Tomb of Hazrat Raabia Basari

बरसात आने से पहले हवाओं में एक खास किस्म की खुशबू घुल जाती है। अक्सर ऐसे मौसम में मुझे कागज की नाव बनाना बहुत पसंद है। जब आसमान से पानी की बूंदें बरसती हैं और आंगन में पानी भर जाता है तो मैं इन नावों को पानी में छोड़ देता हूं। ये मुझे समंदर में तैरते हुए जहाज जैसी लगती हैं।

मैंने समंदर, बरसात और जहाजों के कई किस्से पढ़े हैं। खासकर पुराने जहाजियों की वो बहादुरी भरी यात्राएं जो किसी खजाने के लिए की जाती थीं। मैं सपनों में ऐसे जहाजियों के बीच होने की कल्पनाएं करता था जो किसी खजाने को ढूंढ़ने जाते थे, मगर कुछ सफर ऐसे भी होते हैं जो किसी खजाने के लिए नहीं किए जाते। बल्कि उनका मकसद खजाने से भी बहुत ऊंचा होता है। वो है हज का सफर।

आज भले ही लोग हवाई जहाज से हज करने जाते हों, मगर बहुत वक्त नहीं गुजरा जब समुद्री जहाज हाजियों से भरे होते थे। उनकी आंखों में आंसू और होठों पर रब का नाम होता। वे समंदर की ऊंची लहरों को देखकर भी घबराते नहीं थे। सिर्फ जहाज में बैठे दुआ करते रहते। वह बहुत लंबा सफर होता जिसके लिए वे कई वर्षों से तैयारियों में जुटे रहते। वे इबादत करते और हर रोज अपनी कमाई से एक छोटा हिस्सा बचाते ताकि हज के लिए जरूरी इंतजाम कर सकें।

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समुद्री जहाज के अलावा दूसरा जरिया था पैदल अथवा किसी जानवर की सवारी। यह सबसे पुराना तरीका है। हर साल काफी लोग मक्का के लिए पैदल ही रवाना होते। वे रेत के ए​क​ विशाल रेगिस्तान पर अपने कदमों के निशान छोड़ते हुए आगे बढ़ते जाते। पीछे हवाएं इन कदमों को धुंधला कर देतीं या मिटा देतीं, लेकिन राही पीछे मुड़कर नहीं देखते।

मगर कुछ कदम मिटने के बाद और ज्यादा गहरे हो जाते हैं। चाहे जमाना उन्हें न पहचाने, रब ऐसे हर कदम को पहचानता है। मक्का की ओर जाने वाले ऐसे असंख्य कदमों में कुछ कदम राबिया के भी हैं।

हजरते राबिया (714 या 718 ई.—801 ई.) महान क​​वयित्री थीं। उन्हें अरब की मीरा भी कहा जाता है। उनका जन्म इराक के बसरा में हुआ था। राबिया का परिवार बहुत गरीब था। इतना गरीब कि जब उनका जन्म हुआ तो न बच्ची का तन ढंकने के लिए कोई कपड़ा था और न दीया जलाने के लिए तेल।

हजरते राबिया अंधेरे में पैदा हुई थीं, पर उन्होंने अपने जीवन में जिन कविताओंं की रचना की, उनका उजाला आज तक बरकरार है। वे किसी राजा—बादशाह की बड़ाई में नहीं, बल्कि रब की शान में कविताएं रचती थीं। वे कविताएं बहुत ऊंचे दर्जे की होतीं जिन्हें लोग आज भी खूब पढ़ते हैं। राबिया की कविताएं पढ़ना वे किसी इबादत से कम नहीं समझते।

हजरते राबिया बहुत सादगी से जिंदगी गुजारतीं। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि हज करने जरूर जाएं। इसके लिए वे अपने खर्चों में कटौती करतीं। इस तरह काफी वर्षों बाद उनके पास इतनी रकम जमा हो गई कि वे हज पर जा सकें। आखिरकार वह दिन भी आ गया जब हजरते राबिया हज के लिए रवाना हुईं।

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रेगिस्तानी और पथरीले रास्तों को पार करती हुईं वे मक्का की ओर चली जा रही थीं। चलते—चलते शाम हो गई। हजरते राबिया एक बस्ती में पहुंचीं तो क्या देखती हैं कि एक घर से किसी औरत के कराहने की आवाजें आ रही हैं।

उन्होंने घर का दरवाजा खटखटाया। एक पुरुष ने दरवाजा खोला। पूछताछ करने पर बताया कि उसकी पत्नी प्रसव पीड़ा से छटपटा रही है। घर में न अनाज था, न कपड़ा और न ही रोशनी के लिए तेल। बहुत ही गरीब परिवार था।

हजरते राबिया से उस परिवार का दुख देखा नहीं गया। उसने अपनी बचत के पैसों से एक बड़ी रकम निकालकर उस पुरुष को देते हुए कहा कि बाजार से जरूरी सामान खरीदकर ले आए।

इसके बाद राबिया कमरे में दाखिल हुईं तथा उस औरत की देखभाल में जुट गईं। उधर घर का स्वामी बाजार से सामान खरीदकर लौटा तो खबर मिली कि लड़का हुआ है। वह बहुत खुश हुआ और राबिया का आभार जताने लगा। उस परिवार के लिए हजरते राबिया के कदम खुशियां लेकर आए थे, इसलिए दंपत्ति ने आग्रह किया कि रात को वे उन्हीं के यहां विश्राम करें।

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हजरते राबिया ने उनकी बात मान ली। देर रात को उन्होंने सपना देखा कि एक फरिश्ता दो किताबें लिए खड़ा है। उन्होंने पूछा — इन किताबों में क्या लिखा है? फरिश्ते ने बताया — पहली किताब में उन लोगों के नाम लिखे हैं जिन्हें रब इस साल हज पर जाने का मौका देगा। दूसरी किताब में उन खुशनसीब लोगों के नाम हैं जिनका हज रब कुबूल फरमाएगा।

हजरते राबिया ने फरिश्ते से पहली किताब ली और अपना नाम ढूंढ़ने लगी। पहला पन्ना … दूसरा पन्ना … पांचवां … दसवां, इस तरह वे हर पन्ना पलटती गईं लेकिन उनका नाम मिल नहीं रहा था। ढूंढ़ते—ढूंढ़ते वे आखिरी पन्ने पर चली गईं तो सबसे आखिर में राबिया का नाम लिखा था। अब उन्होंने दूसरी किताब ली और अपना नाम ढूंढ़ने लगीं। इस किताब के सबसे पहले पन्ने पर सबसे ऊपर हजरते राबिया का नाम लिखा था।

सबक

हजरते राबिया की जिंदगी से जुड़ी यह घटना हमें एक बड़ी शिक्षा देती है। अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी की तकलीफ में काम आना, जरूरतमंद की मदद करना भी रब की एक बहुत बड़ी इबादत है। हजरते राबिया ने भूखों का पेट भरने और अंधेरे में रोशनी फैलाने के लिए जिंदगी भर की कमाई कुर्बान कर दी। यही वो कुर्बानी है जो सबसे पहले व सीधे रब तक पहुंचती है।


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