माफ कीजिए, मैं बहुत गुस्से में हूं। इतना गुस्से में हूं कि कसाब जैसे दुर्दांत आतंकवादी से भी माफी मांग लेना चाहता हूं कि हम तुमसे गलत वजहों से नफरत करते रहे। इतना गुस्से में हूं कि उज्ज्वल निकम जैसे प्रचारित राष्ट्रभक्त के मुंह पर दो-चार जड़ देना चाहता हूं। नहीं, मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा क्योंकि मैं उज्ज्वल निकम जैसा नहीं हूं। होना चाहता भी नहीं हूं। ऐसा झूठा और बेहया होना मैं तो बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा। उन्होंने जानबूझ कर झूठ फैलाया कि कसाब ने मटन बिरयानी की मांग की है, कसाब के लिए लोगों की सहानुभूति कम करने के लिए। लेकिन, मैं गुस्से में उज्ज्वल निकम की वजह से नहीं हूं। गुस्सा मैं हाशिमपुरा दंगे में आए फैसले से हूं।

40 से ज्यादा लोगों को पुलिस ( पीएसी) पकड़कर ले जाती है। कुछ दिन बाद उन लोगों की गोलियों से छलनी लाशें नहर में तैरती मिलती हैं। 28 साल तक मामला इस कोर्ट से उस कोर्ट में धक्के खाता रहता है और फिर फैसला क्या आता है? सबूत नहीं है इसलिए सब बरी। 22 मई 1987 को मेरठ दंगे के दौरान वे 47 मुसलमान जरूर अपने आप PAC के ट्रक में चढ़ गए होंगे। ट्रक अपने आप किसी अनजान जगह चला गया होगा। वे सारे लोग ट्रक में से उतरे होंगे और खुद को गोली मारकर और नहर में कूद गए होंगे। उन्हें ले जाने वाले 19 मासूम पुलिसवालों को 28 साल तक केस भुगतना पड़ा। तीन तो इस दौरान जिंदगी पूरी भी कर गए। खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि आज वे सब बरी हो गए हैं। सच की जीत हुई है। बधाई।

(फोटोः प्रवीन जैन की है, जो मैंने इंडियन एक्सप्रेस अखबार की वेबसाइट से ली है, साभार)

पर मजे की बात देखिए, उन 16 लोगों पर हत्या का मुकदमा चल रहा है (इसे नरसंहार क्यों न कहा जाए?) और उनकी एसीआर में इस बात का जिक्र तक नहीं है। वे बड़े आराम से नौकरी करते रहे। प्रमोशन पाते रहे। कोर्ट कहती है कि अभियोजन पक्ष कोई सबूत पेश नहीं कर सका। क्यों पेश करेगा सबूत अभियोजन पक्ष? उसे क्या पड़ी है? आपको क्या लगता है, उसे परवाह है न्याय की? महान अभियोजन पक्ष तो केस जीतने या हारने के लिए कसाब ने मांगी बिरयानी जैसे बेहूदा जहरीले झूठ फैलाने से नहीं चूकता। फिर चाहे इस तरह के झूठ समाज को दो फाड़ कर दें, खाने की एक चीज के नाम पर हमेशा के लिए जहरीला ठप्पा लगा दें। (निकम पर गुस्सा कम नहीं हो रहा है मेरा।)

मेरे एक दोस्त ने सही कहा, ‘बेवजह राग अलापते हैं सांस्कृतिक विविधता, लोकतंत्र की आत्मा, सुंदरता, फलाना-ढिमका। मेरी राय है कि अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, ईसाइयों को देश का कोई एक हिस्सा देकर ठिकाने लगा देना चाहिए। धार्मिक आधार पर जम्मू का भारत में विलय करवा लेना चाहिए, कश्मीर के मुसलमानों को पाकिस्तान के हवाले कर देना चाहिए। सांस्कृतिक विविधता जाए तेल लेने।’

नहीं, मैं क्यों छिपाऊं इस दोस्त का नाम! जब ये बेशर्म लोग इस तरह के झूठ बोलने से नहीं डरते तो मैं सच बोलने में क्यों झिझकूं? शाहनवाज मलिक है उस दोस्त का नाम। मुसलमान है। और जानते हैं मैंने शाहनवाज को क्या जवाब दिया? मैंने कहा, ‘जमीन का एक इंच टुकड़ा नहीं देंगे। लोग जाते हैं तो जाएं, नहीं तो बिना हिस्सा दिए ही ठिकाने लगा दिया जाएगा।’ यही तो हो रहा है। जो ठिकाने लगाने वाले हैं, कैसे उन्हें जमानतें मिल रही हैं? माया कोडनानी से लेकर डीजी वंजारा तक। अजीब है न। ऐसा क्या हो गया है कि अदालतें इन सब पर रहमदिल हो गई हैं? इतने सालों से ये लोग जेलों में थे, तब अदालतों को तरस क्यों नहीं आ रहा था? अब क्यों? क्या बदला है मितरों?

शाहनवाज से मैं कहना चाहता हूं कि दोस्त, मैं बहुत शर्मिंदा हूं। कसाब के लिए, हाशिमपुरा के उन दर्जनों रिक्शा चलाने वालों, रेहड़ी लगाने वालों, दर्जियों, मजदूरों के लिए जो सिर्फ इसलिए घर नहीं आए कि वे मुसलमान थे।

खबर साभार नवभारत टाइम्स

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