आलमी मंज़र नामा पर रौनुमा होने वाले वाक़ियात और उन के रद्द-ए-अमल में मुख़्तलिफ़ ममालिक के माबैन बदलते रवाबित वुज़ू इबत के हवाले से बात की जाये तो ये बिलकुल वाज़िह है कि आज के हालात में हुकूमत की सतह पर हो या अवामी सतह पर दोस्ती और दुश्मनी के पैमाने यकसर बदल गए हैं।आज ज़रूरत इस बात की है कि दुश्मनों से भी दोस्ती के वो मुशतर्का मवाक़े ढ़ूंढ़े जाएं जहां इख़तिलाफ़ात की गुंजाइश कम से कम हो।इस शोबे में जो कोशिशें की जा रही हैं इस में बड़ी तस्वीर नज़र आरही है ।वो एशिया को यूरोप पर फ़ौक़ियत देने की कोशिश की तरफ़ इशारा कररही हैं।इन हालात का तजज़िया करें तो रूस,अमरीका और बर्तानिया अपनी शातिराना चालबाज़यों में मसरूफ़ नज़र आते हैं।हिंदूस्तान जुनूबी एशिया का ऐसा ख़ित्ता है जिस में सालार बनने की पूरी सलाहीयत मौजूद है हालाँकि चीन की पूरी कोशिश है कि वो इस मुआमले में बाज़ी मार्ले ।दूसरी तरफ़ शुमाली ख़ित्ते में ईरान इस कोशिश में लगा हुआ है कि इस घुड़-दौड़ में वो आख़िरी वक़्त पर अपनी गर्दन आगे करके ये रेस जीत ले मगर तुर्की अपनी पूरी तहम्मुल मिज़ाजी के साथ बराबरी पर है ।
बात दुश्मनी की करें तो आलमी सतह पर पूरी दुनिया एक अजीब मख़म्मसा में उलझी हुई है।उस वक़्त लोग ये समझने से क़ासिर हैं कि ये ख़लफ़िशार क्यों और किस ने बपा कररखा है ।आज़ाद रियास्तों को ताराज करके उस की तहज़ीब वसकाफ़त के फ़ख़र आमेज़ बाक़ियात को मिटाने की ख़ौफ़नाक और ख़तरनाक साज़िश का मुहर्रिक किया है और इस का कंट्रोल किस के हाथ में है, इस बात को समझने के लिए जहन्नुम रसीद सदर बर्तानिया मारग्रेट थैचर की वो बात याद रखी जाये जब उन्हों ने ये बाबरकत जुमला कहा था कि ‘हमें नए दुश्मन की कोई ज़रूरत नहीं क्यों कि इस्लाम नाम का दुश्मन मौजूद है’।
चलिए साहिब वो तो साफ़ गो निकलें और बरमला अपनी नफ़रत का इज़हार कर गईं मगर सच्च तो यही है कि आलमी सतह पर ये दुनिया मज़हबी बालादस्ती की जंग में मुबतला करदी गई है ।यानी फिर वही बात कि मेरा ख़ुदा तुम्हारे ख़ुदा से बड़ा है।दुनिया इस हक़ीक़त से ख़ूब अच्छी तरह वाक़िफ़ है कि मुस्लमान मुट्ठी भर ही क्यों ना हूँ ग़ालिब आजाते हैं।बशर्त वो मुत्तहिद हूँ।इस लिए उन के इत्तिहाद को मुंतशिर करके ही उन्हें इस ग़लबे से बाज़ रखा जा सकता है ।सवोह अपनी हिक्मत-ए-अमली में कामयाब नज़रआरहे हैं।इराक़ विशामि और अब यमन इस का बैन सबूत हैंका मुस्लमान शीया सुनी के दो धड़ों में तक़सीम किया जा चुका है ।यूरोप इस मुआमले में जारिहाना रवैय्या इख़तियार करता दिखाई दे रहा है ।बर्तानिया ,अमरीका ,रूस ,फ़्रांस और इसराईल इस मैदान कारज़ार में शमशीर ब्रहना लिए पा बह रकाब हैं।
