2011 में कई अरब व मध्य-पूर्व एशियाई देशों में फैले विद्रोह की आग अब यमन तक फैल गई है। वहां शिया समुदाय से संबंध रखने वाले हूदी मिलीशिया ने राष्ट्रपति आबिद रब्बू मंसूर हादी के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विद्रोह कर उन्हें देश छोडकर भागने के लिए मजबूर कर दिया है। राष्ट्रपति हादी नेे यमन छोडकर अदन में पनाह ली है जबकि हूदी विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना व उसके आसपास के क्षेत्रों में अपना पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है। यमन में हालांकि 2011 के बाद से ही शिया-सुन्नी संघर्ष की चिंगारी धधक रही थी जिसने पिछले दिनों एक बड़े विद्रोह का रूप धारण कर लिया। गौरतलब है कि अमेरिकी सैन्य गठबंधन द्वारा तालिबान व उसके समर्थक लड़ाकों को अफगानिस्तान से खदेड़ने के बाद तमाम अलकायदा व अन्य सुन्नी लड़ाकों ने यमन में पनाह ली थी। इस समय यमन में एक ओर शिया विद्रोहियों को उन्हीं सुन्नी अलकायदा व वर्तमान आईएसआईएस समर्थकों से भी दो-दो हाथ करना पड़ रहा है तथा वहां की मान्यता प्राप्त सुन्नी सरकार से भी इनका मुकाबला है। यमन में शिया विद्रोह के बाद राष्ट्रपति मंसूर हादी द्वारा सहायता की अपील के बाद प्रत्याशित रूप से सऊदी अरब ने अपने संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, कुवैत,कतर तथा बहरीन जैसे लगभग दस देशों के गठबंधन के साथ वहां शिया विद्रोहियों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई विशेष कर हवाई हमले शुरु कर दिए हंै। कहने को तो सऊदी अरब यह कार्रवाई यमन की संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त सरकार को शिया विद्रोहियों से बचाने तथा वहां शांति स्थापित करने के लिए कर रहा है। परंतु दरअसल अरब द्वारा इस कार्रवाई का मकसद यमन में ईरान समर्थित शिया विद्रोहियों को सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिशों से रोकना है। यहां यह भी काबिलेगौर है कि यमन में हूदी मलीशिया को ईरान द्वारा प्रशिक्षित किए जाने तथा इन्हें हथियारों की आपूर्ति करने का आरोप है जबकि ईरान इन आरोपों से इंकार करता आ रहा है।

यमन में पैदा हुए इस ताजातरीन घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यमन के बहाने इ्र्ररान व सऊदी अरब को सामने ला खड़ा करने में अमेरिका की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस सुन्नी विशेषकर वहाबी विचारधारा रखने वाले कट्टरपंथी बेरहम आतंकवादी संगठन आईएस ने अबु बकर अल बगदादी के नेतृत्व में सीरिया व इराक सहित कई देशों में आतंक फैला रखा है तथा कट्टरपंथी इस्लामी साम्राज्य स्थापित करने के मंसूबे पर अमल करते हुए आए दिन क्रूरता के नए इतिहास लिख रहा है, सऊदी अरब व उसके सहयोगी देशों ने आिखर उस आइ्रएसआईएस के विरुद्ध अब तक अपना सैन्य गठबंधन इतनी सक्रियता के साथ क्यों नहीं खड़ा किया? आखिर आईएस के लड़ाकों पर सऊदी अरब व उसके सहयोगी अरब देश इतनी सक्रियता से हवाई हमले क्यों नहीं कर रहे? एक और सवाल इसी आईएसआईएस के जेहादी मिशन से जुड़ा यह कि इन वहाबी सुन्नियों के संगठन के विरुद्ध अमेरिका ने ईरान से ही सहयोग लेने की जरूरत क्यों कर महसूस की? इराक व यमन में अमेरिकी रणनीति के अजीबो-गरीब समीकरण दिखाई दे रहे हैं। यानी एक ओर तो यमन में शिया विद्रोहियों के विरुद्ध अमेरिका सऊदी अरब व उसके गठबंधन सहयोगियों को सहयोग दे रहा है तो दूसरी ओर इराक में आईएसआईएस के विरुद्ध ईरान के सहयोग से अपना अभियान चला रहा है। जबकि यमन के विद्रोहियों को ईरानी समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है और वहाबी आईएसआइ्रएस लड़ाकों को सऊदी अरब का नैतिक समर्थन हासिल है। ईरान के उपविदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल लाहियान ने पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव से मुलाकात कर यमन में सऊदी अरब के सैन्य हस्तक्षेप को तत्काल रोके जाने की अपील की है। ईरान ने यह चेतावनी भी दी है कि इस प्रकार के हमले सऊदी अरब के हित में कतई नहीं हैं और सऊदी अरब के इस कदम से पूरे क्षेत्र की शांति को खतरा हो सकता है। ईरानी मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र से मांग की कि वह यमन में अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए सऊदी अरब से यमन में हवाई हमले तत्काल बंद करने को कहे।

