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दुश्मन गुफा के द्वार तक आकर उन्हीं कदमों लौट गया। उनमें से किसी ने भी अंदर झांककर नहीं देखा। तब अबू-बक्र (रजि.) ने आपके कान में कहा था, यदि इनमें से किसी की दृष्टि अपने पांव पर पड़ जाए तो ये हमें देख लें।

आपने (सल्ल.) पूछा, अबू-बक्र (रजि.) उन दो के विषय में क्या विचार है, जिनका तीसरा अल्लाह है?

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) तथा हजरत अबू-बक्र (रजि.) तीन दिन उस गुफा में रहे। इस अवधि में कुरैश क्या करते, शहर में कैसी चर्चा होती, लोग किधर ढूंढ़ने जाते, क्या बातें करते, क्या योजना बनाते, इसकी खोज-खबर हजरत अबू-बक्र (रजि.) के पुत्र अब्दुल्लाह दे जाते।

वे दिन में जानकारी इकट्ठी करते, रात के अंधेरे में गुफा की ओर चले आते। मुहम्मद (सल्ल.) तथा अपने पिता को कुरैश की गतिविधियों से अवगत कराते। अब्दुल्लाह (रजि.) के साथ उनकी बहन असमा (रजि.) भी आतीं। वे दोनों के लिए भोजन बनाकर लातीं।

रात को अबू-बक्र (रजि.) का गुलाम आमिर-बिन-फुहैरा आता। वह बकरियां चराता था। इस तरह मुहम्मद (सल्ल.) तथा अबू-बक्र (रजि.) के लिए दूध की व्यवस्था हो जाती। तीनों मक्का जाते तो बहन-भाई आगे होते। पीछे आमिर-बिन-फुहैरा बकरियां लेकर आता। इससे दोनों के पदचिह्न रास्ते से लुप्त हो जाते। कुरैश द्वारा उनका पीछा किए जाने का खतरा कम हो जाता।

जब कहीं कोई सुराग नहीं मिला तो कुरैश मायूस हो गए। अब आपको (सल्ल.) ढूंढ़ने में उतना उत्साह नहीं था। इनाम की आशा जाती रही। उन्हें घोर निराशा ने घेर लिया था। लोग बातें करते कि मुहम्मद (सल्ल.) अब तक तो बहुत दूर चले गए होंगे। उन्हें पकड़ना संभव नहीं। अब्दुल्लाह (रजि.) बराबर ये समाचार पहुंचाते रहे।

अब हजरत अबू-बक्र (रजि.) ने उन्हें वे ऊंटनियां लाने के लिए कहा जो वे सफर के लिए तैयार कर आए थे। उन्होंने अब्दुल्लाह-बिन-अरकत को भी साथ लाने के लिए कहा।

सूरज ढल गया। शाम का हल्का अंधेरा छाया तो अब्दुल्लाह (रजि.) बाहर जाने की तैयारी करने लगे। उनके संग बहन असमा (रजि.) भी थीं। आमिर-बिन-फुहैरा साथ आया। पीछे अब्दुल्लाह-बिन-अरकत चला आ रहा था। वह दोनों ऊंटनी लेकर आया था। साथ में उसकी ऊंटनी थी।

जब ये गुफा पहुंचे तो अबू-बक्र (रजि.) ने सबसे अच्छी ऊंटनी आपके लिए प्रस्तुत की। मुहम्मद (सल्ल.) अपने सिद्धांतों के पक्के थे। मुफ्त चीजें नहीं लेते। आपने मुफ्त में मिल रही ऊंटनी पर बैठना स्वीकार नहीं किया। फरमाया, मैं दूसरे की ऊंटनी पर नहीं बैठता।

अबू-बक्र (रजि.) कहते रहे कि अब यह आप ही की है।

आपने (सल्ल.) फरमाया, नहीं, जितने में खरीदी है, उतनी कीमत मुझसे लो।

अबू-बक्र (रजि.) विवश थे। न चाहते भी कीमत लेनी पड़ रही थी। कीमत देने के बाद ही आप (सल्ल.) ऊंटनी पर सवार हुए। असमा (रजि.) अपने साथ खाने-पीने का सामान लाई थीं। उन्हें बांधने के लिए कोई रस्सी नहीं मिली तो निताक (इसे कमर पर लपेटा जाता था) के दो हिस्से किए। इस तरह वे इतिहास में जातुन्निताकैन (दो निकात वाली) के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

