इशरत जहां आतंकवादी थी — यह बात आज डेविड कोलमन हेडली नामक एक पूर्व आतंकवादी ने कही। जब पूर्व आतंकवादी ने कही है तो सही ही कही होगी। आतंकवादी आख़िर ग़लत क्यों बोलेगा? अब हमें किसी से कोई सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए। किसी जज की ज़रूरत नहीं, किसी अदालत की ज़रूरत नहीं, किसी मुकदमे की ज़रूरत नहीं। इशरत जहां टेररिस्ट थी और टेररिस्ट के साथ बस एक ही सलूक होना चाहिए कि उसे बिना कोर्ट-कचहरी के गोली से उड़ा दिया जाए। उसने कहां हमला किया, उसमें कितनों की जान गई, गई भी या नहीं, कुछ पता करने या जानने की ज़रूरत नहीं है।

ishratजो बात हेडली ने आज कही है (और शायद पहले भी कह चुका है), वह बात तो गुजरात की पुलिस यह बहुत पहले से जानती थी और इसीलिए उसने उसे मार गिराया। ठीक ही किया। आतंकवादियों के साथ यही सलूक होना चाहिए। फटाफट न्याय!

सही या ग़लत? सोच कर बोलिएगा। यदि पुलिस को यह लगे कि फलां आदमी या औरत आतंकवादी है तो उसे तुंरत उसकी छाती में या पीठ में (ताकि यह कहा जाए कि वे भाग रहे थे) गोलियां दाग देनी चाहिए? हां या ना?

मुझे पता है आपमें से ज़्यादातर लोगों का जवाब ‘हां’ में होगा। बहुत ख़ूब। तो आगे की जो बात मैं लिखने जा रहा हूं, वह उन्हीं पाठकों के लिए है जिन्होंने ‘हां’ कहा है। जिन्होंने ‘ना’ कहा है या अभी भी सोच रहे है, उनसे आख़िर में बात करेंगे।

जिन्होंने ‘हां’ कहा है कि इशरत जहां को ढेर करके पुलिस ने सही किया, मेरा सवाल यह है कि स्वामी असीमानंद, कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के साथ पुलिस को क्या करना चाहिए था? इन तीनों पर समझौता ट्रेन ब्लास्ट और मालेगांव बम धमाकों से जुड़े होने का आरोप है। मैं आरोप लिख रहा हूं क्योंकि अभी तक कोर्ट ने उनको दोषी नहीं ठहराया है ठीक वैसे ही जैसे कि इशरत जहां को किसी कोर्ट ने दोषी नहीं ठहराया है। तो इन तीनों को जिनके ऊपर ‘केवल आरोप’ हैं (असीमानंद का तो क़बूलनामा भी है हालांकि बाद में वह पलट गए) लेकिन गंभीर आरोप हैं, उनका अब तक गुजरात या किसी और राज्य की पुलिस ने एनकाउंटर क्यों नहीं किया गया? इशरत जहां का आतंक इन तीनों के आतंक से अलग कैसे है?

ishrat-400मैं जानता हूं आप तुरंत नीचे के कॉमेंट बॉक्स में जाकर यह कहने को आतुर होंगे कि प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित और असीमानंद निर्दोष हैं और उनको फंसाया गया है। सही कह रहे हैं। आपको शक करने का अधिकार है और हर अभियुक्त को यह कहने का अधिकार है कि वह निर्दोष है या कम से कम इतना बड़ा गुनहगार नहीं है जितना बताया जा रहा है (कर्नल पुरोहित का यही कहना है)। वैसे आपको यह जानकर हैरत होगी कि असीमानंद Caravan नामक भारतीय मैगज़ीन को दिए गए एक टेप किए हुए इंटरव्यू में प्रज्ञा ठाकुर और सुनील जोशी के बारे में कह चुके हैं, ‘मैंने उनसे कहा कि मेरे काम का दायरा अलग है। मैं कुछ और नहीं करूंगा। आपलोग यह काम करो। तुम कर सकते हो। यह काम ग़लत नहीं है, अच्छा है। जो कर रहा है, वह करना ही चाहिए। मंदिर पर जो आक्रमण हो रहा है, उसका बदला लेना ही चाहिए। आप लोग करो। तो वो लोग करने लगे। आश्रम एक केंद्र बन गया इसके लिए।’

