jaish suspect released

वसीम अकरम त्यागी

बीते चार मई की सुब्ह दिल्ली की तेज गर्मी में एक खबर ने लगभग आग लगा दी। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दावा किया था कि दिल्ली के गोकलपुरी, गाज़ियाबाद के लोनी और सहारनपुर के देवबंद इलाक़ों से तीन लड़को को गिरफ्तार किया है जिनके संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद से हैं। सेल ने कुल 13 लड़कों को अलग-अलग इलाकों से हिरासत में लिया था। इनमें छह लड़के गोकलपुरी के चांद बाग़ इलाके के रहने वाले हैं। स्पेशल सेल का दावा है कि इन लड़कों का जैश से संबंध होने का पता एजेंसी को 18 अप्रैल को चला था। गिरफ्तारी के बाद स्पेशल सेल ने इनसे पूछताछ की। इसके बाद सेल ने कहा है कि चांद बाग़ के मुहम्मद साजिद ने पूछताछ में जैश-ए मुहम्मद से अपने संबंध कुबूल कर लिए हैं। इसे महज इत्तेफाक ही समझा जाये कि इसी महीने मालेगांव बम ब्लास्ट के आरोपियों को बॉम्बे कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया था। मालेगांव के आरोपी 9 साल बाद अदालत से बरी हुऐ हैं। उन पर भी इसी तरह के आरोप थे जैसे आरोप अभी चार मई को गिफ्तार किये गये युवकों पर लगाये गये हैं। वे आतंकवादी हैं अथवा नहीं इस पर कोर्ट बाद में फैसला देगी। मगर हिन्दी मीडिया प्रथम दृष्टया उन्हें आतंकवादी साबित कर चुकी है।

साल, पांच साल, दस साल बाद अगर ये ‘जैश आतंकी’ बाइज्जत बरी हो गये, तब क्या मीडिया से लेकर स्पेशल सेल तक के अधिकारी उनकी जिंदगियों को बर्बाद करने के लिये खुद को जिम्मेदार मानेंगे ? मीडिया ने बगैर क्रॉस चेक किये स्पेशल सेल की ‘मनघड़ंत’ कहानी को ‘सच’ मान लिया। और हिरासत में लिये गये संदिग्धों को आतंकवादी, जैश का सदस्य कहना शुरु कर दिया। बीते सात और आठ मई को दिल्ली पुलिस ने क्रमशः चार और छः ‘आतंकियों’ को रिहा कर दिया।

क्या इससे मीडिया और स्पेशल सेल की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान नहीं लगता ? जिन युवाओं को जैश का आतंकी बताकर गिरफ्तार किया गया था जब उनके घर वाले थाने पहुंचे तो उनसे पुलिस का रवैय्या पूर्वाग्रह से ग्रस्त था। गिरफ्तार किये गये युवक अजीम (अब रिहा) के परिवार के सदस्य कलीम ने बताया था कि उस रात 11 बजे पुलिस की दर्जनों गाड़ियां गली में भरी हुई थीं। सभी के पास रिवॉल्वर और एके -47 राइफलें थी। उन्होंने घर में घुसने की कोशिश की तो हमने वजह पूछी। हम अज़ीम को नीचे लेकर आए तो वो बिना बताए लेकर चले गए। वजह जानने के लिए हम गोकलपुरी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो वहां एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर ने हमें दाढ़ी, टोपी और कुर्ते में देखकर गाली दी। उन्होंने कहा कि तुम लोगों ने आतंकवाद फैला रखा है। यहां से चले जाओ वरना लॉकअप में बंद करके मारूंगा।

हम वहां से चुपचाप चले आए। पुलिस अधिकारी का धर्म विशेष के लोगों को आतंकी कहना आखिर क्या दर्शाता है ? स्पेशल सेल के ‘स्पेशल’ अधिकारी मुसलमानों की दाढ़ी और टोपी पर धार्मिक टिप्पणी करके उन्हें अपमानित कर रहे हैं। ऐसी टिप्पणियों के बाद भी क्या कोई गुंजाईश बचती है जिसके आधार पर कह दिया जाये कि स्पेशल जिन आतंकियों को पकड़कर लाती है उन्हें फंसाया नहीं जाता ?

