वसीम अकरम त्यागी

दिल्ली का जंतर – मंतर बड़ा सा एक पंडाल है, कुछ मीडिया वाले भी हैं, सामने स्टेज लगी है, स्टेज पर बैठे हुए लोग पढ़े लिखे दिख रहे हैं, क्योंकि उनकी आंखों पर सन ग्लास नहीं बल्कि ‘नजर’ के चश्मे हैं। सामने भीड़ की शक्ल में जो लोग बैठे हैं वे पीड़ित हैं, क्या कहा पीड़ित हैं ? हां जी पीड़ित हैं, पीड़ित हैं तो यहां क्यों हैं अस्पताल क्यों नहीं गये ? अरे एसे वाले पीड़ित नहीं है बल्कि सताये हुए हैं। किसने सताया है ? उन्होंने ही जिनके साथ खेले थे, कुछ के साथ तो स्कूल भी गये थे, कुछों तो एसे संबंध थे जैसे अपने रिश्तेदारों से होते हैं कुछों के घरों में आना जाना था। फिर सताया क्यों ? हां यह सही सवाल किया कि सताया क्यों ? इसी सवाल का तो जवाब तलाशा जा रहा है, कबसे तलाशा जा रहा है ? यही कोई 67 साल से फिर एसा क्या है इस सवाल में कि जवाब नहीं मिलता ? वही तो मैं भी सोच रहा हूं कि आखिर जवाब क्यों नहीं मिलता ? वैसे लोग कहां से आये हैं ? फिलहाल तो ये लोग हरियाणा के बल्लभगढ़ के अटाली गांव से से आये हैं।

फिलहाल तो…… मतलब क्या इससे पहले भी आते रहे हैं, हां इससे पहले वहां से नहीं आये थे, बल्कि मेरठ के हाशिमपुरा के लोगों की तरफ से आये थे। वहां से क्यों आये थे ? अरे 28 साल बाद वे लोग यहां आकर यह मालूम कर रहे थे कि 28 साल पहले उनके परिजनों को किसने मारा था ? और क्यों मारा था ? हम्मम.. तो पता चल गया ? नहीं चला अदालत ने कह दिया कि इन्होंने नहीं मारा था मारने वाले कोई और थे। मगर मरे तो थे न ? हां मरे थे लाशें भी मिली थीं। फिर… कुछ नहीं।

उससे पहले इस जंतर – मंतर पर कहां के लोग आये थे ? मुजफ्फरनगर से, छत्तीसगढ़ से, उड़ीसा से, असम से, नीमच, रतलाम, इंदौर से। वे क्यों आये थे ? वे भी सताये हुए थे ? हां उन्हें भी सताया गया था। घर जलाये थे, कुछों को मार दिया गया, कुछ को जिंदा जला दिया था, कुछों की मकानों दुकानो, रिक्शा, ठेलों, में आग लगा दी थी। किसने लगाई थी यह आग ? बताया तो उन्होंने ही जो उनके पड़ोसी थे।

पड़ोसी एसा क्यों करते हैं ? उन्हें इनकी पूजा पद्धती से एलर्जी है। इसमें एलर्जी की क्या बात है धर्म की आजादी तो कानून भी देता है ? हां देता तो है मगर एक और धर्म होता है जिसे हठ धर्म कहते हैं। यह हठधर्म क्या होता है ? हठधर्म होता है कि जो चंद लोग चाहेंगे वही इस बस्ती में होगा, जैसे किसी को रखना चाहंगे वैसे ही रहना होगा, जब चाहेंगे तब मस्जिद में नमाज पर पाबंदी लगा देंगे, जब चाहेंगे तब किसी भी दाढ़ी वाले को सुअर कहकर संबोधित कर देंगे वगैरा वगैरा,

वैसे एक बात और है इन सबके अलावा भी काम चल सकता है किसी भी दाढ़ी वाले टोपी वाले को पाकिस्तानी कह दिया जाये, या गद्दार ए वतन कह दिया जाये। फिर वह अपनी जिंदगी की 98 प्रतिशत उर्जा इसी में खर्च कर देता है कि वह पाकिस्तानी नहीं है, वह गद्दार नहीं है।

क्या इस तरह से किसी को आहत करने वाले, कानून से मिले मूल अधिकारों की खुले आम धज्जियां उड़ाने वाले, निर्दोषों को मारने वाले, महिलाओं को बेसहारा और विधवा बनाने वाले, बच्चों को यतीम बनाने वाले वे लोग क्या इस देश के गद्दार नहीं हैं ? अरे कैसी बात करते हो गद्दारी का कॉपीराईट सिर्फ एक विशेष समुदाय के पास है। कोई गद्दार होने के बाद भी ‘राष्ट्रभक्त’ है तो कोई अपने पुरखों की कब्रें दिखाने, अपनी छाती पर दुश्मन की गोलियों के निशान दिखान के बावजूद भी गद्दार ए वतन है, यह राष्ट्रवाद का चौला है इसे सिर्फ एक ही समुदाय एक ही वर्ग औढ़ता है, और सिर्फ एक मात्र संगठन विशेष है जहां से राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट मिलता है।

खैर तुम बताओ यहां जंतर – मंतर पर कैसे आना हुआ ? मैं तो गाड़ी का ड्राईवर हूं जी नेता जी ने कहा था कि वहां चलना है सो चला आया। नेता जी……. कौनसे नेता जी… ? वो जो सामने बैठे हैं. अच्छा ये अरे ये तो हारी हुई जमात के नेता हैं इनसे क्या होगा ? यह तो मालूम नहीं जी फोन पर बतियाते आ रहे थे कि अल्पसंख्यकों के मरने से ‘हम जिंदा होते हैं’ हम मतलब इनकी पार्टी। फिर तो सत्ता पक्ष कमजोर हो जायेगा ? नहीं जी.. वह कमजोर नहीं होगा बल्कि उसके नेता तो गली गली अपनी ‘वीरता’ दिखाते फिर रहे हैं और नुक्कड़ सभाओ में कह रहे हैं कि हमने ‘सबक सिखा दिया’ अदालत फैसले के बावजूद भी हमने उनकी जमीन पर उन्हें मस्जिदें नहीं बनाने दीं, मारा पीटा वो अलग… अब देखते हैं साले कैसे आकर रहते हैं यहां ? हां कुछ कमी रह गई….

साला इस बार कल्लन की लड़की का बलात्कार, करना था वह नहीं कर पाये… अटाली बगैर बलात्कार के ही रह गया। चलो कहीं और मौका लगेगा, वहां कर लेंगे इस काम को, वैसे भी अब तक किसको फांसी लगी है जो हमें लगेगी है, यह हिंदुत्व वालों का देश है, मुल्ला तो गद्दार हैं।

पर्दा गिर चुका है, फिर मिलेंगे, किसी और शहर के शौलों में तब्दील हो जाने के बाद……

निष्पक्ष और सच्ची कलम के मालिक वसीम अकरम त्यागी कम उम्र में ही हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में भारत का जाना पहचाना नाम है


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