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आज इस बर्रेसग़ीर के सबसे चर्चित, सबसे मशहूर, सबसे बदनाम, और फाको में जिंदगी गुजारकर मर जाने वाले मंटो का जन्म दिन है। मंटों पागल खाने में रहा, फाक़ो में रहा, उसका परिवार रोटी के लिये तरसता रहा, और अंततः 42 साल की उम्र में एक दिन वह मर गया। मंटों जिसने अपनी लेखनी में बंटवारे का जिक्र तो बहुत बार किया मगर जब भी उसने 1947 का जिक्र किया वह आजादी के ताअल्लुक से नहीं किया बल्कि ‘बंटवारे’ और ‘तक्सीम’ के ताअल्लुक से किया।

मंटों पर बातें करते हुऐ अचानक देवेन्द्र सत्यार्थी की याद आ जाती है मंटों का मूल्यांकन करना हो तो और मंटो पर लिखे गये दुनिया भर के लेख एक तरफ मगर सत्यार्थी, मंटों पर जो दो सतरें लिख गये हैं उसकी नज़ीर मिलनी मुश्किल है। मंटों मरने के बाद खुदा के दरबार में पहुंचा तो बोला, तुमने मुझे क्या दिया…… बयालिस साल!

कुछ महीने, कुछ दिन, मैंने तो सौगंधी को सदियां दीं हैं। ‘सौगंधी’ मंटों की मशहूर कहानी है लेकिन एक सौगंधी ही क्या मंटों की कहानियां पढ़िये तो जैसे हर कहानी सौगंधी और उससे आगे कि कहानी लगती है। मंटों फरिश्ता नहीं इंसान हैं। इसलिये उसके चरित्र गुनाह करते हैं। दंगे करते हैं। न उसे किसी चरित्र से प्यार है न हमदर्दी। मंटों न पैगंबर है न उपदेशक। उसका जन्म ही कहानी कहने के लिये हुआ था। इसलिये फस़ाद की बेरहम कहानियां लिखते हुऐ भी उसका कलम पूरी तरह काबू में रहा। मंटो के दस्तावेज़ के आखिरी पृष्ठ पर कुछ लिखा है क्या लिखा है यह आप भी पढ़िये।

जमाने के जिस दौर से इस वक्त हम गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब यह है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां हैं, वो इस अहद की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दरअस्ल मौजूदा निजाम का नुक्स है, मैं हंगामापंसद नहीं। मैं लोगों के ख्यालातो-जज्बात में हेजान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीबो-तमद्दुन की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं…लोग मुझे सियाह कलम कहते हैं, लेकिन मैं तख्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफेद चाक इस्तेमाल करता हूं कि तख्ता-ए-सियाह की सियाही और ज्यादा नुमायां हो जाए। यह मेरा खास अंदाज, मेरा खास तर्ज है जिसे फहशनिगारी, तरक्कीपसंदी और खुदा मालूम क्या-क्या कुछ कहा जाता है। लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख्त को गाली भी सलीके से नहीं दी जाती…’।

दुःख, मलाल, इस बात का नहीं है कि मंटों मर गया मरना तो उसको था ही 42 साल का न होकर मरता तो सौ साल का होकर मरता, आखिर एक दिन तो उसको मरना ही था। दुःख इस बात है कि उसके साथ वे कहानियां मर गईं जिन्हें सिर्फ मंटों ही लिख सकता था। मंटों की कब्र पर एक तख्ती लगी है जिस पर लिखा है।
मेरी कब्र का कुत्बा
ये लोह ऐ
सआदत हसन मंटो की कब्र है जो अब भी समझता है कि उसका नाम लोह ऐ जहां पे हर्फे मुकर्रर नहीं था।

Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।
Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

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