इस्लामो फोबिया का प्लेग यूरोप को इस क़दर परेशान कररहा है कि वो ख़ौफ़ में मुबतला हैं कि जाने कब, कहाँ और किस को इस्लाम की गिल़्टी निकल आए।उन्हें अपना वजूद मिटता दिखाई दे रहा है। इसलिए उन्हों ने दानिस्ता तौर पर मुस्लमानों की तहज़ीबी वसकाफ़ती दस्तावेज़ात से लबरेज़ ममालिक को नीस्त वनाबूद करने के लिए ख़ानाजंगी बपा कर रखी है ताकि वो इस ख़ानाजंगी और दहश्तगर्दी के नाम निहाद फ़ित्ना से निमटने के नाम पर इन बाक़ियात ओ रासार को मिटा दें जिस की मौजूदगी मुस्लमानों के ईमान को जिला बख़शती है और दीन तवाना होकर उन्हें ग़लबा की भरपूर तहरीक देता है ।क्योंकि यही तारीख़ रही है ।मुस्लमानों के ख़िलाफ़ यूरोप की मुशतर्का हिक्मत-ए-अमली के बरअक्स एशियाई ममालिक की आपसी मुस्तहकम अवामी वतजारती रवाबित इस जंग को एक दूसरी नहज पर ले जाऐंगे।और यक़ीनन ये भाई चारा यूरोप पर एशिया को फ़ौक़ियत दिलाने की जानिब एक अहसन क़दम होगा।मुक़ाबला इस्लाम बनाम ग़ैर इस्लाम ना होकर ख़ुशहाल वतरक़ी के हवाले से यूरोप और एशिया के दरमयान होगा।ऐसे में अगर एशियाई ममालिक तनाज़ाती मुआमलात को दरकिनार करके बाहमी तरक़्क़ी के रवाबित पर तवज्जा मर्कूज़ करें तो मादनियात से भरपूर एशिया को यूरोप पर फ़ौक़ियत हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता ।और एशियाई ममालिक के मज़बूत विमसतहकम रवाबित दुनिया को दरपेश न्यूकलीयाई जंग से महफ़ूज़ रखने में एक अहम क़दम साबित होसकते हैं ताकि दुनिया में इंसान ज़िंदा रह सके और इंसानियत फ़रोग़ पा सके ।दुनिया को मज़हबी-ओ-सरहदी लड़ाईयों से महफ़ूज़ रखने के लिए इस्लाम ने ‘मुशावरत और मुआहिदा ‘के सुनहरी रहनुमा उसूल वज़ा कर रखे हैं जिन को शद-ओ-मद से नाफ़िज़-उल-अमल करने की ज़रूरत है।इस हवाले से तुर्की एक क़दम आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है ।तुर्की की तारीख़ का जायज़ा लें तो हालिया हुकूमत अपनी पूरी आब-ओ-ताब के साथ इस्लामी ख़द्द-ओ-ख़ाल के आईने में अपने उसूल वुज़ू इबत के साथ आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
हज़ार साला तारीख़ी ,तहज़ीबी और सक़ाफ़्ती मुमासिलत ने तुर्की और हिंदूस्तान को हमेशा एक दूसरे की तरफ़ मुतवज्जा रखा है मगर कुछ कड़वाहट भी रही है ।तुर्की ने मुसलमानान हिंद और हकूमत-ए-हिन्द से देरीना रवाबित की अज़सर-ए-नौ तजदीद के लिए 2008से ही कोशिशें शुरू करदी थीं जिस का सहरा सदर तुय्यब रजब अरदगान के सर जाता है ।दोनों ममालिक के माबैन सिफ़ारती सतह की आमद-ओ-रफ़्त, तिजारती ताल्लुक़ात ,सदारती मेहमान नवाज़ी पिछले कुछ सालों में बढ़ी है ।010में तुर्की ने पब्लिक डिप्लोमेसी का शोबा क़ायम किया जिस ने मुख़्तलिफ़ ममालिक में अवामी राबते को मज़बूत करने की सिम्त पेशरफ़्त की है ।मुसलमानान हिंद दुनिया की दूसरी सब से बड़ी आबादी होने के बावजूद सिर्फ़ इसलिए इस्लामी ममालिक में होने वाली तरक़्क़ी और ख़ुशहाली का हिस्सा नहीं बिन पाते क्योंकि हिंदूस्तान मुस्लिम ममालिक का हिस्सा नहीं है (और होभी नहीं सकता)मगर यहां के मुस्लमान आलमी मुस्लिम बिरादरी का हिस्सा ज़रूर हैं।ख़ास बात ये है कि हमें अपने तशख़्ख़ुस को बरक़रार रखते हुए इन तरक़्क़ी और ख़ुशहाली के मवाक़े की ज़रूरत है जो मुस्लिम ममालिक के बाहमी राबते उन के अवाम तक बहम पहुंचाते हैं।अगर हिंदूस्तान के तिजारती ताल्लुक़ात तुर्की ,सऊदी अरब और इंडोनेशिया(-20)ममालिक से बढ़ते हैं तो इसका सीधा फ़ायदा मुल्की सतह पर होगा मगर बिलवासता मुसलमानान हिंद को होगा।