प्राइम टाइम इंट्रो : उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने पर सवाल कायम

संविधान दिवस के मौके पर 27 अप्रैल 2015 को राज्यसभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली यही तो सदन को आश्वस्त कर रहे थे कि राज्यों में अनुच्छेद 356 के बेज़ा इस्तमाल की आशंकाएं समाप्त हो चुकी हैं। तीन महीने के भीतर वही अरुण जेटली ब्लॉग लिख रहे हैं कि क्यों उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला संविधान सम्मत है। हिन्दी और अंग्रेज़ी में लिखे उनके ब्लॉग में विनियोग बिल यानी एप्रोप्रिएशन बिल के फेल हो जाने को केंद्रीय तर्क बनाकर पेश किया गया है। उन्होंने अपने ब्लॉग में विनियोग बिल के पास होने या न पास होने को लेकर कई उदाहरण और तर्क पेश किये हैं। हम सिर्फ उन्हीं पंक्तियों को यहां पेश कर रहे हैं ताकि विनियोग बिल के बारे में स्पष्ट हो सके कि हुआ क्या था उस मामले में। हिन्दी में उनके ब्लॉग का शीर्षक है बजट बिना एक राज्य।

कांग्रेस पार्टी के 9 सदस्यों ने विधानसभा में विनियोग विधेयक के विरुद्ध मत देने का फैसला किया। 18 मार्च 2016 को 35 सदस्यों ने विनियोग विधेयक के विरुद्ध तथा 32 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया। विधानसभा की लिखित कार्यवाही से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि सदस्यों ने मतविभाजन की मांग की थी लेकिन इसके बावजूद विनियोग विधेयक मतदान के बगैर पारित होने का दावा किया जा रहा है। इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि विनियोग विधेयक वास्तव में मत विभाजन में गिर गया था। एक अप्रैल 2016 से व्यय की मंज़ूरी देने वाले विनियोग विधेयक को मंज़ूरी नहीं मिली थी। अगर विनियोग विधेयक पारित नहीं हुआ था तो 18 मार्च 2016 के बाद सरकार का सत्ता में बने रहना असंवैधानिक है।

कानून पर वित्त मंत्री की पकड़ की साख न होती तो ऐसे मसलों पर वाकई कानून मंत्री ब्लॉग लिख रहे होते जिनका नाम सदानंद गौड़ा है। ख़ैर वित्त मंत्री ने विनियोग विधेयक के बारे में लिखा है क्या उनसे सवाल की गुंज़ाइश पैदा होती है। जैसे वित्त मंत्री कहते हैं कि विनियोग मत विभाजन में गिर गया था। तो क्या सदन में मत विभाजन हुआ था? आरोप तो यह है कि स्पीकर ने मत विभाजन की अनुमति नहीं दी। आरोप है कि स्पीकर ने ध्वनि मत से विनियोग विधेयक पास होने का ऐलान कर दिया।

विनियोग विधेयक के पास या फेल होने के साथ-साथ मत विभाजन के नियम और स्पीकर के अधिकार को भी समझना होगा। क्या स्पीकर बाध्य है कि वह मत विभाजन की मांग को स्वीकार ही करेगा और बाध्य है तो स्पीकर मना कर देता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई के क्या प्रावधान हैं। स्पीकर ने ध्वनि मत से जो विधेयक पास किया है क्या उसे चुनौती दी जा सकती है। राज्यपाल ने खारिज कर दिया तो यहां क्या राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह स्पीकर के फैसले को पलट दे। मेरे पास सारे के जवाब नहीं हैं मगर वित्त मंत्री के ब्लॉग से कई सवालों को लेकर जिज्ञासा हो रही है। वित्त मंत्री ने विनियोग विधेयक के बारे में अपने ब्लॉग में लिखा है कि ‘ध्‍यान देने वाली बात यह है कि आज की तारीख तक न तो मुख्यमंत्री न ही विधानसभा अध्यक्ष ने विनियोग विधि की प्रमाणित प्रति राज्यपाल के पास नहीं भेजी है। इसलिए स्वाभाविक है कि विनियोग विधेयक को राज्यपाल की मंज़ूरी नहीं मिली है।’

