सैय्यद ज़ैगम मुर्तज़ा

पाकिस्तान या तालिबान एक दिन में नहीं बनते। पाकिस्तान का तो सबको मालूम है लेकिन तालिबान बनाने के लिए जनरल ज़िया को बड़ी मेहनत करनी पड़ी। सऊदी अरब से पैसा और अमेरिका से प्रशिक्षक बुलवाए गए। इज़रायल से विशेषज्ञता हासिल की गई।

पाकिस्तान में रातों रात पांच हज़ार से ज़्यादा मदरसे खोले गए। उनके लिए नया पाठ्यक्रम बना। पाठ्यपुस्तको में अलिफ से अल्ला, बे से बंदूक़ पढ़ाया। इतिहास की किताबें बदलीं। आईएसआई और सीआईए रचित इतिहास पढ़ाया गया। अंततः प्रयोग सफल रहा।

पाकिस्तान आख़िरकार पाकिस्तान बन गया और उनके संस्कृति दूत बने लश्कर, जमात और तमाम मुल्ला गैंग। हम इस मामले में क़रीब तीस साल पीछे हैं। सिर्फ विश्वविद्यालयों में टैंक, नए इतिहास और संस्कृति रक्षकों से ही काम नहीं चलेगा। गांव गांव चल रही शाखाओं, लाठी-तलवार कैंप और दंगा संस्कारों से आगे बढ़कर प्राथमिक स्तर पर गोली और कट्टा संस्कारों को बढ़ावा देना होगा।

क से कट्टा, ख से खड्डा, त से तोप, ब से बंदूक़ और ट से टैंक भी पढ़ाना होगा। लाठी, डंडा, तलवार गैंग वालों को थोड़ा और अपग्रेड करना होगा। अमेरिका और इज़रायल अब हमारे दोस्त हैं ही। स्ट्रिंगर मिज़ाइल, कंधे पर रखकर छोड़े जाने वाले राकेट और स्वचलित हथियार लेकर धार्मिक समूहों में वितरित करने होंगे। इस काम में थोड़ा समय लगेगा सो कम से कम 2024 तक राष्ट्रववादी और धर्म परायण सरकार का बने रहना ज़रूरी है। इसके बाद उम्मीद है कि 2030 तक हम पाकिस्तान को पीछे छोड़ देंगे। तब देश में धर्म का राज होगा और देश को म्लेच्छों से मुक्ति मिल जाएगी।

(लेखक राज्यसभा टीवी से जुड़ें है )

कोहराम न्यूज़ लेखक द्वारा कही किसी भी कथन की ज़िम्मेदारी नही लेता 


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