सफर शुरू हुआ। अबू-बक्र (रजि.) के पीछे उनका गुलाम बैठ गया। अब्दुल्लाह-बिन-अरकत काफिले को लाल सागर के तटवर्ती रास्ते से लेकर जा रहा था। यहां आवाजाही कम होती थी, इसलिए यहीं से जाना अधिक सुरक्षित था। मक्का में कुरैश बहुत दुखी थे। वे सभा में बैठे अपनी करारी हार की चर्चा कर रहे थे। तभी एक व्यक्ति अंदर आया। उसने बताया कि तटवर्ती रास्ते से तीन लोगों को जाते देखा है। संभवतः वे मुहम्मद तथा उनके साथी हों।

उस सभा में जोशम का पुत्र सुराका बैठा था। वह चाहता था कि सौ ऊंटों का इनाम किसी और के हाथ न लग जाए। वह बात टालने की कोशिश करने लगा। उसने कहा, नहीं-नहीं। वे अब कहां बैठे होंगे? अभी कुछ लोग मेरे सामने ही उधर गए थे। मैं उन्हें भलीभांति जानता हूं।

लोगों ने सुराका की बातों को सच मान लिया। वह कुछ देर तक तो सभा में बैठा बातें करता रहा। फिर मौका देखकर वहां से आ गया। उसने घर आकर घोड़े को सवारी के लिए तैयार किया। हथियार लिए और तुरंत रवाना हो गया। घोड़ा उसी रास्ते पर सरपट दौड़ा चला जा रहा था जिधर से उसे मुहम्मद (सल्ल.) के जाने का संदेह था।

सुराका सोच रहा था कि ये सौ ऊंट उसी के द्वार की शोभा बढ़ाएंगे। अल्लाह अपने नबी तथा उनके साथियों की सुरक्षा कर रहा था। अचानक घोड़े को ठोकर लगी। सुराका गिरते-गिरते बचा। उसने फिर घोड़ा दौड़ा दिया। कुछ दूर पहुंचा होगा कि फिर ठोकर लगी। वह रुका नहीं, पुनः वहां से रवाना हो गया। अब उसके मन में कुछ भय का संचार हो रहा था। घोड़े को बार-बार ठोकर लग रही थी। कोई ताकत थी जो उसे रोकना चाहती थी।

उधर काफिला एक दिन तथा एक रात चल चुका था। अभी तक कोई परेशानी नहीं आई थी। दूसरे दिन जब दोपहर को तेज धूप थी तो काफिला रुक गया। सबने भोजन किया। फिर आराम करने लगे। सुराका बेसब्री से इधर ही चला आ रहा था। अचानक अबू-बक्र (रजि.) की दृष्टि उसकी ओर गई। मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने साथी के चेहरे पर घबराहट के चिह्न देखे तो फरमाया, घबराइए नहीं। अल्लाह हमारे साथ है।

सुराका उनके काफी करीब पहुंचा तो घोड़े को बहुत जोर से ठोकर लगी। वह जमीन पर आ गिरा। चेहरा रेत से सना हुआ था। अब सुराका को लगने लगा कि उसने जो किया, ठीक नहीं किया। इस काम का फल बुरा ही होगा। उसने उन्हीं कदमों लौट जाने में भलाई समझी।

जाने से पहले उसने अबू-बक्र (रजि.) से बातें कीं। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने उसका निवेदन स्वीकार किया। वह अम्न का परवाना लिखाना चाहता था, जो उसे चमड़े के एक टुकड़े पर लिखकर दिया गया। सुराका मक्का चला गया। उसके साथ जो घटित हुआ, किसी को नहीं बताया। आपके (सल्ल.) प्रति उसे सहानुभूति हो गई थी। अब अगर कोई मुहम्मद (सल्ल.) को तलाश करने जाता, तो उसे रोकने की कोशिश करता।

मक्का में जब हजरत अली (रजि.) ने अमानतें उनके हकदारों तक पहुंचा दीं तो वे भी मदीना जाने की तैयारी करने लगे। सामने विशाल रेगिस्तान था। न कोई आवागमन का साधन। बस प्यारे नबी (सल्ल.) से मिलने की बेताबी थी। वे पैदल ही चल दिए।