स्पेशल सेल ने जैश के जिन 13 आतंकियों को गिरफ्तार किया है, उनमें से कईयों की उम्र 16 – से 22 साल है। जिस साजिद को मास्टरमाइंड बताया जा रहा है उसकी उम्र महज 19 साल है। इनमें कोई पांचवी तक पढ़ा है, तो किसी का मानसिक संतुलन ही ठीक नहीं है। सबके सब मजदूर वर्ग से आते हैं। हां सब में एक विशेषता है कि ये पांच वक्तों के नमाजी हैं, और जमात में भी जाते हैं यानी वे तब्लीगी जमात से जुड़े हैं। सवाल है कि क्या इनका नमाज पढ़ना गुनाह है ? या फिर इनका जमात में जाना इनका बड़ा जुर्म है।

साजिद की बहन के मुताबिक उसका हाथ गर्म दूध गिरने की जल गया था जिसे स्पेशल सेल ने बताया कि हाथ बम बनाते वक्त विस्फोट हो जाने से जला था। सवाल है कि गर बम बनाते वक्त विस्फोट हो जाने से हाथ जला था तो वह कितना कमजोर बम होगा जिसके फट जाने से एक हाथ की हथेली जले और दूसरे हाथ पर आंच तक न आये ? संदेह नहीं कि अब तक कि मनघड़ंत कहानियों में स्पेशल सेल की यह कहानी भी मनघड़ंत ही निकले ? साजिद अभी भी पुलिस की हिरासत में है। रिहा किये गये दस युवकों में साजिद का नाम नहीं है। हम आये दिन जेल से छूट कर आये निर्दोष ‘आतंकियों’ की दास्तानें पढ़ते रहते हैं। जो अपनी जिंदगी के बेशकीमती दस, पंद्रह, साल जेल में गुजारकर आये हैं। संदेह नहीं कि इन युवाओं की भी ऐसी ही दास्तानें पढ़ने को मिलें जिन्हें स्पेशल सेल ने गिरफ्तार कर रखा है। इन नौजवानों को फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रावाई हुई होती तो किसी अधिकारी की हिम्मत नहीं होती कि वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किसी राह चलते राहगीर को उठाकर जेल में ठूंसे दे वह भी आतंकी बनाकर। सवाल फिर वही है अब जब 13 में से दस ‘आतंकियों’ को रिहा किया जा चुका है मीडिया रिहा हुऐ युवकों को वैसा क्यों नहीं दे रहा जैसा उनकी गिरफ्तारी के वक्त दिया था ?

सप्ताह भर में इनकी समाजिक छवी को जो बट्टा लगा है क्या उसके लिये मीडिया और स्पेशल सेल जिम्मेदार नहीं है ? क्या यह मान लिया जाये कि हिन्दी मीडिया पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और पुलिस की इस मनघड़ंत कहानी में बराबर का हिस्सेदारी है ? दैनिक जागरण ने देवबंद से गिरफ्तार किये गये युवक शाकिर अंसारी के बारे में खबर प्रकाशित की थी कि वह मुजफ्फरनगर दंगों का बदला लेना चाहता तथा उसके निशाने पर भाजपा के एक विधायक थे। शाकिर अंसारी रिहा हुऐ दस लोगों में शामिल है। यानी अखबार की रिपोर्टिंग पूरी तरह से झूठ का पुलिंदा और एक विशेष समुदाय को आतंकी साबित करने वाली थी। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लगता है। अक्सर यह देखा गया है कि जितने लोगों को गिरफ्तार किया जाता है उन सब में एक समानता पाई जाती है कि वे भाजपा के किसी बड़े नेता को मारना चाहते थे। वैसी ही कहानी चर्चित इशरत जहां मामले में सुनाई गई थी मगर क्या वह कहानी सच्चाई की कसौटी पर खरी उतर पाई ? सुरक्षा ऐजंसियां के निशाने पर हमेशा से विशेष समुदाय रहा है क्या इसे इत्तेफाक ही कहा जायेगा जिन 13 युवकों को स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था वे सबके एक ही समुदाय के थे ? समाज में जी रहे किसी भी नागरिक को आतंकवादी बता कर उसकी समाजिक छवी को बट्टा लगाने का अधिकार, किसी भी पुलिस अधिकारी/ मीडिया को नहीं है।

Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।
Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

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