najaf

मैंने क़बीलातंत्र और राजतंत्र से लेकर मार्क्सवाद तक दुनिया की राजनीतिक विचारधाराएं पढ़ने और समझने की कोशिश की हैं। शासन के सभी विगत और वर्तमान सिद्धांत भी देखे हैं।

मुझे उन सबों में सबसे मानवीय और सबसे प्रगतिशील विचार सातवी सदी के हज़रत अली इब्ने अबू तालिब उर्फ़ हज़रत अली के लगते हैं। मक्का के काबा में जन्मे हज़रत अली पैगम्बर मुहम्मद के चचाजाद भाई और दामाद थे जो कालांतर में मुसलमानों के खलीफा बने।

उनके प्रति लोगों में श्रद्धा इतनी थी कि उन्हें ‘शेर-ए-खुदा’ और ‘मुश्किल कुशा’ की उपाधियां दी गईं। दुर्भाग्य से दुनिया के किसी भी मुल्क, यहां तक कि किसी इस्लामी मुल्क ने भी शासन में उनके विचारों को कभी तवज्जो नहीं दी। उनके कुछ विचार आप ख़ुद पढ़ कर देखें ! अगर कोई शासक इन्हें अमली जामा पहनाए तो क्या हमारी दुनिया स्वर्ग नहीं बन जाएगी ?

  • ‘अगर कोई शख्स भूख मिटाने के लिए चोरी करता पाया जाय तो हाथ चोर के नहीं, बल्कि बादशाह के काटे जाय।’
  • ‘राज्य का खजाना और सुविधाएं मेरे और मेरे परिवार के उपभोग के लिए नहीं हैं। मै बस इनका रखवाला हूं।’
  • ‘तलवार ज़ुल्म करने के लिए नहीं. मज़लूमों की जान की हिफ़ाज़त के लिए उठनी चाहिये !’
  • ‘जब मैं दस्तरख्वान पर दो रंग के खाने देखता हूं तो लरज़ जाता हूं कि आज फिर किसी का हक़ मारा गया है।’
  • ‘किसी की आंख तुम्हारी वजह से नम न हो क्योंकि तुम्हे उसके हर इक आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा।’.
ध्रुव गुप्त
ध्रुव गुप्त

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