अब सवाल ये उठता है कि क्या 18 मार्च को कथित रूप से ध्वनि मत से विनियोग विधेयक पास कराने के बाद स्पीकर या मुख्यमंत्री ने उसे राज्यपाल के पास भेजा था। क्या स्पीकर या मुख्यमंत्री ये तथ्य पेश कर सकते हैं कि भेजा था। वित्त मंत्री तो लिखते हैं कि नहीं भेजा था और आज तक नहीं भेजा है। लेकिन जिस विनियोग विधेयक को लेकर सरकार गिर गई और राष्ट्रपति शासन लग गया उसके बारे में राज्यपाल ने जानकारी क्यों नहीं मांगी या मांगी तो नहीं दी गई। क्या सारा फैसला विनियोग विधेयक की प्रमाणिक प्रति देखे बिना ही ले लिया गया या फैसला यूं हुआ कि विधेयक की प्रमाणित प्रति भेजी ही नहीं गई।

दैनिक उत्तराखंड, हिन्दुस्तान और अमर उजाला ने इस सवाल को लेकर खबर छापी थी। अलग-अलग ख़बरों के मुताबिक 18 मार्च को पास किया गया विनियोग विधेयक स्पीकर ने तुरंत राज्यपाल को भेज दिया था। वित्त मंत्री कहते हैं कि आज तक विधेयक की प्रमाणित प्रति नहीं भेजी गई। हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा के सूत्रों के अनुसार आज यानी 28 मार्च को राजभवन को इसकी प्रमाणित प्रति भेजी गई है। चूंकि ये जानकारी सूत्र आधारित है इसलिए हम इस पर दावा नहीं कर सकते लेकिन अगर ये सही जानकारी है तो विनियोग विधेयक को प्रमाणिक प्रति अभी कैसे भेजी गई। किसी ने मांगा या स्पीकर को इसका ख्याल आया। आज उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि राज्यपाल को भेजे गये विनियोग विधेयक में कोई छेड़छाड़ ना की जाए और उसे उसी रूप में अब केंद्र से पास कराया जाए क्योंकि ये एक बहुमत वाली सरकार की ओर से पास किया गया विनियोग विधेयक है।

वित्त मंत्री अपने ब्लॉग में विनियोग विधेयक के बारे में आगे लिखते हैं कि विनियोग विधेयक पर कथित चर्चा और उसके पारित होने संबंधी सभी तथ्य साफ तौर पर इसके पारित न होने की ओर इशारा करते हैं। इशारा करते हैं या पक्के तौर पर कहते हैं कि विनियोग विधेयक पास ही नहीं हुआ। फिर वित्त मंत्री अगले पैराग्राफ में क्यों लिखते हैं कि ‘विनियोग विधेयक के बारे में गंभीर आशंका है। विनियोग विधेयक पारित न होने पर सरकार को 18 मार्च को ही इस्तीफा दे देना चाहिए था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।’

मतविभाजन हुआ या नहीं, नहीं हुआ तो मतविभाजन में कैसे यह विधेयक गिर गया। विधेयक की प्रमाणिक प्रति राज्यपाल को भेजी गई या नहीं भेजी गई। स्पीकर ने विधेयक को प्रमाणित किया या नहीं किया। या तो विनियोग विधेयक पास हुआ या नहीं हुआ लेकिन यहां एक तीसरी स्थिति उभर रही है कि गंभीर आशंका है कि पास हुआ। जेटली ने लिखा है कि हर बात के प्रमाण के तौर पर दस्तावेज़ मौजूद हैं। आगे लिखते हैं कि ‘अगर विधानसभा अध्यक्ष की बात सही मानें कि बागी विधायकों ने विनियोग विधेयक के पक्ष में मतदान किया इसलिए यह पारित हो गया है, तब बागी विधायकों को अयोग्य करार नहीं दिया जा सकता।’

