कंचना माला और मोइदीन का प्यार हमारे दौर का एक ऐसा मिसाल है जिसका जिक्र फसानों में भी नहीं मिलता है. यह मोहब्बत का ऐसा जादू है जिस पर  यकीन करना मुश्किल हो जाए कि क्या कोई किसी से इस कदर टूट कर भी प्यार कर सकता है?यह अपने प्यार के लिए खुद को फ़ना कर देने की कहानी है. इस जोड़ी में एक हिन्दू है और दूसरा मुसलमान. उनके इस प्यार को समाज की मंजूरी नहीं मिली लेकिन केरल के जमीन पर परवान चढ़ा इन दोनों का प्यार आज उसी समाज के लिए एक मिसाल बन चुका है.

कंचना माला आज 77 साल की हो चुकी हैं जिसमें से करीब 60 साल उनके प्यार बी.पी. मोइदीन के नाम रहा है. मोइदीन का साथ पाने के लिए उन्होंने तीस साल तक इंतजार किया था पर साथ तो नहीं मिला उल्टे नदी में नावं पलटने से मोइदीन की मौत हो जाती है लेकिन मौत भी उनके प्यार को छीन नहीं सकी. कंचना माला ने उस आदमी के नाम पर ना केवल अपना पूरा जीवन बिता दिया जिससे उनकी कभी शादी भी नहीं हुई थी बल्कि उसी के नाम से समाज सेवा भी कर रही हैं. यह एक महिला द्वारा अपने प्यार के लिए चरम कष्ट उठाने और खुद को फ़ना कर देने की अदभुत मिसाल है. यह प्यार के लिए कुर्बानी और सेवा का रेयर संगम भी है. वे बी.पी. मोइदीन सेना मंदिर नाम से एक सामाजिक संस्था चलती है.

धर्म की दीवारों ने उन्हें मिलने नहीं दिया था लेकिन 2015 में इनकी प्रेम को लेकर बनायीं गयी मलयाली फिल्म “एन्नु निंते मोइदीन”” पर वही समाज फ़िदा हो गया और उनकी प्रेम कहानी व कंचना माला के त्याग और समर्पण के कसीदे पढ़े गये.

हमारे समाज में तो सामान्य मोहब्बतों को भी त्याग करना पड़ता है, ज्यादातर मां-बाप अपने बच्चों को खुद के जीवन साथी चुनने का विकल्प नहीं देना चाहते. वे उनकी शादी अपनी मर्जी से खुद के जाति, धर्म, गौत्र में ही करना चाहते हैं. अगर मामला धर्म और जाति से बाहर का हो तो स्थिति बहुत गंभीर बन जाती है. ऐसे मोहब्बतों को बगावत ही नहीं गुनाह की श्रेणी में रखा जाता है. इसमें अंतधार्मिक मामलों में तो और मुश्किल होती है इनको लेकर पूरा समाज ही खाप पंचायत बन जाता है, ऐसे प्रेमी जोड़ों की जान पर बन आती है. समाज हाथ धोकर पीछे पड़ जाता है और राज्य उनका बंधक बनके रह जाता है.

आकड़ों की नजर से देखें तो स्थिति यह है कि अभी भी केवल 5 प्रतिशत भारतीय ही अपनी जाति के बाहर शादी करते हैं जबकि अंतर्धार्मिक शादियों का दर केवल 2.1 प्रतिशत है. जाहिर है जकड़न की गांठ बहुत मजबूत हैं और विद्रोही प्रेमियों के लिए इसे तोड़ना बहुत मुश्किल है.

पिछले दिनों यूपीएससी के दो शीर्ष टॉपरों ने जब इस बात की घोषणा कि वे एक दूसरे के प्रेम में हैं और शादी करना चाहते हैं तो यथा स्थितिवादियों के खेमे में खलबली मच गयी. टीना डाबी दलित हिन्दू है और अतहर आमिर कश्मीरी मुसलमान. टीना ने यूपीएससी टॉप किया है और अतहर दूसरे नंबर पर रहे हैं लेकिन जैसे इन दोनों को मिसाल बनने के लिए यह काफी ना रहा हो, इन दोनों ने वर्जनाओं को तोड़ते हुए ना केवल अपने रिश्ते का सोशल मीडिया पर खुला ऐलान किया बल्कि सवाल उठाने वालों को करारा जवाब भी दिया.