अब एक और सवाल। असीमानंद ने इस टेप किए गए इंटरव्यू में माना है कि उन्होंने प्रज्ञा और सुनील को यह सलाह दी कि मंदिर पर हो रहे आक्रमण का बदला लिया जाना चाहिए और वे दोनों इसके लिए काम करने लगे तो क्या यह साबित हो गया कि प्रज्ञा और सुनील जोशी आतंकवादी थे? यदि हां तो प्रज्ञा को क्या तुरंत गोली से उड़ा देना चाहिए? न कोर्ट, न गवाही, न जिरह, कुछ नहीं। बस धांय-धांय।

अरे-रे-रे, आप तो बगलें झांकने लगे। बहाने खोजने लगे, ये-वो करने लगे।

ishrat-davidयही होता है। जब किसी मुस्लिम पर आतंकवादी होने का आरोप लगता है तो वह तत्काल आतंकवादी साबित हो जाता है जिसकी एक ही सज़ा है — धांय-धांय। और जब कोई हिंदू आतंकवादी होता है तो पहली प्रतिक्रिया यही होती है – फंसाया गया है। अब आप यह भी कहेंगे कि असीमानंद का इंटरव्यू झूठा है, फ़र्ज़ी है।

ख़ैर, मेरा मक़सद यहां यह साबित करना नहीं है कि इशरत निर्दोष थी और प्रज्ञा दोषी है। मेरे ख़्याल से दोनों आतंकवादी घटनाओं में लिप्त थीं। अंतर केवल यह है कि वह मुस्लिम आतंकवादी थी, यह हिंदू आतंकवादी है। मेरे लिए दोनों बराबर हैं। फिर भी मैं इशरत के फ़ेक एनकाउंटर को सही नहीं ठहराऊंगा वैसे ही जैसे मैं प्रज्ञा के फ़ेक एनकाउंटर को सही नहीं ठहराऊंगा। इस देश में अदालतें हैं, उन्हीं को फ़ैसला करने दीजिए हालांकि अदालतें भी कई बार सबूतों के बजाय ‘राष्ट्र की सामूहिक चेतना’ के आधार पर निर्णय करती हैं। लेकिन हमारे पास और कोई और बेहतर विकल्प है ही नहीं।

अब जिन्होंने ‘ना’ कहा, उनके लिए कुछ कहना चाहूंगा। सही है, हम पुलिस को यह अधिकार नहीं दे सकते कि वह कानून अपने हाथ में ले ले। उस पुलिस को जो उतनी ही जातिवादी और सांप्रदायिक है जितना कि हमारा समाज। सबूतों की कमी नहीं। वैसे अगर इस लिंक पर असीमानंद का इंटरव्यू पढ़ेंगे तो पाएंगे कि जेल में पुलिस उनके साथ किस श्रद्धाभाव से पेश आ रही थी। रिपोर्टर ने जब उनसे पूछा कि जेल में पुलिसवाले उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तो उनको कहना था, ‘…किया कि नहीं किया, अच्छा काम हुआ जो हुआ। यहां जो स्टाफ है, जो काम हुआ, अच्छा हुआ, ठीक हुआ। इसलिए हम दोनों को अलग नज़र से देखते हैं। सबके मन में भाव है। इसलिए अलग नज़र से देखते हैं। अच्छा काम है। हमने किया कि नहीं किया, ये लोग सोचते भी नहीं। किया होगा तो अच्छा किया।

वैसे जाते-जाते एक मज़ेदार बात बताना चाहूंगा। आज जब बीजेपी के प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह टीवी पत्रकारों के सामने हेडली के बयान का ज़िक्र कर रहे थे तो डेविड कोलमैन हेडली नामक इस पूर्व आतंकवादी के लिए उन्होंने ’उन्होंने’ शब्द का प्रयोग किया। भई, आतंकवादी था तो क्या, 26/11 की तैयारी से जुड़ा था तो क्या, सैकड़ों निर्दोषलोगों की हत्या का अप्रत्यक्ष रूप से ज़िम्मेदार था तो क्या, आज तो उसने ऐसा बयान दिया है जिससे बीजेपी और अमित शाह की बाछें खिल रही हैं। ऐसा बयान देनेवाले के प्रति सम्मान का भाव तो आता ही है। नहीं क्या?

नवभारत टाइम्स से लिया गया नीरेंद्र नागर  का  लेख 


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