अब जब की उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2017 सर पर है अचानक प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार को अल्पसंख्यक याद आये। सरकार ने तीन सदस्यों की एक समिति गठित की है जो अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में अफसर तलाशेगी।

यह चार साल में पहली बार हुआ है जब अखिलेश सरकार ने अल्पसंख्यकों के विकास को लेकर कोई ठोस कदम उठाने की पहले की है। लेकिन सवाल यह है की यह फैसला पहले क्यूँ नहीं लिया गया जब पार्टी सत्ता के मज़े ले रही थी। इस समिति को इलाहबाद की एग्रीकल्चरल डीम्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. मोहम्मद कलीम की अध्यक्षता करेंगे साथ ही सचिव अप्ल्संख्यक कल्याण शफात कमाल को सदय सचिव बनाया गया है।

भले ही अब सरकार मुसलमानों और दलितों को लेकर नयी स्कीम लाया हो लेकिन सत्ता में पिछले चार साल कुछ और ही बयान करते। 2012 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पहले बजट भाषण में घोषणा की थी के अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में डिग्री कॉलेज और पॉलिटेक्निक खोले जाएँगे लेकिन यह भी जीत के ख़ुशी में दिया गया बयान बन कर रह गया।

2012 विधान सभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण देने का चुनावी जुमला दिया था लेकिन आज तक इस बयान को अमली जामा नहीं पहना सके। सरकारी नौकरियों में भी मुसलमानों का प्रतिशत ज़यादा नहीं है चाहे पुलिस हो या पीएसी। इसी सबके चलते कई बार शाही इमाम दिल्ली जमा मस्जिद सय्यद अहमद बुखारी ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव को ख़त भी लिखे। वैसे ही बरेली दरगाह आला हज़रत के मौलाना तौकीर रज़ा ने भी ऐतेराज़ जताया था यहाँ तक उन्होंने राज्य मंत्री का दर्जा तक ठुकरा दिया था।

एक और चुनावी वादा जो समाजवादी पार्टी सरकार ने किया था वह यह की बेगुनाह मुसलमान नौजवानों को जेल के छुड़ाना जिनपर तहत कथिति तौर पर आतंकवाद के मुक़दामे लगाये गए थे। इस वादे पर भी सरकार खरी नहीं उतरी और आज तक सरकार कुछ नहीं कर पायी। यहाँ तक एक ऐसा ही नौजवान खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत तक हो गयी। और साथ ही बिना सरकार के हस्तक्षेप के कोर्ट ने कई बेगुनाह नौजवानों को रिहा कर दिया।

सवाल अभी भी यही है की जो सरकार अभी तक अपने वादों पर खरी नहीं उतर सकी थी वह अपने इस नए वादे को कैसे पूरा करेगी। क्या यह वादा भी “जुमला” ही रह जाएगा या फिर सरकार इसको चुनाव से पहले निभा लेगी।

– हुज्जत रज़ा


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