली नहीं खाता। लेकिन मेरे परिवार के बाक़ी सदस्य खाते हैं। मैं उनको नहीं रोकता और वे मुझपर दबाव नहीं डालते कि मैं मीट या मछली खाऊं। देश और समाज में भी ऐसा ही होना चाहिए।

 

नोट- इस ब्लॉग में पहले जो लिंक दिए गए थे, वे विकिपीडिया से लिए गए थे। कुछ पाठकों ने कहा कि विकिपीडिया पर तो कोई कुछ भी डाल सकता है और बदल सकता है। इसलिए अब लिंक मूल साइट से दिए गए हैं जहां की सामग्री कोई संपादित नहीं कर सकता।

 नीरंद्र नागर 
साभार – नवभारत टाइम्स (ब्लॉग)


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