मोदी की मौन स्वीकृती

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डीजी वंजारा ने ट्वीट करके कहा है कि “अगर कोई हिंदू, ईसाई या मुसलमान हो जाता है तो इसका मतलब यह नहीं कि एक हिंदू कम हो गया बल्कि यह सोच लेना चाहिये कि हमारा (हिंदुओं का) एक दुश्मन और बढ़ गया” डीजी वंजारा गुजरात पुलिस अधिकारी रहे हैं, वह फर्जी मुठभेड़ के मामलों में जेल में रहकर आया है, मोदी सरकार आने के बाद वंजारा को जमानत मिली थी, जेल से बाहर आते ही वंजारा ने कहा  था कि “अच्छे दिन आ गये” यकीनन वंजारा के अच्छे दिन आये हैं, तभी वे मोदी सरकार के ‘दामाद’ हैं।

दूसरा ट्वीट आरएसएस ने किया है जिसमें हिंदुओं से अपील की गई है कि वे करीम चिकन के अलावा किसी हिंदू चिकन वाले के यहां चिकन खाया करें। दोनों ट्वीट हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाईयों के बीच बनी खाई को चौड़ी करने वाले हैं। मोदी ने दिल्ली में आयोजित सूफी सम्मेलन में आंतकवाद से लड़ने के लिये सूफिज्म पर चलने की सलाह दी थी। मोदी अल्पसंख्यकों को सूफिज्म अपनाने की सलाह दे रहे हैं, मगर उनके पाले हुऐ बयानवीर आये दिन आतंकित करने के बयान जारी करते हैं। मोदी भारत का ऐसा इकलौता प्रधानमंत्री है जिसने अपना सीना 56 इंच बताया था, साथ ही खुद को चौकीदार भी बताया था।

मगर यह कैसा 56 इंची सीना है जिसके वश में खुद की टीम के ही लोग नहीं हैं ? हो न हो इस तरह के बयान देने वालों को मोदी की मौन स्वीकृती प्राप्त है। नहीं तो क्या वजह है कि आये दिन इस देश की अखंडता को तोड़ने वाले और जहर फैलाने वाले बयान जारी किये जा रहे हैं।

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भारत माता की जय के बीच नक्सली अटैक

राह चलते राहगीर को पकड़कर उससे जबरन भारत माता की जय कहलवाने वाले, और ऐसा न करने पर हाथ पैर तोड़ डालने वाले भारत माता के वीर सपूत अब कहां छिप गये हैं जब छत्तीस गढ़ दंतेवाड़ा में सात जवान शहीद हुऐ हैं ? अब भारत माता की जय नहीं बोलेगे ? क्या अब जिस्म के अंदर जमा भारत माता का लहू उबाल नहीं मार रहा है ?

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जिस छत्तीसगढ़ में आज ये जवान शहीद हुऐ हैं उसी राम राज्य पिछले वर्ष शहीद हुऐ जवानों की वर्दियां कूड़े के ढ़ेर में मिली थीं जिन्हें कुत्ते खींच रहे थे। चूंकि घटना राम राज्य की थी इसलिये देशभक्ती उबाल पर नहीं आई। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह आज उबाल पर नहीं आई, वरना सुब्ह तो मदरसा छात्रों को भारत माता के नाम पर पीटा गया था, उनके हाथ तोड़ दिये गये। अब देशभक्ती की जरूरत है, भाजपा की तमाम कैबिनेट, और संघ परिवार के गुंडे क्या अब उन शहीदों को घर जायेंगे जिन्हें आज नक्सलियों ने उड़ाया है ? अगर सच्चे देशभक्त हो तो भारत माता की जय बोलते हुऐ छत्तीसगढ़ कूच कीजिये और संभालियो मोर्चा नक्सलियों से। गर ऐसा नहीं कर पाते हो तो तुम देशभक्त नहीं, बल्कि गद्दार हो, कूपमंडूक हो, फासिस्सट हो, दकियानूसी हो, सांप्रदायिक हो, गंदे हो, आतंकवादी हो, मगर देशभक्त नहीं।

Muzaffarnagar Riots Court Lets Off 10 In Murder Of Boy Womanगुजरात और दिल्ली में अंतर

गुजरात और दिल्ली में अंतर है बहुत बड़ा अंतर है, सिक्ख जनसंहार के आरोपियों का राजनैतिक करियर जनसंहार के बाद पूरी तरह से खत्म हो गया, मगर गुजरात के आरोपी, लगातार चुनाव जीतते रहे, मंत्री बनते रहे, यहां तक कि अदालत से सजा सुनाऐ जाने तक माया कोडनानी मंत्री थीं। यह क्या है ? क्या यब फर्क नहीं है ? दंगों के मास्टरमाइंड को हिंदू हृद्य सम्राट की तरह प्रचारित किया गया, क्या सिक्ख जनसंहार के आरोपियों के साथ ऐसा किया गया ?

