नई दिल्ली।

रेलवे के पुनर्गठन के रास्ते तलाशने के लिए बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में बनाए गए पैनल ने कई सुझाव दिए हैं। पैनल का कहना है रेलवे की हालत सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर उदारीकरण करने की आवश्यकता है। पैनल ने सिफारिश की है कि प्राइवेट कंपनियों को ट्रेन चलाने की इजाजत मिलने चाहिए और रेलवे को अपना काम नीतियां बनाने तक सीमित रखना चाहिए।

देबरॉय पैनल ने सलाह दी है कि प्राइवेट सेक्टर को यात्री ट्रेन और मालगाड़ी चलाने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्हें वैगन, कोच और लोकोमोटिव निर्माण की इजाजत दने की भी जरूरत है। पैनल ने रेलवे के कामों की कमर्शल अकाउंटिंग करवाने की भी बात कही है। उच्च-अधिकार पैनल ने सबसे बड़े सरकारी परिवहन माध्यम को वेलफेयर कार्यक्रमों से दूर रहने की भी सलाह दी है। पैनल ने कहा है कि रेलवे को स्कूल और हॉस्पिटल चलाने जैसे कामों से खुद को दूर रखना चाहिए।

कमिटी ने एक सरकारी एसपीवी (जिसमें भविष्य में विनिवेश किया जा सकता है) बनाने का भी सुझाव दिया है। इस एसपीवी के पास रेलवे के इन्फ्रास्ट्रक्चर का मालिकाना अधिकार होगा। कमिटी ने सभी मौजूदा प्रॉडक्शन यूनिट्स के स्थान पर इंडियन रेलवे मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाने का भी सुझाव दिया है। इसके साथ ही रेलवे स्टेशनों के लिए भी अलग कंपनी बनाने की सलाह दी है।

कमिटी ने निजी क्षेत्र को यात्री और मालवाहक गाड़ियां चलाने की इजाजत मिलने के बाद रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय से अलग एक स्वतंत्र नियामक संस्था बनाने की बात भी कही है। इस संस्था का काम किराए की दर, सर्विस कॉस्ट का निर्धारण, ट्रैक प्रबंधन, अन्य कामों के लिए तकनीकी मापदंड तय करना होगा। पैनल का कहना है कि इस संस्था को रेलवे रेग्युलेटर अथॉरिटी ऑफ इंडिया (आरआरएआई) कहा जाए।

पैनल का कहना है कि रेल मंत्रालय का काम केवल नीति-निर्माण होना चाहिए और उसे रेलवे के रोजमर्रा के कामों से दूर होना चाहिए। इसके साथ ही पैनल ने ममता बनर्जी के कार्यकाल में कोलकाता मेट्रो रेल कॉर्पोशन को रेल मंत्रालय से अलग करने के फैसले को भी सही बताया है। खबर एनबीटी


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