ऊपर सूरज आग बरसा रहा था, नीचे धरती भट्टी की तरह तप रही थी। सुनसान रेगिस्तान में कई संकट थे। अगर समय पर किसी को पानी न मिले तो जान भी जा सकती है, परंतु अली (रजि.) ने इन सबकी परवाह नहीं की। इतनी मुश्किलें भी उनका मार्ग नहीं रोक सकीं। बस चलते रहे, चलते रहे। प्यारे नबी (सल्ल.) से मुहब्बत उन्हें इस तपते रेगिस्तान में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही थी। एक ही धुन थी कि जल्द से जल्द मुहम्मद (सल्ल.) के पास चले जाएं।

मदीना कुछ ही दूरी पर होगा कि एक छोटी-सी आबादी मिली। यह आलिया एवं कूबा के नाम से जानी जाती थी। मुहम्मद (सल्ल.) अतिथि के रूप में यहां चौदह दिन ठहरे। यहीं आपने (सल्ल.) अपने हाथों से एक मस्जिद की नींव डाली। यह कुबा मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसी स्थान पर अली (रजि.) की आपसे मुलाकात हुई।

काफिला मदीना के लिए रवाना हुए। नगर में आपके (सल्ल.) आने का समाचार पहुंच चुका था। सब लोग आप (सल्ल.) ही की प्रतीक्षा कर रहे थे। क्या बच्चे और क्या बूढ़े, सभी आपके (सल्ल.) स्वागत के लिए तैयार थे। हर कोई दूसरे को यह शुभ समाचार देना चाहता था कि प्यारे नबी (सल्ल.) आने वाले हैं। हर दृष्टि उसी मार्ग पर टिकी थी। क्या पता प्यारे नबी (सल्ल.) कब आ जाएं! आज हर कोई चाहता था कि अपनी आंखों से मुहम्मद (सल्ल.) को नगर में प्रवेश करता देखे।

एक दिन ऊंचे टीले से यह आवाज सुनाई दी- लोगो! जिसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, वह आ गया।

यह सुनते ही पूरे मदीना में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। यही तो वे सुनना चाहते थे। इसी दिन की तो प्रतीक्षा थी। आज हर घर का नजारा ऐसा था मानो कोई बड़ा पर्व हो।

लोगों ने देखा, एक छोटा-सा काफिला चला आ रहा है। सबकी इच्छा थी कि वे नबी (सल्ल.) का स्वागत करें। आप (सल्ल.) उसी के अतिथि बनें।

लोग खजूर के पेड़ के नीचे मुहम्मद (सल्ल.) तथा उनके साथियों से मुलाकात करने पहुंचे। ज्यादातर लोग ऐसे थे जिन्होंने आपको (सल्ल.) पहले कभी देखा नहीं था। उस समय धूप से बचाने के लिए हजरत अबू-बक्र (रजि.) ने आप (सल्ल.) पर चादर तान रखी थी। इससे लोगों को यह मालूम करने में आसानी हुई कि नबी (सल्ल.) कौन हैं।

मदीना की भूमि पर ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा गया था। आपने (सल्ल.) नगर में प्रवेश किया। जिस ऊंटनी पर सवार थे, उसके चारों ओर लोगों की बहुत भीड़ थी। मदीना के लोग निवेदन करते कि मुहम्मद (सल्ल.) उनके अतिथि बन जाएं। आप (सल्ल.) मुस्कुराते हुए उन्हें धन्यवाद कहते, उनके लिए दुआ करते। आपने (सल्ल.) फरमाया कि उसी घर में ठहरेंगे जहां अल्लाह ठहराएगा।

आज बच्चे-बच्चियों की खुशी का कहना ही क्या! वे गीतों से प्यारे नबी (सल्ल.) का स्वागत कर रहे थे। मदीना की हर दृष्टि आज आपको (सल्ल.) देखना चाहती थी।

चलते-चलते ऊंटनी एक स्थान पर बैठ गई। आप (सल्ल.) सवारी से उतरे और लोगों से पूछा, यह जमीन किसकी है?

