वर्ष 2016-17 के लिए आने वाले बजट से हमें क्या उम्मीद करनी चाहिए? मैं उम्मीद करता हूं कि वित्तमंत्री मौजूदा वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटे के 3.9 फीसद के लक्ष्य को आसानी से पा लेंगे।

यह अच्छा ही है कि फरवरी के आखिरी दिन सोमवार होगा, जिस दिन बजट पेश किया जाएगा। टिप्पणीकार आज थमकर कुछ गहरी सांसें ले सकते हैं, ताकि अगले दिन सुबह बिना रुके धाराप्रवाह टिप्पणियां कर सकें। किसी सरकार का तीसरा बजट एक अहम मुकाम है। अगर अर्थव्यवस्था ढलान पर है, तो यह उसे संभालने और सुदृढ़ करने का समय है, अगर अर्थव्यवस्था गतिरोध का शिकार है तो उसे उस गतिरोध से निकालने का यह आखिरी मौका है।

अर्थव्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है। वृद्धि दर फीकी है- कुछ लोग कहेंगे यह अतिरंजित है- 7.4 फीसद से 7.6 फीसद के बीच। ग्रामीण भारत की दशा बहुत शोचनीय है। रोजगार सृजन के लक्षण नहीं दिख रहे हैं। आर्थिक वृद्धि की चार चालक शक्तियों में से दो बुरी तरह लड़खड़ा रही हैं। ये हैं निजी निवेश और निर्यात। अनेक परियोजनाएं संकटग्रस्त हैं या अटकी हुई हैं। महंगाई के आंकड़े भ्रामक हैं। जबकि थोक मूल्य सूचकांक के हिसाब से महंगाई की दर नकारात्मक है, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई की दर जनवरी 2016 में 5.7 फीसद पर पहुंच गई। इससे उत्पादक और उपभोक्ता, दोनों नाखुश हैं।

कोई भी दो साल समान नहीं होते और अर्थव्यवस्था जिन समस्याओं से जूझ रही है उनका किताबी समाधान नहीं हो सकता। अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए यह जरूरी है कि सरकार कल्पना-शक्ति और हिम्मत से काम ले।

वादे ज्यादा, अमल कम: नरेंद्र मोदी की सरकार तेज और टिकाऊ विकास के वादे पर ही वजूद में आई। अगर सरकार ने अपने वादे पूरे किए होते, तो हर कोई मई 2014 की बनिस्बत आज कहीं ज्यादा खुश होता। डर के साथ यह कहना पड़ता है कि मैं जिन लोगों से मिला हूं उनमें से शायद ही कोई वास्तव में पहले से अधिक प्रसन्न हो। इसके विपरीत, हर व्यक्ति कमोबेश दुखी या मायूस है। इनमें सत्तारूढ़ दल के वे खामोश पर्यवेक्षक (विशेषकर वरिष्ठ) भी शामिल हैं जिन्हें यह मजे से अहसास हो चुका है कि सरकार के पास कोई सोच और इच्छाशक्ति नहीं है।

इसकी वजह है कि यह सरकार वादे ज्यादा करती है, अमल कम। पार्टी (भाजपा) और उसके समर्थक (आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन) सरकार के लिए सहायक सिद्ध नहीं हुए: उन्होंने रास्ता बदल दिया, विकास के बजाय असहिष्णुता, सहयोग के बजाय टकराव। सो अर्थव्यवस्था का ग्राफ चढ़ने के बजाय हम असहिष्णुता का उभार देख रहे हैं। समाज के सभी तबकों के लोग सरकार के प्रति अपनत्व महसूस करें, इसके बजाय हम पाते हैं कि किसान, दलित, आदिवासी, मुसलिम और विद्यार्थी जैसे कई अहम तबके सशंकित हैं और खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

