शेष नारायण सिंह

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को दबोच लेने की केंद्र सरकार की तैयारी शुरु हो गई है। जब भी भाजपा वाले सरकार में आते हैं, शिक्षा संस्थानों को काबू में करने की कोशिशों को तेज कर देते हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में डॉ. मुरली मनोहर जोशी शिक्षामंत्री थे तो उन्होंने एक आईएएस अफसर को फुलटाइम इसी काम पर लगा दिया था और उस अफसर ने सबसे पहले भारतीय प्रबंध संस्थानों (आईआईएम) को निशाना बनाया था। लेकिन सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। दो बातें थीं—एक तो आईआईएम के पुराने छात्रों का दुनिया भर में दबदबा था उन्होंने हर तरफ से केंद्र सरकार पर दबाव डलवाया। दूसरी बात यह थी कि वाजपेयी सरकार को जोड़ कर बनाया गया था। स्पष्ट बहुमत नहीं था। उस सरकार के पास मनमानी करने का अधिकार नहीं था। एक बात और थी कि उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने देश की राजनीतिक सत्ता के प्रबंधन में छात्र राजनीति की ताकत को देखा था। जीवन भर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रहे थे और उनको मालूम था कि छात्र समुदाय को परेशान करने की राजनीति सरकार के खिलाफ बहुत बड़े वर्ग को लामबंद कर देती है।

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मौजूदा भाजपा सरकार बिल्कुल अलग है। उसके पास ऐसा शिक्षामंत्री नहीं है जिसको अंदाज हो कि विश्वविद्यालय के अन्दर की राजनीति बाहर की दुनिया को कैसे प्रभावित करती है। इस सरकार को लोकसभा में भारी बहुमत है इसलिए किसी और राजनीतिक पार्टी की बात को स्वीकार करने की मजबूरी उसके पास नहीं है। शिक्षा संस्थानों को केंद्र सरकार के अफसरों और नेताओं की मर्जी से चलाने के एजेंडे पर बेखौफ काम किया जा सकता है। इसी योजना के तहत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को काबू में किया जा रहा है। हालांकि उसमें भी उन्होंने एक शोधछात्र, कन्हैया कुमार को विपक्षी राजनीति का हीरो बना दिया है। जिस तरह से भाजपा की राज्य सरकारें और उनके छात्र संगठन कन्हैया को घेर रहे हैं, ऐसा लगने लगा है कि वह विपक्षी एकता का सूत्र बन जाएगा। इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

आजकल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी भी केंद्र सरकार की उस नीति के लपेटे में आ गई है जिसके तहत शिक्षा संस्थाओं में अपनी विचारधारा चलाने के लिए अपने बन्दों को स्थापित किया जाना है। केंद्र सरकार की कोशिश है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को माइनारिटी संस्थान होने का जो अवसर मिला है उसको खत्म कर दिया जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के वक्त दिए गए एक हलफनामे को वापस ले लिया गया है जिसमें कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक माइनारिटी संस्थान है। मामला कोर्ट में है और केंद्र सरकार और भाजपा की प्रवक्ताओं ने बहस को शुद्ध रूप से कानूनी दांव-पेंच में उलझा दिया है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का दुर्भाग्य

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का दुर्भाग्य है कि उसके पुराने छात्रों में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अलीगढ़ के अल्पसंख्यक स्वरूप की राजनीति पर अपनी सियासत चमकाई लेकिन उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी के बारे में देश को सही राय कायम करने में मदद नहीं की, सही जानकारी का प्रचार नहीं कर पाए। यह काम कुछ ऐसे बुद्धिजीवियों के जिम्मे आ पड़ा है जो या तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र हैं या न्याय के पक्ष में कहीं भी खड़े होना जिनके मिजाज में शामिल है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के विवाद का जो पक्ष कोर्ट में हैं वह तो वहीं लड़ा जाएगा। लेकिन यह समझ लेना जरूरी है कि इस सन्दर्भ में भारत के संविधान की क्या पोजीशन है। 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने एसपी मित्तल बनाम केंद्र सरकार के केस में फैसला सुनाते हुए संविधान के आर्टिकिल 30(1) के हिसाब से अल्पसंख्यक संस्थान की व्याख्या कर दी थी। इसी आर्टिकल 30 के अनुसार ही अल्पसंख्यक संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन होता है… उस महत्वपूर्ण फैसले में तीन बातें कही गयी थीं। यह कि शिक्षा संस्थान की स्थापना किसी धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के एक सदस्य या बहुत सारे सदस्यों द्वारा की गई थी। दूसरी बात कि क्या शिक्षा संस्थान की स्थापना अल्पसंख्यक समुदाय के लाभ के लिए की गई थी और तीसरा कि क्या शिक्षा संस्थान का संचालन अल्पसंख्यक समुदाय की तरफ से किया जा रहा है। इन तीनों ही कसौटियों पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को जांच कर देखा जा सकता है कि यह एक अल्पसंख्यक संस्थान है और संविधान के आर्टिकिल 30(1) को पूरी तरह से संतुष्ट करता है।