यह नज्जार खानदान की जमीन थी। इस पर खजूर के कुछ पेड़ थे। कहीं-कहीं कब्रें दिखाई देती थीं। आप (सल्ल.) इस स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराना चाहते थे।

उस समय अफरा के पुत्र मुआज आए। उन्होंने निवेदन किया- अल्लाह के रसूल (सल्ल.), सहल एवं सुहैल दो बालक हैं। यह जमीन उनकी है। सिर से पिता का साया उठ चुका है। दोनों ही मेरी परवरिश में हैं। आप प्रसन्नता से यहां मस्जिद का निर्माण कराएं। मैं उन्हें राजी कर लूंगा।

आपने (सल्ल.) उन बच्चों को बुलाया। उन्होंने यह जमीन आपको मुफ्त में देने की इच्छा व्यक्त की। आपने (सल्ल.) मुफ्त में जमीन नहीं ली। उसकी पूरी कीमत चुकाई। उसके बाद ही उसे मस्जिद के लिए स्वीकार किया। निर्माण कार्य शुरू हो गया।

मेरी नजर से पढ़िए
गरीबी और यतीमी दोनों में तीन-तीन अक्षर हैं, लेकिन ये अपने साथ अनगिनत दुख लाते हैं। आपने (सल्ल.) गरीबी देखी तो यतीमी भी महसूस की। यतीम बच्चों के लिए दिल में बहुत दया रखते। उनके हिस्से का एक पैसा लेना भी स्वीकार नहीं करते।

आपने (सल्ल.) यतीम बच्चों से मस्जिद निर्माण जैसे कार्य के लिए मुफ्त जमीन तक नहीं ली। अनाथ बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना, उनसे मुफ्त कुछ नहीं लेना, यह साबित करता है कि आप (सल्ल.) यतीमों की कितनी परवाह करते थे।

अगर अल्लाह (सल्ल.) के रसूल से हम यह सीख लें कि कभी अनाथ की संपत्ति को गलत नजर से नहीं देखेंगे, किसी का हक नहीं मारेंगे, लेनदेन में सच्चे रहेंगे तो दुनिया से हर किस्म की बेईमानी खत्म हो जाए।

यह अध्याय हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर जहां हमारे देश में ऐसे लाखों लोग हैं जिनके सिर पर छत नहीं, वहीं भूमाफिया काफी ताकतवर हो रहा है। जमीन पर अनैतिक तरीके से कब्जे करने वाला गिरोह पैदा हो गया है। यही क्यों, इतिहास ने ऐसे दिन देखे हैं जब जमीन पर जबरन कब्जा करने के लिए एक देश ने दूसरे की ईंट से ईंट तक बजा दी।

अगर जमीन-जायदाद के मामले में हम वैसी ईमानदारी बरतते, जैसे कि मुहम्मद (सल्ल.) ने बरती थी तो दुनिया में न कहीं जमीन घोटाला होता, न कोई बेघर होता। मुहम्मद (सल्ल.) ने तो मुफ्त में मिल रही जमीन, ऊंटनी और कुरैश की दौलत तक नकार दी थी। एक हम हैं कि मुफ्त की चीजों के पीछे दौड़े चले जाते हैं।

मुफ्त के माल के जाल में फंसते हैं। ऐसे राजनेताओं से बड़ी उम्मीदें लगा लेते हैं जो मुफ्त की चीजें देने का वायदा करते हैं। मुफ्तखोरी के इस रोग ने हमें कहीं का न छोड़ा। क्या आज तक मुफ्तखोरी से किसी मुल्क का भला हुआ है? कभी नहीं। जिन्हें एक बार चीज मुफ्त में लेने की आदत पड़ जाती है, फिर उनमें मेहनत करने की ताकत खत्म हो जाती है।

कोई गरीब, बेसहारा, आफत का मारा हो तो बात और है। सामान्य स्थिति में हमें मुफ्त की चीजों से बचना चाहिए। वही लें जो मेहनत की कमाई से आए। जिस दिन हिंदुस्तान के लोग नबी (सल्ल.) के जीवन की इस घटना से प्रेरणा लेकर मेहनत करना सीख जाएंगे और मुफ्त के माल से परहेज करेंगे, उसी दिन यह दुनिया का सबसे ज्यादा खुशहाल व ताकतवर देश बन जाएगा।

गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी और अनेक समस्याओं का समाधान सिर्फ मेहनत है। ऐसी मेहनत जो समझदारी से की जाए। जिन्हें मेहनत से डर लगता है, जो हर चीज मुफ्त में लेना चाहते हैं, उनके भाग्य में सिर्फ गुलामी लिखी होती है।
साथियों,

शेष बातें अगली किस्त में

– राजीव शर्मा –


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