वर्ष 2016-17 के लिए आने वाले बजट से हमें क्या उम्मीद करनी चाहिए? मैं उम्मीद करता हूं कि वित्तमंत्री मौजूदा वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटे के 3.9 फीसद के लक्ष्य को आसानी से पा लेंगे। कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट से उन्हें 140,000 करोड़ रुपए का शानदार तोहफा मिला, जिसका इस्तेमाल वे इन तीन खाइयों को पाटने में करेंगे- कर राजस्व में आई कमी, गैर कर-राजस्व (खासकर विनिवेश) में आई कमी, और राजकोषीय घाटे में हुई बढ़ोतरी। सवाल है कि क्या वे राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के रास्ते पर डटे रहेंगे और 2016-17 के लिए 3.5 फीसद का लक्ष्य तय करेंगे? अगर वे करेंगे तो यह खुशी की बात होगी, अगर नहीं करेंगे तो नकारात्मक संदेश जाएगा।

ग्रामीण भारत की व्यथा:  दूसरे, करने लायक कामों की मेरी सूची में सबसे ऊपर है ग्रामीण भारत की दुर्दशा पर ध्यान देना। तीन साल से सूखा या सूखे जैसी स्थिति रही है, मगर सरकार इसे नजरअंदाज करती रही और लगभग पचहत्तर हजार करोड़ रुपए की कटौती उन कार्यक्रमों के मद में कर दी, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पूंजी का एक प्रवाह ला सकते थे। इसके अलावा, सरकार ने न तो मनरेगा के प्रति उत्साह दिखाया न न्यूनतम समर्थन मूल्य में तार्किक बढ़ोतरी की। व्यवहार में, ग्रामीण मजदूरी ठहरी हुई है। ये सारी बातें ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोर मांग तथा किसानों, खेतिहर मजदूरों और दलितों में गहरे असंतोष की ओर इशारा करती हैं। तीसरे, हमें देखना चाहिए कि सरकार ने अपना लेखा-जोखा कैसा बिठाया है। कहीं सरकार ने राजस्व-प्राप्ति के अव्यावहारिक लक्ष्य तो तय नहीं किए हैं, या खर्चों का कमतर अनुमान तो नहीं लगाया है? चौथे, हम देखना चाहिए कि खर्चों की बाबत 2015-16 के संशोधित अनुमान क्या थे, और 2016-17 के बजट अनुमान क्या हैं, खासकर सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों को लेकर। क्या सरकार 2015-16 के अपने लक्ष्यों को पूरा करेगी और 2016-17 के लिए पर्याप्त धनराशि मुहैया कराएगी। पांचवें, हम देखेंगे कि लुढ़कते निर्यात और निजी निवेश में सुस्ती की समस्याओं का बजट किस तरह से सामना करता है। कोई कार दो पहियों पर नहीं दौड़ सकती। अभी तक सरकार ने ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं कि वह इन दोनों समस्याओं से किस तरह उबरेगी।

संख्याबल से आगे: छठे, 2016-17 में विधायी एजेंडा क्या होगा? क्या सरकार जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) विधेयक को पास कराने के लिए कटिबद्ध है और वह इस मामले में विपक्षी दलों के नजरिए को भी समाहित करेगी? क्या सरकार पूंजीगत लाभ पर पूर्व-प्रभाव से लागू होने वाले कर-प्रावधान को रद्द करेगी? क्या सरकार प्रत्यक्ष कर संहिता तथा वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग की सिफारिशों को संसद के पटल पर रखेगी? सातवें, क्या कल आने वाला बजट पिछले दो बजटों का ही अनुसरण करेगा और छोटी-छोटी छिटपुट ‘पहल’ के मदों में पचास करोड़ या सौ करोड़ के आबंटन की निरर्थक घोषणाएं की जाएंगी? आठवें, क्या सरकार लोकसभा में अपने पूर्ण बहुमत (जो पिछले तीस सालों में किसी भी सरकार को हासिल नहीं था) का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था, नियामक ढांचे और प्रशासनिक मशीनरी में साहसिक ढांचागत सुधारों के लिए करेगी? मुझे भरोसा है कि एक पार्टी, जिसके पास अपने बूते लोकसभा में दो सौ बयासी सदस्यों की ताकत है, अवसर को बर्बाद नहीं जाने देगी, यानी गहरे और व्यापक ढांचागत सुधारों की जिम्मेदारी से जी नहीं चुराएगी।

और अंत में, हमारी उत्सुकता इस बात में होनी चाहिए और हमें पूछना चाहिए कि बजट-भाषण किसने लिखा था! वित्तमंत्री को मेरी शुभकामनाएं! (Jansatta)


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