इंडोनेशिया के बाद मुसलमानों की आबादी भारत में सबसे ज्यादा है। यह बात सच है कि भारतीय इस्लाम में एक उदारता दिखती है, जो वहाबी इस्लाम में नहीं है,

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भारत इतना बड़ा देश है और हमारी समस्याएं भी इतनी बड़ी हैं कि हम अपनी अंदरूनी समस्याओं में उलझे रहते हैं। सो, यहां जब बहस चल रही थी इस बात को लेकर कि क्या भारत माता की जय कहना इस्लाम के खिलाफ है, तो वहां ब्रसेल्स में जिहादियों ने आत्मघाती हमला करके दिखाया एक बार फिर कि वह कहीं पर कभी भी मार सकते हैं बेगुनाह लोगों को। पिछले छह महीनों में यह यूरोप पर दूसरा जिहादी हमला था। सो, अगर विकसित, आधुनिक देशों की सुरक्षा को जिहादी इतनी आसानी से तोड़ सकते हैं, तो भारत में क्या कर सकते हैं। सोचना तो हमें बहुत पहले चाहिए था, लेकिन हमारे अधिकतर राजनेता ऐसे हैं, जो जिहाद शब्द को आतंकवाद से जोड़ने से कतराते हैं।

यहां तक कि जिस प्रधानमंत्री को इस देश के मुसलमान हिंदुत्ववादी कहते हैं, उन्होंने भी हाल में हुए सूफी सम्मेलन में कहा कि इस्लाम का मतलब शांति है और इसलिए इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना नहीं चाहिए। प्रधानमंत्रीजी हम ऐसा करें या ना करें, सच तो यह है कि जिहादी खुद जोड़ते हैं इस्लाम को अपनी बर्बर करतूतों से। जिस इस्लामी देश को इस्लामिक स्टेट के नाम से जाना जाता है वहां शरीअत कानून के मुताबिक ही सब कुछ किया जाता है। आइएस की पत्रिका दबिक में लंबी-चौड़ी बहस होती है इस्लाम को लेकर और उसके बाद ही तय होता है कि याजीदी औरतों को गुलाम बनाना और बाजारों में बेचना जायज है कि नहीं। काफिर पत्रकारों और समाज सेवकों के गले काटे गए हैं तो वह भी शरीअत कानून के मुताबिक। तो ऐसा कहना कि इस्लाम का कोई रिश्ता नहीं है जिहादी आतंकवाद से, न सिर्फ बेवकूफी, खतरनाक भी है।

इंडोनेशिया के बाद मुसलमानों की आबादी भारत में सबसे ज्यादा है। यह बात सच है कि भारतीय इस्लाम में एक उदारता दिखती है, जो वहाबी इस्लाम में नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि आज वहाबी सोच का असर दिखता है कश्मीर से लेकर कन्यकुमारी तक। दिखता है औरतों के बदलते लिबास में और दिखता है इस बात में भी कि मुसलमान अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं, बावजूद इसके कि जितनी आजादी उनको भारत में है अपने मजहब और तहजीब की, उतनी शायद ही किसी दूसरे गैर-इस्लामी मुल्क में दिखेगी। मुसलमानों में असुरक्षा की यह भावना नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद और भी तूल पकड़ गई है, क्योंकि आमिर खान और शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं ने खुल कर कहा है कि ‘बढ़ती असहनशीलता’ से उनको खतरा महसूस हो रहा है। अगर इतने बड़े अभिनेता महफूज नहीं हैं, तो आम मुसलमान अपने आपको कैसे महफूज समझेगा?