जैसे की उम्मीद थी इस जोड़ी इस इस ऐलान से सामाजिक ठेकादारों और संगठनों को समस्या हुई और उन्होंने इसका विरोध किया. हिंदू महासभा ने तो इसे ‘लव जिहाद’ का मामला ब‍ताते हुए टीना डाबी के पिता को पत्र तक लिख डाला जिसमें उनसे इस शादी में दखल देने को कहा गया.

हमारा समाज एक विविधताओं का समाज है जो उतनी ही जकड़नों से भरा हुआ है. यहाँ सीमायें तय कर दी गयी हैं जिससे बाहर जाना विचलन माना जाता है. सबसे बड़ी लकीर प्यार और शादी के मामले में है, आप जिस जाति या धर्म में पैदा हुए हैं सिर्फ उसी में ही प्यार या शादी की इजाजत है, इस व्यवस्था के केंद्र में स्त्री है और यह नियम सबसे ज्यादा उसी पर ही लागू होता है.

लेकिन प्रेम तो हर सीमा से परे है, यह अनहद है जिसे कोई भी लकीर रोक नहीं सकती. तमाम पाबंदियों, सजाओं, त्रासद भरे अंत और खूनी अंजामों के बावजूद प्यार रुका नहीं है,यह इंसानियत का सबसे खूबसूरत एहसास बना हुआ है.

टीना डाबी ने अपने प्यार पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए कहा था कि ”खुले विचारों वाली किसी भी स्‍वतंत्र महिला की तरह मुझे भी कुछ चुनने का हक है. मैं अपनी च्‍वॉइस से बेहद खुश हूं और आमिर भी,हमारे माता-पिता भी खुश हैं.विरोध करने वाले लोग संख्या में कम होते हैं””.

2014-15 में जब लव जिहाद को एक राजनीतिक मसले के तौर पर पेश किया जा रहा था तो करीना कपूर को भी निशाना बनाया गया था. संघ परिवार से जुड़े संगठन दुर्गा वाहिनी ने अपने पत्रिका के कवर पर करीना कपूर की एक तस्वीर छापी थी जिसमें करीना के आधे चेहरे को बुर्के से ढका आधे को हिन्दू चेहरे  के तौर पर दर्शाया गया था इसके साथ शीर्षक दिया गया था “धर्मांतरण से राष्‍ट्रांतरण”. इसके बाद अभिनेता सैफ अली खान ने अपने बहुचर्चित लेख ‘“हिन्दू-मुस्लिम विवाह जेहाद नहीं, असली भारत है”’ में लिखा था कि “मैं नहीं जानता कि लव जिहाद क्या है, यह एक जटिलता है, जो भारत में पैदा की गयी है, मैं अंतरसामुदायिक विवाहों के बारे में भली भांति जानता हूँ, क्योंकि मैं ऐसे ही विवाह से पैदा हुआ हूँ और मेरे बच्चे भी ऐसे ही विवाह से पैदा हुए हैं. अंतर्जातीय विवाह (हिन्दू और मुसलमान के बीच) जिहाद नहीं है,बल्कि यही असली भारत है, मैं खुद अंतर्जातीय विवाह से पैदा हुआ हूँ और मेरी जिंदगी ईद, होली और दिवाली की खुशियों से भरपूर है. हमें समान अदब के साथ आदाब और नमस्ते कहना सिखाया गया है.”

हर किसी के लिए कंचना माला बन जाना मुमकिन नहीं है, ऐसी मोहब्बतें दुर्लभ होती हैं लेकिन टीना दाबी जैसे लोग नये भारत के लिए मिसाल हैं. अगर आप सच्चा प्यार करते है तो शादी करने के लिए अपना धर्म बदलने की जरूरत नहीं है, हमारे देश में “विशेष विवाह अधिनियम” जैसा कानून है जिसके अंतर्गत किसी भी धर्म को मानने वाले  लड़का और लड़की  विधिवत विवाह कर सकते हैं.यह सही मायने में धर्मनिरपेक्ष भारत का कानून है जिसे सहज व सुलभ बनाने की जरूरत है.

जावेद अनीस

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