Shivdaspur, Varanasi, UP

कोहराम न्यूज़ के लिए वसीम अकरम त्यागी का लेख 

भारत में डेढ करोड़ वैश्याऐं हैं यह संख्या कई देशों की की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। इस देश में गंगा (नदी) माता है, गाय (जानवर) माता है, धरती माता है। मगर औरत (इंसान) वैश्या है और वैश्या भी एक या दो हजार नहीं बल्कि डेढ करोड़ हैं। 14 फरवरी को देश पार्कों में जाकर डंडे लाठी से देश के प्रेमी युगल को ‘संस्कृती’ सिखाने वालों को एक बार कोठे पर भी जाना चाहिये। ताकि अपने हाथो से तैयार की गई वैश्या संस्कृति का बदसूरत चेहरा देख सकें। भारत माता है अथवा पिता है इस बहस के बीच यह सवाल जोर से उठ जाना चाहिये कि भारत माता हो या पिता मगर उसकी डेढ करोड़ संतान वैश्या क्यों है ?

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उपदेश देने के लिए नही परिवर्तन लाने के लिए बने है प्रधानमंत्री 

संविधान क्या कहता है ? गांधी जी क्या कहते थे ? बुद्ध क्या कहते थे ? अल्लाह के 99 नाम हैं ? प्लास्टिक सर्जरी भारत में हजारों साल से रही है गणेश जी की नाक प्लास्टिक सर्जरी से लगवाई गई थी। मेरी मत राष्ट्रपति की सुनो ? इन सब बातों को सुनकर भक्त भले ही हर हर मोदी करके छाती पीटते हों मगर इस देश का एक बहुत बड़ा तबका है जो इतने भर से संतुष्ट नहीं है। वह तबका जानना चाहता है कि जिन साहित्यकारों ने आवार्ड लौटाये हैं उनके बारे में मोदी क्या कहते है ? वह तबका सुनना चाहता है कि अखलाक के हत्यारों के बारे में मोदी क्या कहते है ? वह तबका सुनना चाहता है कि थोक में बांटे जा रहे देशभक्ती की सर्टिफिकेट के बारे में मोदी क्या कहते है ?

भारत माता की जय के नाम पर इंसानों की मां को दी जा रहीं गालियों के बारे में मोदी क्या कहते है ? अपनी सरकार का सिर्फ एक ही मज्हब इंडिया फर्स्ट बताने वाले मोदी हिंदुत्व के नाम पर (गौ रक्षा) की जा रही हत्याओं के बारे में क्या कहते हैं ? सवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है और ये सवाल उस तबके हैं जो किसी भी सरकार अथवा व्यक्ति विशेष का भक्त नहीं है बावजूद इसके उस तबके को मोदी भक्त हिंदु विरोधी या देशविरोधी कहकर संबोधित करते हैं। मोदी उपदेश देने के लिये प्रधानमंत्री नहीं बने हैं बल्कि परिवर्तन लाने के लिये प्रधानमंत्री बने हैं। मगर जैसा परिवर्तन उनके पाले हुऐ गुंडे इस देश में करना चाहते हैं वैसा परिवर्तन इस देश को हरगिज नहीं चाहिये।

फूट रही बहुसंख्यकवाद की सड़ांध 

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भारतीय लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद की सड़ांध फूट रही है। यह बहुसंख्यकवाद मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड याकूब मेमन को फांसी देता है, मगर रथ यात्रा के मास्टर माइंड आडवाणी जिसने तमाम देश को दंगों की आग में झोंक दिया था उसे उप प्रधानमंत्री बनाता है। संविधान पर भरौसा करके आत्मसमर्पण करने वाले मेमन को सजा ऐ मौत दी जाती है और उसी संविधान को जूते की नोक पर रखकर समतल जमीन का आह्वान करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से नवाजा जाता है।

हम और हमारा राष्ट्र खौखलेपन से इतरा सकता है कि हम विश्व कै सबसे बड़े लोकतंत्र हैं लेकिन इस बहुसंख्यकवादी लोकतंत्र की लाश कभी हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी के हाॅस्टल में रोहित वेमुला की शक्ल में झूलती पाई जाती है तो कभी झारखंड में मजलूम अंसारी और इब्राहीम की शक्ल में पेड़ पर झूलती पाई जाती है। जिन लोगों ने रोहित को मारा था वे सत्ता में हैं और जिन लोगों ने अखलाक से लेकर इब्रहीम, मजलूम की लाशें बिछाई हैं उन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। मोदी ने दिल्ली में सूफिज्म पर लंबा भाषण दिया है मगर यजीदियत के खिलाफ एक लफ्ज भी न बोल पाये क्योकि भारतीय यजीद उनके ‘अपने’ लोग हैं।

झारखंड हत्याकांड पर मीडिया खामोश क्यों

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नेशन वांट टू नो (देश जानना चाहता है) मगर तुम बताते नहीं कि उन दो मासूम मजदूरों जिनमें से एक बाल मजदूर था का क्या कसूर था जो उन्हें बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया गया ? गाय तुम्हारी माता है यह तो समझ आता है मगर भैंस से क्या नाता है यह तो बताओ ? भैंस से नाता इसलिये मालूम किया जा रहा है क्योंकि अखलाक को गाय मांस के आरोप में मारा था मगर ये मासूम तो पशु व्यापारी थे और गाय नहीं बल्कि भैंस लेकर जा रहे थे फिर भी मार दिया गया। वे मीडिया माध्यम खुद को मुख्यधारा का मीडिया बताते हैं वे क्यों ‘झारखंड’ पर शान्त हैं ?

क्या इसलिये कि मरने वाले मुसलमान थे और मारने वाले तथाकथित देशभक्त हैं ? या अल्पसंख्यकों की मौत महज ‘एंटरटेनमेंट’ है सियासी जमातों के लिये भी और मीडिया के लिये भी ? अब प्राईम टाईम में क्यों नहीं कहते कि देश जानना चाहता है कि जानवर की रक्षा के नाम पर इंसानों को जानवर समझना कहां तक जायज है ? जानवरों की कथित रक्षा के नाम पर इंसानों को लाशों में तब्दील करने का अधिकार कौनसे संविधान ने दिया है ? मीडिया खामोश है ‘मन की बात’ करने वाला ‘चौकीदार भी खामोश है। क्या मीडिया इसीलिये खामोश है क्योंकि यह घटना ‘राम राज्य’ में हुई है ? मीडिया की खामोशी यह बताने के लिये काफी है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ पर राम राज्य वालों का कुत्ता मूत गया है।

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वसीम अकरम त्यागी – लेखक जाने माने पत्रकार और समाजसेवी है

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