उत्तराखंड में टूरिज्म की अपार संभावनाऐं हैं पर ये टूरिज्म बहुत महंगा बैठता है खाना, रहना और 15-20 दिन उत्तराखंड भ्रमण करना कम से कम दो-ढाई लाख रुपये चाहिए ! या तो बंगाली पर्यटक की तरह एक समूह बनाकर अपना खाना खर्च योजना बना के चलो मितव्यिता से रोडवेज-केमू-जेमू से चलो यहीं के आम जन में घुल मिल जाओ, धर्मशाला में रुको खुद पकाओ अपना बिस्तर भांडा बरतन लेकर चलो ! KMVN औऱ GMVN के हाल सब जानते हैं इनका नाम तो है पर आम औसत खर्च पर पर्यटन करने वाले के लिए इनका कोई नाम/अस्तित्व नहीं है !

uttarakhand tourism is costly and not faithful tourism

उत्तराखंड में पर्यटन को कैसे “आम आदमी की जेब के लायक” बनाया जाय इस पर सोच रहा हूं किराया महंगा, खाना महंगा, होटल/लाज महंगे, सुविधाओं की कमी, कठिन भगौलिक परिस्थिति……….

गांवों के मंदिरों/धर्मशालाओं/पंचायत भवनों में रुकने और पकाने के लिए भांडे-बरतन हों पर्यटक वहां रुके देखे घूमे-फिरे सौ खर्च करे या नौ खर्च करे अपने बजट से करेगा ही फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट बस जीप से आगे सफर करे ! रात रुकने का और खाने का खर्च आम पर्यटक की जेब और बजट में समा जाय तो उत्तराखंड में अपार पर्यटन होगा कुछ लोग शांति की खोज में आते हैं कुछ अय्याशी करने आते होंगे खैर वे हाई-फाई लोग ठैरे उनकी चिंता नहीं है उनके पास संपर्क-संसाधन पैसे-पत्ते की समस्या नहीं है समस्या उनकी है जो वास्तव में उत्तराखंड में यात्रा करना चाहते हैं यहां की प्रकृति के बीच जाना समझना चाहते हैं !

दीप पाठक – लेखक जाने माने साहित्यकार तथा समाजसेवी है

इस वक्त जो हालात हैं उनमें तो उत्तराखंड का पर्यटन देश में सबसे महंगा और बेभरोसे का है और अच्छे पर्यटन स्थलों की वहां के स्थानीय लोगों ने ही कुकुरगत्त कर रखी है ! भले उनके होटल-तंबू महीनों से खाली पड़े हों पर कोई भूला भटका उधर आ गया तो ऐसे रेट बताऐंगे जैसै सब उसी से वसूल कर लेंगे ! ऐसे में हो लिया टूरिज्म !! और अगर खुदा-न-खास्ता आम टूरिस्ट बुग्यालों की जन्नत तक पहुंच गया तो फिर रुपकुंड ग्लेशियर में उसके कंकाल ही मिलेंगे पांडवों की तरह सशरीर स्वर्ग जाने का रास्ता भी उत्तराखंड की ऊंचाईयों में यूं ही नहीं बताया गया है !

वैसे हेमामालिनी यहां की ब्रांड अंबेसडर हैं शायद तो कोई एड वैड ही कर दिया होता “कहां चलोगे बाबूजी ? कुमांऊं, गढ़वाल, पिथौरागड़, रामगड़……यूं कि बाबूजी पहुंच तो जाओगे वापस आने की आपकी हैडैक ठैरी !


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