क्या है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मौजूदा विवाद

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर जो मौजूदा विवाद खड़ा किया गया है उसकी बुनियाद में 1920 का तत्कालीन ब्रिटिश भारत की संसद का वह एक्ट है जिसके तहत अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई थी। यह समझ बिल्कुल बेकार है। गलत है। 1920 में जिस यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई थी उसकी स्थापना में तत्कालीन सरकार ने एक पैसे का खर्च नहीं किया, कोई इमारत नहीं बनवाई, कोई कोर्स नहीं शुरु किया कोई कर्मचारी नहीं भर्ती किया, कुछ नहीं किया। भारत की उस वक्त की संसद ने केवल एक एक्ट पास कर दिया जिसके बाद सर सैयद अहमद खां द्वारा 1875 में मुसलमानों के बीच आधुनिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करने के लिए स्थापित किया गया मदरसातुल उलूम जिसे बाद में एमएओ कॉलेज कहा गया, का नाम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हो गया। इस बात की जानकारी 1 दिसंबर 1920 को गजट आफ इण्डिया के पार्ट 1, पेज 2213 में प्रकाशित कर दी गई। यह है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की सच्चाई। यानी एक शिक्षा संस्थान पहले से चल रहा था, इसको मुसलमानों ने मुसलामानों के बीच आधुनिक शिक्षा के लिए स्थापित किया था और उसका संचालन और प्रबंधन मुसलमानों की संस्था ही कर रही थी। वह जैसा भी था, जो भी था उसको 1920 की सरकार ने अपना लिया। एसपी मित्तल बनाम केंद्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट के 1983 के आदेश में जो भी बातें कहीं गई हैं वे सब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान साबित करने के लिए सही बैठती हैं। इसलिए केंद्र सरकार को अपना एजेंडा लागू करने के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।

यहां यह भी साफ कर देना जरूरी है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी केवल एक शिक्षा संस्थान ही नहीं है। यह एक दूरदृष्टा, सर सैयद अहमद खां के इस विजन का नतीजा है जिसके अनुसार वे मुसलमानों के पिछड़ेपन के खिलाफ एक मुहिम चला रहे थे। उसके लिए उनको क्या-क्या नहीं झेलना पड़ा। दरअसल एक सरकारी प्रशासनिक अफसर के रूप में वे तैनात थे जब 1857 के दौरान उनके शहर दिल्ली को अंग्रेजों ने तबाह कर दिया था। जब शान्ति स्थापित होने के बाद वे बिजनौर से घर आये तो उन्होंने देखा कि क्या तबाही मची है। अंग्रेजों के गुस्से के शिकार 1857 में सभी भारतीय हुए थे लेकिन मुसलमानों की संख्या ज़्यादा थी। उनकी समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गई कि अगर मुसलमानों को अपनी सामाजिक और राजनीतिक पहचान बनाए रखना है तो उनको अंग्रेजी भाषा और साइंस की तालीम जरूरी तौर पर लेनी होगी। उन्होंने देखा कि हालत से बाहर निकलने के लिए तालीम जरूरी है। इसी सोच के तहत गरीब और पिछड़े मुसलमानों की शिक्षा के लिए उन्होंने 1857 के बाद से ही काम शुरु कर दिया था। मुसलमानों के लिए बहुत सारे स्कूल खोले। 1863 में साइंटिफिक सोसाइटी नाम की एक संस्था भी बना दी। 1866 में अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट छापना शुरु कर दिया। शिक्षा के बारे में दकियानूसी ख्यालात रखने वालों ने इसका खूब विरोध किया लेकिन वे डिगे नहीं, डटे रहे। तहजीबुल अखलाक नाम का एक और जर्नल निकाला जो मुसलमानों की आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा की शुरुआत के लिए एक दस्तावेज और मुकाम माना जाता है।

इसका मतलब यह है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 1920 के एक एक्ट से नहीं स्थापित हुई। उसकी स्थापना के लिए इस्लामी समझ की पुरानी व्याख्या करने वालों से सर सैय्यद को पूरा युद्ध करना पड़ा था, बहुत सारे ऐसे लोगों को साथ लेना पड़ा था जो विरोध कर रहे थे और तब जाकर मुसलमानों के शिक्षा केन्द्रों की स्थापना हुई थी। उनमें से एक एमएओ कॉलेज को 1920 में एक्ट पास करके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी नाम दे दिया गया। बस।

भारत सरकार का यह फर्ज है कि वह देश को और दुनिया को बताए सर सैय्यद ने एक आन्दोलन के नतीजे के रूप में अलीगढ़ की स्थापना की थी। उनका सपना था कि उनका एमएओ कॉलेज एक यूनिवर्सिटी के रूप में जाना जाए। उनके इंतकाल के बाद भी लोग उनके सपनों को एक रूप देने में लगे रहे और 1920 के आयक्त केवल उन सपनों की तामीर भर है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं। शायद उन लोगों को यह अंदाज भी नहीं रहा होगा कि सर सैय्यद के शिक्षा संस्थान को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी नाम दिए जाने करीब एक सौ साल बाद राजनेताओं की एक ऐसी बिरादरी आयेगी जो उनके सपनों को अदालती और टीवी चैनलों के बहस मुबाहिसों में फंसा देगी।

साभार – हस्तक्षेप डॉट कॉम 


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