बिहार में शिक्षकों की हड़ताल से छात्र-छात्राओं का भविष्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बिहार के लगभग साढ़े तीन लाख नियोजित शिक्षक पिछले दो सप्ताह से हड़ताल पर है।. बिहार के नियोजित शिक्षक वेतनमान और दूसरी मांगों को लेकर पिछले कई दिनों से सरकार पर दबाव बना रहे थे। विगत 8 अप्रैल को शिक्षक संघ के प्रतिनिधियों और शिक्षा मंत्री के बीच इन्ही समस्याओं को लेकर एक वार्ता भी बुलवाई गई थी परन्तु यह वार्ता भी असफल रही। इसके बाद से राज्य के सभी जिलों और प्रखंड के नियोजित शिक्षक अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर उतर आए। यह आंदोलन तबसे और भी तेज हो गया है जब से माध्यमिक शिक्षक संघ भी नियोजित शिक्षकों के समर्थन में खुल कर मैदान में उतर चुका है। अब स्थिति यह है के संघ की ओर से मेट्रिक परीक्षा की कॉपियों की जांच में रुकावट पैदा की जा रही है।

दूसरी ओर सरकार की तरफ से हड़ताल को समाप्त करने के लिए कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाया गया है। सरकार शिक्षकों की मांग को नाजाएज करार देती है। सरकारी प्रतिनिधियों का मानना है कि नियोजित शिक्षकों की मांगें अनैतिक हैं क्यूंकि उन्हें नियोजन के पहले दिन से ही नियोजन की सारी शर्तों से अवगत करा दिया गया था। उर्दू मध्य विद्यालय गुलजारबाग, पटना में नियोजन से बहाल हुए शिक्षक मो फजले करीम कहते हैं कि सरकार ने हम शिक्षकों को बंधुआ मजदूरों की तरह कम मानदेय पर काम करने पर मजबूर कर दिया था। बिहार में सालों से शिक्षकों की बहाली नहीं हुई थी। बचपन से शिक्षक बनने का सपना सजोये लोग नाउम्मीद से होने लगे थे। निसंदेह हमने सेवा-शर्तें मंजूर की थीं, लेकिन अब हम शक्ति में हैं और बंधुआ मजदूरी की यह प्रथा अब अधिक दिनों तक नहीं चलने वाली है। सरकार को सामान काम के लिए सामान वेतन देना ही होगा।

बिहार में नियोजित शिक्षकों की मांगें कितनी जाएज हैं यह तो बहस का विषय है लेकिन इतना तो मानना होगा कि सरकार शिक्षा के प्रति गंभीर नहीं है। आखिर क्या कारण है कि टी.ई.टी परीक्षा के हजारों प्रमाण-पत्र जाली पाए गए। इसका सीधा अर्थ यही है बहाली के समय आवेदकों के प्रमाण-पत्रों की सही ढंग से जांच-पड़ताल नहीं की गई। आज बहुत सारे लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि बिहार के स्कूलों के अधिकांश शिक्षक अयोग्य हैं। क्या इसके लिए भी सरकार जिम्मेवार नहीं है? आखिर अयोग्य शिक्षकों की बहाली हुई कैसे?

बिहार में शिक्षकों की हड़ताल का सीधा प्रभाव पठन-पाठन पर पड़ रहा है। शिक्षकों और सरकार की लड़ाई में मासूम बच्चो का भविष्य दाव पर है कहा जाता है कि मासूम बच्चों की दुआ और बद्दुआ ऊपर वाला भी रद्द नहीं करता। ऐसे में उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाली सरकार और राष्ट्र-निर्माता शिक्षक को ये मासूम बच्चे दुआ देंगे या बद्दुआ यह उन्हें सोचना होगा।

कामरान गनी
(लेखक उर्दू नेट जापान के भारत में संपादक हैं।)


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