पश्चिमी ,यूरोपीय ,सलीबी इतिहासकारों को आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष माना जाता है और उनके लेखन को निष्पक्ष समझ कर इतिहास की किताबों में विश्व के हर देश के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है .पर यह एक कटु सच्चाई है कि उनकी निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता उस वक़्त उनकी कलम का साथ छोड़ देती है , जब वे इस्लाम , इस्लामी शासन या इस्लामी शासकों के कार्यों , विजयों और उसके साथ या बाद इस्लाम के प्रचार और प्रसार का वर्णन करते हैं . इन मामलों में बहुत कम ऐसे यूरोपी इतिहासकार हैं जिन्होंने इस्लाम के साथ न्याय किया हो और विश्व के समक्ष एक सही , सेकुलर और निष्पक्ष इतिहास पेश किया हो ///

.यह इतिहास की एक सच्चाई है कि मुस्लिमों और सलीबी शासकों के बीच यूरोप में लम्बे अरसे तक भयानक संघर्ष चलता रहा . इस्लाम चूँकि एक ” शोषण विरोधी विचारधारा ” रखता है ., इसलिए अंग्रेजों सहित सभी साम्राज्यवादी देश इस्लाम के खिलाफ एक हो गए थे . जब सलीबी शासक मुसलमानों के साथ तलवार की लड़ाई में हार गए तो उनके इतिहासकारों ने कलम उठा ली और तलवार के मैदान में हुए अपनी हार का बदला लेने के लिए उन्होंने पूरे इतिहास में इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम कर के रख दिया ///
…………स्पेन में जब मुसलमानों का शासन स्थापित हुआ तो उन्होंने वहां की इसाई प्रजा को पूरी धार्मिक आज़ादी दी , उनके गिरजाघर सलामत रहे , उनकी बेटियों की आबरू महफूज़ रही .मगर जब आपसी खाना जंगी के कारण मुसलमानों की हार हो गयी तो सलीबी राजाओं ने वहां ज़ुल्म के जो पहाड़ तोड़े , वो इतिहास का सबसे काला और क्रूरतम अध्याय है . वहां वो सारे काम अंजाम दिये गए , जो तुर्की में मुसतफा कमाल पाशा ने ” सुधार और धर्मनिरपेक्षता ” क नाम पर किये थे .स्पेन में फतह हासिल होते ही इसाई शासकों ने अरबी भाषा को प्रशासन से हटा दिया …तथ्यों और इतिहास में हेरफेर कर के मुसलमानों के शासन को बर्बरता पूर्ण कहा गया और स्पेन के विकास में मुसलमानों के योगदान को इतिहास की किताबों से हटा दिया गया …मुसलमानों को स्पेन और ईसाईयों का ” दुश्मन ” कह कर प्रचारित किया गया .(जैसे आज भारत में सांप्रदायिक ताकतें कर रही हैं )…..इस्लाम के अनुसार संपन्न होने वाली शादियों का पंजीकरण अनिवार्य करवा दिया गया और घर में भी इस्लामी तरीके से शादी करने पर पाबन्दी लगा दी गयी ….चर्च ने ” धार्मिक अदालतें ” कायम कीं , जिनका मकसद स्पेन से मुसलमानों का उन्मूलन करना था .इन अदालतों को ” इनक्वीज़ीशन ” कहा जाता था . इन अदालतों ने मुसलमानों को भयानक सज़ाएँ दीं और सज़ा के ऐसे ऐसे घिनौने तरीके अपनाये जो हिटलर ने भी नहीं अपनाये होंगे .उन्होंने मुसलमानों को जीवित जलवाया ,यह कह कर की इससे उसका पवित्रीकरण होगा .उनकी आँखें निकाली गयीं ,उनके नाखूनों को मांस से खींच कर अलग किया गया ,इन सारी कार्रवाइयों का मकसद यह था कि मुसलमान लोग इस्लाम छोड़ कर ” घर वापसी ” कर लें और इसाई मज़हब को अपना लें ///
……….आज भी ये ” शांति के पुजारी ” युगोस्लाविया ,अल्जीरिया ,उत्तरी अफ्रीका , सुमाली लैंड , कीनिया आदि में अमान , सलामती और राष्ट्र शुद्धि के नाम पर क़त्ले आम करते हैं ….बोस्निया में सर्बियाई ईसाईयों द्वारा मुसलमानों का नरसंहार किसी से छिपा नहीं है …गोरे ईसाईयों द्वारा अफ्रीका के काले मुस्लिमों पर किये गए बर्बर अत्याचार आज भी इतिहास के पन्नों पर लिखे हैं …जब इजराइल ने यरूशलम को जीता तो वहां की मुस्लिम आबादी पर उन्होंने बर्बरतम अत्याचार किये ,उनकी औरतों की आबरू लूटी .शहर की मस्जिदें भी उनके क्रूर हाथों से बच नहीं सकीं .आज भी इजराइल फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश मानने को तैयार नहीं है और १९४८ से ले कर आज तक उसने लाखों फिलिस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया है ///
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इतने क्रूर , घिनौने , बर्बर और अमानवीय अत्याचार करते हुए भी ये मानवता के अपराधी , इन्सानियत के गुनाहगार हर जगह अपनी जुबान से यह ऐलान करते नहीं थकते कि वे दुनिया को आज़ादी , प्रेम , भाईचारा और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने निकले हैं ///
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……………..सैकड़ों सालों से हो रहे इन अत्याचारों के बावजूद अल्लाह की नुसरत और उसके शोषण विरोधी , पूंजीवाद विरोधी चरित्र के कारण पश्चिम को इस्लाम से जबरदस्त चुनौती मिल रही है और आज पश्चिम की हेकड़ी ,नव-साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक आक्रमण के सामने इस्लाम एक चट्टान की भाँती खड़ा है ///
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मुस्लिम राजाओं ने अत्याचार किये होंगे ,इसको खारिज नहीं किया जा सकता .मगर उनके अत्याचारों का वर्णन करने में पश्चिमी इतिहासकारों ने हमेशा अतिरंजना से काम लिया है.इस काम में उनके धार्मिक पूर्वाग्रह पूरी तरह से शामिल रहे हैं . इसलिए आज यूरोप के साथ साथ पूरी दुनिया के इतिहास के पुनर्लेखन की ज़रूरत है .यदि ऐसा हुआ तो शायद दुनिया भर की लाइब्रेरियों की किताबें शीर्षासन करने लगेंगीं और विश्व इतिहास ही उलट पलट हो जायेगा .मगर ऐसा करना ज़रूरी है …ताकि हक़दार को उसका हक मिल सके …और गुनाहगार को उनके गुनाह की सज़ा ///
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” कोई पूछे कि ऐ तहजीबे-इंसानी के उस्तादों ,
ये ज़ुल्म आराइयाँ कब तक ,ये हश्र-अंग्रेज़ियाँ कब तक ?
कहाँ तक लोगे हमसे इन्तकामे-फ़तहे अय्यूबी ,
दिखाओगे हमें जंगे-सलीबी का समां कब तक ??? “

(मोहम्मद आरिफ दगिया )

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