meerut-013

पढ़िए कोहराम न्यूज़ के लिए वसीम अकरम त्यागी का लेख 

पीलीभीत में दस जुलाई 1991 को आतंकवादी बताकर मारे गये 10 सिक्खों के कातिल 47 पुलिस वालों को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। अप्रैल 1987 में मेरठ के हाशिमपुरा के 42 लोगों को पीएसी ने जेरेहिरासत कत्ल कर दिया था जिनके हत्यारोपी पिछले साल बरी कर दिये गये। 1987 में हुऐ मेरठ के ही मलियाना जनसंहार के पीड़ित अभी तक अदालतों के चक्कर काट रहे हैं उनके मुलजिमों को भी देर सवेर बरी कर दिया जायेगा। 1993 में मुंबई में सुलेमान बेकरी कांड के आरोपी एसपी आरडी त्यागी और उनकी टीम के 31 पुलिस कर्मियों को निचली अदालत ने फटकार लगाकर छोड़ दिया था। इस कांड में दर्जन भर मजदूर पुलिस की गोलियों से मारे गये थे। अक्टूबर 2012 में दिल्ली से सटे गाजियाबाद के मसूरी में धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गाजियाबाद पुलिस ने गोलियां बरसा दी थी जिसमें सात लोग मारे गये थे और दो दर्जन से अधिक लोग घायल हो गये थे। उन पुलिस वालों के खिलाफ सरकार ने क्या कार्रावाई की ? इसका अभी तक कुछ अता पता नहीं है।

और पढ़े -   'अंतरराष्ट्रीय कुद्स दिवस' फिलिस्तीन और अल-अक्सा की आजादी के लिए एक आवाज...

कश्मीर के कुनान पोशपोरा में 26फरवरी 1990 को सेना के जवानों ने ‘सर्च ऑपरेशन’ के नाम पर पूरे गांव की महिलाओं के साथ बलात्कार किया था जिसमें सबसे कम उम्र की बलात्कार पीड़ित की उम्र 14 बरस और सबसे अधिक उम्र वाली बलात्कार पीड़िता की उम्र 80 साल थी। अभी भी पीड़ितों की आंखें इंसाफ मिलने की बांट जोह रही हैं। कुल मिलाकर पुलिस अथवा सेना द्वारा किया गया पीलीभीत ‘मास मर्डर’ क इकलौता अपवाद जिसमें देर से ही सही मगर इंसाफ मिला है। इसके अलावा जितने भी ऐसे कांड हुऐ हैं उनमें कार्रावाई नहीं हो पाती या फिर कार्रावाई के नाम पर लीपा पौती होती है। जिन अधिकारियों के इशारे पर इस तरह के कांड अंजाम दिये जाते हैं उन्हें कोई अदालत तलब नहीं करती मगर नीचे के अधिकारी ड्यूटी बजाने के चक्कर में अपराध कर बैठते हैं।

और पढ़े -   मस्जिदुल अक्सा के बारें में इजराइल फैला रहा है ग़लतफ़हमी, जानिए आखिर सच क्या है ?

वरिष्ठ पत्रकार Saleem Akhter Siddiqui के मुताबिक पीलीभीत में जब 10 सिखों को आतंकवादी बताकर मार डाला गया था, तब पीलीभीत के एसपी सिटी आरडी त्रिपाठी थे। वे आज भी सीना ठोक कर कह रहे हैं कि मारे गए सिख हार्डकोर आतंकवादी थे। आरडी त्रिपाठी आज इसलिए ऐसा बोल पा रहे हैं, क्योंकि सीबीआई ने पक्षपात करते हुए उनका नाम फर्जी मुठभेड़ मामले से निकाल दिया था। सामूहिक हत्याकांडों में बड़े अफसर हमेशा बचते रहे हैं। छोटे अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जाता रहा है। पीलीभीत में भी ऐसा ही हुआ है। सजा पाए पुलिसकर्मी कह रहे हैं कि बड़े अधिकारियों को बचा लिया गया, लेकिन हमें फंसा दिया गया है। उनका कहना सही है, इतना बड़ा कांड वरिष्ठ अधिकारियों की सहमति और साजिश के बगैर नहीं हो सकता।

और पढ़े -   बताइए उस किशोर को ट्रेन में मारकर आपको क्या मिला?, मैं बताता हूँ ...

वैसे भी उस वक्त तो आतंकवादियों को ‘खत्म’ करने की पूरी छूट सरकार ने दे रखी थी। इंकार तो इससे भी नहीं किया जा सकता कि इस साजिश में तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार की भी भूमिका रही हो। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने न सिर्फ पुलिसकर्मियों की ‘आतंकवादियों’ को मार गिराए जाने की खुले दिल से प्रशंसा की थी, बल्कि उन्हें उनकी ‘बहादुरी’ के लिए पुरस्कृत भी किया था।

Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।
Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें



Facebook Comment
loading...
कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें

SHARE