यमन में अरब हस्तक्षेप में अमेरिकी भूमिका और इस आग को हवा देने में अमेरिकी जल्दबाजी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों प्रमुख अमेरिकी मीडिया हाऊस सीएनएन ने यह समाचार प्रसारित किया कि पाकिस्तान भी सऊदी अरब गठबंधन के साथ यमन के शिया विद्रोह को कुचलने में शामिल हो गया है। तथा उसके 15 लड़ाकू विमान यमन में हूदी विद्राहियों के विरुद्ध हो रहे हवाई हमलों में हिस्सा ले रहे हैं। इस समाचार के प्रसारित होते ही पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने इन समाचारों का जोरदार खंडन करते हुए इस आशय की सभी खबरों को बेबुनियाद बताया और कहा कि पाकिस्तान सऊदी अरब गठबंधन का हिस्सा बनकर यमन में हो रही कार्रवाई में भाग नहीं ले रहा है। सवाल यह है कि फिर पाकिस्तान के हवाले से इतनी गैर जिम्मेदराना खबर प्रसारित करने का सीएनएन का मकसद आिखर क्या था?क्या यह विश्व में शिया-सुन्नी समुदायों के बीच फासला पैदा करने तथा पाकिस्तान को अरब समर्थक व ईरान विरोधी देश प्रमाणित करने का एक अमेरिकी प्रयास नहीं तो और क्या था? इस समय यमन के भीतरी हालात सत्ता संघर्ष के उस खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं कि यदि यमनवासियों की अपनी सूझबूझ से यह हालात यथाशीघ्र नियंत्रित नहीं हो सके तो बाहरी दखल अंदाजी के चलते युद्ध क्षेत्र बनता जा रहा यमन एक बड़ी अमेरिकी साजिश का शिकार होने से स्वयं को बचा नहीं सकेगा। और कोई आश्यर्च नहीं कि यमन गृहयुद्ध की भेंट चढने के बाद दुनिया में दूसरा सोमालिया बन जाए? और यदि ऐसा हुआ तो यह दुनिया में शांति के नाम पर घडियाली आंसू बहाने वाले अमेरिका की एक सफल रणनीति मानी जाएगी।

पिछले दिनों ईरान के परमाणु मुद्दे को लेकर अमेरिका के रुख में आई नरमी को लेकर भी सऊदी अरब काफी चिंतित है। न तो उसे ईरान के प्रति अमेरिका का बदलता जा रहा लचीला रुख भा रहा है न ही इराक में आईएस के विरुद्ध होने वाले हमलों में अमेरिका-ईरान सहयोग उसके गले उतर रहा है। यमन में सऊदी अरब का सैन्य गठबंधन सहयोगी देशों के साथ दखल अंदाजी करना अरब की ईरान के प्रति खीझ का भी एक परिणाम है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और मजे की बात यह भी है कि भले ही पश्चिमी मीडिया आईएसआईएस,यमन प्रकरण तथा हूदी विद्रोहियों के मामलों में ईरान व अरब की अलग-अलग दखल अंदाजिशों को मुस्लिम जगत के व्यापक स्तर पर होने वाले शिया-सुन्नी तनाव के रूप में क्यों न प्रचारित कर रहे हों, परंतु इसी तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि दुनिया के कई मुस्लिम देश तथा आम मुस्लिम जनता इस पूरे घटनाक्रम को शिया-सुन्नी तनाव के रूप में नहीं देखना चाहती। विश्व की एक बड़ी सुन्नी आबादी का भी यही मत है कि मुस्लिम देशों को ऐसे शासकों से निजात मिलनी चाहिए जो अमेरिका के पिछलग्गू बने रहते हैं। ऐसी विचारधारा रखने वाला विश्व का एक बड़ा सुन्नी वर्ग ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदी नेजाद तथा ईरान की अमेरिका के विरुद्ध अपना कड़ा रुख रखने वाली नीतियों का भी समर्थक है। यही वह वर्ग है जो भले ही सद्दाम हुसैन की क्रूरता व उसकी तानाशाही का विरोधी तो जरूर था परंतु अमेरिका के विरुद्ध सद्दाम हुसैन के कड़े रुख का समर्थक था। परंतु निश्चित रूप से यह सुन्नी जगत सऊदी अरब व अरब देशों के अन्य अमेरिकी कठपुतली नुमा शासकों के विरुद्ध है। परंतु अपनी तानाशाही को बचाने के लिए तथा आम लोगों के विद्रोह से स्वयं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अमेरिका की खुशामदपरस्ती करना अरब शासकों व तानाशाहों की मजबूरी बन चुकी है। दूसरी ओर अमेरिका भी पूरे विश्व में स्वयं को लोकतंत्र का कितना बड़ा हिमायती क्यों न बताता हो परंतु अरब देशों में उसी अमेरिका को न तो राजशाही नजर आती है न ही तानाशाही?

इसमें कोई शक नहीं कि आज अगर पूरा मुस्लिम जगत संगठित होता तथा इनमें विश्वास का वातावरण होता तो िफलिस्तीन कब का स्वतंत्र हो चुका होता और इजराईल की क्रूरता का समय-समय पर शिकार न हो रहा होता। इराक,सीरिया व अफगानिस्तान भी इस प्रकार से बरबाद न हुए होते। परंतु एक बड़ी अमेरिकी चाल का शिकार होते हुए मुस्लिम देश कहीं एक-दूसरे देश से टकराते गए तो कहीं जातीय संघर्ष में अपने ही देश को तबाह कर डाला। और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अब अमेरिका ने यमन के बहाने अरब व ईरान को आमने-सामने खड़ा कर पूरे विश्व को शिया-सुन्नी संघर्ष की आग में झोंकने का प्रयास किया है। इसे एक सफल अमेरिकी रणनीति का परिणाम तो जरूर कहा जा सकता है परंतु देखना यह होगा कि मुस्लिम जगत अमेरिका की इस चाल का शिकार किस हद तक हो पाता है और किस हद तक वह स्वयं को इस अमेरिकी साजिश से सुरक्षित रख पाता है?

तनवीर जाफरी


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