014में नई हुकूमत की तशकील के बाद मोदी हुकूमत की ख़ारिजा पालिसी ने वाज़िह इशारे दिए कि तिजारती और सक़ाफ़्ती सतह पर भारत अपनी वसीअ हिक्मत-ए-अमली रखता है ।इस सिलसिले में आली क़ियादत से लेकर वज़ारती सतह तक बहुत तेज़ अमल देखने को मिला ।जहां दूसरे ममालिक से ताल्लुक़ात की उस्तिवारी सामने से दुखी वहीं अंदरखाने तुर्की से भी रवाबित बढ़े हैं।वस्त जनवरी 2015में वज़ीर-ए-ख़ारजा मुहतरमा शुसमा स्वराज ने तुर्की का ग़ैरसरकारी दौरा किया।फरवरी में बाहमी बातचीत में कुछ और पेशरफ़्त हुई ।ये तमाम कोशिशें हुकूमती सतह पर जारी थीं।साथ ही डाक्टर तस्लीम अहमद रहमानी (परेसीडनट मुस्लिम पोलीटिक्ल काउंसल आफ़ इंडिया),चीफ़ ऐडीटर हफ़तरोज़ा ‘मिशन ‘010से ही तुर्की के अवामी राबिता महिकमे के राबते में रहे और उन की कोशिश रही कि एक आली सतही हिंदूस्तानी वफ़द तुर्की का दौरा करे ।बलाआख़र उन की कोशिशें रंग য৒ब लाएंगे और हुकूमत तुर्की की जानिब से उन्हें वफ़द का ख़ाका तैय्यार करने के लिए कहा गया ।डाक्टर रहमानी ने मुस्लमानों के दरमयान उर्दू मीडीया की मक़बूलियत और रसाई और तुर्की ज़बान से उर्दू की देरीना वाबस्तगी को मद्द-ए-नज़र रखते हुए उर्दू सहाफ़ीयों ,मुस्लिम सयासी लीडरों और समाजी कारकुनान पर मुश्तमिल नामों की एक लिस्ट तुर्की सिफ़ारतख़ाना को सौंप दी ।बातचीत का दौर जारी रहा और अवाइल मार्च में हुकूमत तुर्की के पब्लिक डिप्लोमेसी डिपार्टमैंट की जानिब से 14रुकनी वफ़द का दावतनामा मौसूल हुआ।डाक्टर तस्लीम अहमद रहमानी की क़ियादत में 23मार्च से9मार्च तक ये वफ़द तुर्की हुकूमत का मेहमान रहा जिस ने इस्तंबोल ,अनक़रा और गाज़न टेप (सीरिया बॉर्डर ,रीफ़ेवजी कैंप)का दौरा किया और वहां के हालात से वाक़फ़ीयत हासिल की।
अवामी राबते की कड़ी में ये पहला वफ़द है जिस ने तुर्की हुकूमत की मेहमान नवाज़ी का शरफ़ हासिल किया ।उम्मीद है कि ये दौरा दोनों मुल्कों के माबैन तिजारती ,सक़ाफ़्ती और तहज़ीबी ताल्लुक़ात की उस्तिवारी में संग-ए-मील साबित होगा।
23से 30 मार्च 2015तक तुर्की के मसरूफ़ तरीन दौरे के बाद तमाम ही अराकीन वफ़द वतन वापिस लूट आए हैं । वफ़द में मुस्लिम पोलेटिकल काउंसल आफ़ इंडिया के सदर डाक्टर तस्लीम अहमद रहमानी,ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत के कारगुज़ार सदर मुज्तबा फ़ारूक़ , वेल्फेयर पार्टी के नायब सदर मौलाना अबद उल-वह्हाब खिलजी, हफ़तरोज़ा” मिशन” की मैनिजिंग ऐडीटर तसनीम कौसर , दरगाह अजमेर के गद्दी नशीन सलमान चिशती , दरगाह इमाम रब्बानी सरहिंद के मुंतज़िम साहिबज़ादा मुहम्मद ज़ुबैर , जामि मस्जिद दिल्ली के नायब इमाम सय्यद शाबान बुख़ारी , मुस्लिम मजलिस-ए-अमल के सेक्रेटरी तारिक़ रहमत बुख़ारी , माइनोर्टी फ्रंट के सदर ऐस ऐम आसिफ़ ,रोज़नामा इन्क़िलाब के ऐडीटर शकील हुस्न शमसी रोज़नामा सियासत के न्यूज़ ऐडीटर आमिर अली ख़ान, एतिमाद के ब्यूरो ऐम ए माजिद,उर्दू टाईम्स के मैनिजिंग ऐडीटर इमतियाज़ अहमद मंज़ूर अहमद , अख़बार मशरिक़ के ऐडीटर वसीम उल-हक़ शामिल थे ।

तसनीम कौसर


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