स्पीकर और कांग्रेस ने कहा कि 9 सदस्य विरोधी दल के साथ राजभवन मतविभाजन की मांग करने गए थे इसलिए उनके वकीलों की दलील सुनने के बाद ही अयोग्य ठहराया गया। पत्रकारों ने पूछा कि राष्ट्रपति शासन लगने के बाद क्यों अयोग्य करार दिया गया तो स्पीकर ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति शासन लगने की लिखित सूचना नहीं है। यानी सदस्यता रद्द करने का सवाल एक सवाल है, यहां सवाल है कि जब 35 सदस्य कह रहे हैं कि वे सरकार के साथ नहीं हैं और सरकार के पास बहुमत नहीं है तो स्पीकर ने ध्वनि मत से पास होने का ऐलान कैसे कर दिया। स्पीकर ने यह भी कहा कि अगर सदस्यों को लगता है कि सरकार अल्पमत में है तो उन्होंने सदन में बहुमत साबित करने की मांग क्यों नहीं की। ध्यान रखियेगा कि जब वित्त विधेयक सदन में गिर जाता है तो वो भी एक किस्म का अविश्वास प्रस्ताव ही माना जाता है। हमने एम एन कौल और एस एल शकधर की किताब प्रैक्टिस एंड प्रोसिजर ऑफ पार्लियामेंट किताब में जाकर देखा कि मत विभाजन को लेकर स्पीकर के क्या अधिकार हैं तो ये जानकारी मिली। पेज नंबर 974 पर मत विभाजन की स्थिति में स्पीकर के अधिकार दिए गए हैं।

पेज 974 मत विभाजन की अनुमति नहीं देने के बारे में स्पीकर के विशेषाधिकार बताता है। इसमें कहा गया है कि वॉइस वोट पर स्पीकर के फ़ैसले को बिना चुनौती दिए कोई सदस्य चाहे तो स्पीकर को अपना नाम रिकॉर्ड करने के लिए अनुरोध कर सकता है। स्पीकर चाहे तो अनुरोध को स्वीकार कर सकता है अगर उसे लगे तो मामला महत्वपूर्ण है और हाउस में इसके पक्ष में आम राय है। पेज 118 में कहा गया है कि सदन के अंदर स्पीकर का अधिकार सर्वोच्च है और ये अधिकार उसकी पूर्ण निष्पक्षता के आधार पर उसे हासिल होता है। पेज 123 का सेकंड पैरा कहता है कि मंत्रालयों के सवाल पर स्पीकर को कई अधिकार हासिल हैं। हालांकि सवालों को स्वीकार करने को लेकर नियम बनाए गए हैं लेकिन उसकी व्याख्या का अधिकार स्पीकर के पास होता है।

एक सवाल राजभवन की भूमिका को लेकर है। राज्यपाल ने पहले दस दिन का समय दिया कि सरकार सदन में बहुमत साबित करे। फिर राज्यपाल ने रिपोर्ट भेजी कि संवैधानिक संकट है। तो क्या राज्यपाल ने स्पीकर को सूचना दी कि अब वे बहुमत साबित करने का प्रस्ताव वापस लेते हैं या राज्यपाल जिसे चाहें जो भी रिपोर्ट भेज सकते हैं। जब विधेयक गिर गया था तब राज्यपाल ने सरकार को बहुमत साबित करने का मौका क्यों दिया वो भी दस दिन।

स्टिंग ऑपरेशन की दलील दी जा रही है कि एक मुख्यमंत्री लेन देन की बात करते दिख रहा है। इस लिहाज़ से तो राष्ट्रपति शासन बंगाल में लागू हो जाना चाहिए था जहां के कई नेता मंत्री और सासंद पैसे लेते हुए स्टिंग ऑपरेशन में दिखते हैं। 15 अक्टूबर 2014 को महाराष्ट्र में चुनाव थे। उससे एक महीना पहले 28 सितंबर को कांग्रेस एनसीपी का गठबंधन टूट गया था तब वहां राष्ट्रपति शासन लगा था। विपक्ष को आशंका हो रही है कि सहयोगी संघवाद का नारा देने वाली बीजेपी अब संघ की सरकारों को गिराने में सहयोग करने लगी है। बीजेपी कह रही है कि संवैधानिक संकट है तो क्या करें। अरुणाचल प्रदेश के मामले में कांग्रेस ने यही आरोप लगाया था मगर वो सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा हार गई। वहां अब बीजेपी की सरकार है।


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