इसका फायदा उठा कर जिहादी अपना असर बढ़ा रहे हैं। यह सच है कि आइएस की जंग में शामिल होने भारत से बहुत कम मुसलिम नौजवान गए हैं, लेकिन यह बात भी सच है कि मुसलमान अमेरिका और पश्चिम यूरोप को दुश्मन मानने लगे हैं। मुसलिम मोहल्लों में आम लोगों से बात करें तो ज्यादातर लोग ऐसे मिलेंगे जो मानते हैं कि अमेरिकी सरकार ने 9/11 वाले हमले खुद कराए थे, सिर्फ इसलिए कि वह इराक पर हमला करने का बहाना ढूंढ़ रही थी। यह भी सुनने को मिलता है जगह-जगह कि 26/11 वाला हमला भारत सरकार ने कराया था। ऐसी भावनाओं को भड़काने में हमारे वामपंथी, सेक्युलर राजनेता माहिर हैं। सो, जब भी चुनाव आते हैं, जैसे इन दिनों हो रहे हैं असम और पश्चिम बंगाल में, तो आपको ज्यादातर ‘सेक्युलर’ राजनेता ऐसे दिखेंगे, जो मुसलमानों के साथ हमदर्दी जताने की कोशिश करते हैं उन पर तथाकथित जुल्म की बातें करके।

जब से दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है, मुसलमानों को भड़काना बहुत आसान हो गया है, क्योंकि घरवापसी और बीफ जैसे मुद्दे उभर के ऐसे आए हैं जैसे कि इनका मकसद सिर्फ मुसलमानों को निशाना बनाना हो। ऊपर से समस्या यह भी है कि प्रधानमंत्री ने न कभी अपने हिंदुत्ववादी मंत्रियों को गलत बातें करने से रोका है और न ही आरएसएस के उन सिपाहियों को काबू में लाने की कोशिश की है, जो गोसुरक्षा के बहाने बेगुनाह मुसलमानों की हत्या करते फिरते हैं। ये लोग जानते नहीं हैं कि ऐसा करने से वे सबसे ज्यादा मदद करते हैं उन जिहादियों की, जो खुल कर कहते हैं कि भारत को तोड़ना उनका एकमात्र लक्ष्य है।

भारत की समस्या यह भी है कि हमारे अधिकतर राजनीतिक पंडित और बुद्धिजीवी वामपंथी और ‘सेक्युलर’ हैं, सो जेएनयू में जब भारत को तोड़ने वाले नारे लगे, उन्होंने ऐसे नारों को भुला देने की भरपूर कोशिश की। ध्यान उन नारों की तरफ आकर्षित किया, जो ‘डाक्टर्ड’ निकले। सो, हम भूल गए कि ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह’ वाला नारा डाक्टर्ड नहीं था और न ही भारत की बर्बादी वाला नारा झूठा था। हाल में कन्हैया कुमार और उनके साथी इंडिया टुडे कानक्लेव में भाग लेने आए और उन्होंने स्वीकार किया कि 9 फरवरी की शाम ये नारे लगे थे, लेकिन यह भी कहा कि नारे लगाने वाले नकाबपोश थे और बाहर से आए थे। ऐसा अगर था तो गृहमंत्री क्यों नहीं इन लोगों को ढूंढ़ निकाल रहे हैं?

गृहमंत्री की बात आई तो यह भी कहना जरूरी है कि जेएनयू के छात्रों पर राजद्रोह का आरोप लगा कर उनको गिरफ्तार करना बेवकूफी थी। इसलिए कि ऐसा करके मंत्रीजी ने ध्यान हटा दिया उन नकाबपोश लोगों से, जिनके नारों से साबित होता है कि वे कट्टर जिहादी थे, भारत के दुश्मन थे। छात्रों को गिरफ्तार करने के बदले गृहमंत्री को देश के असली दुश्मनों को पकड़ना चाहिए। भारत की सबसे बड़ी दुश्मन हैं वे जिहादी तन्जीमें, जिनको पूरा समर्थन मिलता है पाकिस्तान की सेना से। जिहादी आतंकवाद से भारत को उतना ही खतरा है, जितना पश्चिम यूरोप के देशों को है। (jansatta)


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