गुजरात दंगा न होता तो यह देश मोदी को उतना ही जान पाता जितना दूसरे राज्यों को मुख्यमंत्री को जानता है। मगर क्या सिक्ख जनसंहार के दोषी टाईटलर, सज्जन सिंह वगैरा की शिनाख्त उस तरह से की गई जिस तरह मोदी की जाती है ? गुजरात में दंगाई हाथों में वोटर लिस्ट लिये घूम रहे थे, क्या दिल्ली में सिक्खों के कातिलों के हाथ में कोई वोटर लिस्ट थी ?

गुजरात में सरकारी मशीनरी दंगों में शामिल थी मगर सिक्ख जनसंहार में तो सरकारी मशीनरी शामिल नहीं थी। जिस भाजपा के देखरेख में गुजरात हुआ उसके नेता आज भी मुसलमानों को गुजरात याद करने की धमकी देते हैं, क्या कांग्रेस के किसी नेता ने कहा है कि सिक्ख 1984 को याद करें। कुछ समझ आया गुजरात और दिल्ली को जमीन आसमान का फर्क है।

लाहौर आत्मघाती हमला और पाकिस्तान

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सलमान तासीर याद है ? सलमान याद हो न हो मगर मुमताज कादरी तो याद ही होगा ? वही मुमताज कादरी जिसने पाकिस्तान प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर के जिस्म को भून दिया था। उसने यह तब किया था जब वह सलमान की सुरक्षा में लगा हुआ था यानी उसकी हिफाजत करना कादरी का फर्ज था। मगर फर्ज के बरअक्स जाकर कादरी ने सलमान को महज इसलिये मार डाला क्योंकि सलमान पर कथित तौर से ईशनिंदा का आरोप था। बीते दिनों इस जुर्म में मुमताज को फांसी दे दी गई थी। पाकिस्तानी सड़कों पर जमा हुई मुमताज के जनाजे की भीड़ में पचास हजार से भी अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था।

किसी चरमपंथी के जनाजे में इतनी बड़ी संख्या में भीड़ का इकट्ठा होना भविष्य के पाकिस्तान के लिये खतरे की घंटी जरूर था। पाकिस्तान जिस चरमपंथ से जूझ रहा है, जिस चरमपंथ को पाकिस्तान मिटाना चाहता है उसमें सबसे बड़ा रूकावट चरमपंथियों को मिलने वाला यह अपार समर्थन भी है। कल लाहौर के पार्कों में बिखरे मासूमों के चिथड़ों से भी अगर पाकिस्तान की अवाम कुछ सबक नहीं लेती है तो फिर पाकिस्तान की अवाम को टुकड़ों में बिखरी हुई लाश उठाने की आदत डाल लेनी चाहिये। जो जहर तथाकथित धर्म रक्षकों ने धर्म के नाम पर बोया उसे पीढियां भुगतेंगी। भारत के अधिकांश बुद्धीजीवी लिख रहे हैं कि #Pray_For_Lahore मगर सवाल यह है कि आखिर दुआ किससे मांगी जाये ? क्योंकि कातिल भी अल्लाह हु अकबर के नारे के साथ है और मकतूल भी मरने से पहले उसी नारे को बुलंद कर रहा है।

और अंत में

कलकत्ते में पुल गिर जाने से दो दर्जन से अधिक मजदूर (इंसानों) की मौत हो गई, हम कुछ घंटे पहले तक विराट की बैटिंग पर तालियां पीट रहे थे और अब हार जाने के बाद मलाल कर रहे हैं, बहुत से लोगों को आज भूख नहीं लगेगी क्योंकि हमारा देश ‘खेल’ में हार गया। मगर जो लोग जिंदगी की जंग हारे हैं उनकी संवेदना के लिये हमारे पास दो लफ्ज तक नहीं थे। हां भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नक्वी ने जरूर संवेदना व्यक्त करते हुऐ कहा कि “पुल ममता सरकार की कमियों से गिरा है” बहरहाल सत्ता के लिये अवाम को दंगों की भट्ठी में झौंकने वाली पार्टी के नेताओं से इससे ज्यादा मार्मिक संवेदना व्यक्त करने की उम्मीद करना भी बेमानी होगी। मगर सवाल तो मध्यम वर्ग, और रिक्शा खींचने वाले वर्ग से है कि वे अपने आंगन में पड़ी लाशों को छोड़कर किन हाथों से कोहली के छक्कों पर ताली पीट रहे थे ? और अब हार जाने के बाद किन हाथों से अपना कलेजा थामे बैठे हैं ? यकीन नहीं होता कि ये उसी देश के लोग हैं जिसके आंगन में दो दर्जन मजदूरों की लाशें पड़ी हैं।

Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।
Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

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