सैय्यद ज़ैगम मुर्तज़ा

लोग मज़हब को लेकर बड़ी बड़ी बातें करते हैं। इतनी बड़ी बड़ी बातें कि हम जैसे छोटे-छोटे लोग इन्हें हज़म नहीं कर पाते। लोग दूसरे मज़हबों पर तब्सरे करने में लगे हैं लेकिन ये महज़ फसाद फैलाना है। जब आपने दूसरों के अक़ीदे पढ़े ही नहीं तो फिर उनपर ज्ञान देने का फायदा भी क्या। इसके बावजूद अल्लाह के स्वंभू एजेंट कुफ्र के फतवे और तनक़ीदों की तलवार हाथ में लिए बौद्धिक आतंकवाद फैला रहे हैं।

बहरहाल कुछ लोग ख़ुदा की ठेकेदारी में लगे हैं। मज़हब और फिर्क़ों के नाम पर गैंग बने हैं और हर सामाजिक जगह जंग का मैदान बनी है। लेकिन इसके लिए मज़हब नहीं इंसान का मूल स्वभाव ज़िम्मेदार है। लड़ाई आदमी के प्राकृतिक स्वभाव में है भले ही लोग मज़हब इसकी जड़ बताकर सिरे से ख़ारिज करें।

लड़ाई में ही लोगों को मज़ा आता है। तीतर, मुर्ग़े, बटेर की लड़ाई, कुश्ती, बाक्सिंग, ये सब मानव चरित्र से जुड़े हैं। कुछ के मन में दयाभाव भी हो सकता है मगर ग़ुस्सा हमेशा उसपर हावी रहता है।

ज़्यादातर इंसानों में इंसाफ का अभाव है और वो श्रेष्ठता ग्रंथि से बुरी तरह ग्रसित हैं। ये हर चीज़ का हल मारपीट और झगड़े में ढूंढ रहे हैं और बेचारा मज़हब भी इनसे बच नहीं पा रहा है।

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अब लोग अक्सर कहते हैं हमारे धर्म ग्रंथ में तमाम दुनिया का ज्ञान, विज्ञान, समाजियात, शिक्षा, नीति, रणनीति सबकुछ है। ये किसी एक का नहीं तक़रीबन सभी का दावा है। इस विचार को आगे बढ़ाने में अधपढ़ और अनपढ़ों की बड़ी तादाद है। एक श्र्लोक या एक आयत नहीं पढ़ी न पढ़ने का वक़्त निकाला… मगर जब बात करेंगे तो समझाएंगे कि आप फलां ग्रंथ पढ़िए। तमाम समस्याओं का हल उसमें हैं। अब आप मुझे नास्तिक कह सकते हैं लेकिन अपने अलावा दूसरों के भी जो दो चार ग्रंथ पढ़े या पढ़ने की कोशिश की उसमें कहीं रॉकेट साईंस या न्यूक्लियर तकनीक जैसा कुछ नहीं मिला। लेकिन लोगों ने अपने धर्म और धर्म ग्रंथों को बाबा बंगाली का आल इन वन समस्या सुलझाओ केंद्र बना दिया है।

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कोई भी धर्म ग्रंथ बहुत बड़ी-बड़ी बातें नहीं पढ़ा रहा। बल्कि बहुत सी छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें बड़ा और आसान करने को कह रहा है। जहां तक क़ुरान की ही बात है को इसमें क्रायोजेनिक इंजिन बनाने या स्टेमसैल तैयार करने के तरीक़े नहीं बताए गए हैं। इसमें सही और ग़लत, अच्छाई और बुराई, इंसान और हैवान का फर्क़ बताया जा रहा है। इसे समझाने के लिए नबी और पैग़बंरों की ज़िंदगी से जुड़े क़िस्से हैं। क़ुरान बार बार मुकम्मल या आदर्श इंसान और आदर्श समाज बताने की बात कर रहा है।

अब कहीं मानने वाले न कह दें कि आदर्श स्थिति हासिल करना नामुमकिन है सो इसे साबित करने के लिए नज़ीर हैं। अल्लाह को मानने वालों के जीवन प्रसंग हैं जो ये बताती हैं कि अलग अलग हालात में लोगों ने क्या अमल किया। इसमें ज़्यादा ज़ोर मानवीय होने पर है। अमानवीय लोगों से निपटने के तरीक़े भी बताए गए हैं और इस से जुड़ी शर्तें भी। और शायद यही सबकुछ बाक़ी दूसरे धर्म ग्रंथों में भी है। भाषा, उदाहरण और शैली का फर्क़ हो सकता है।

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बहरहाल मज़हब दिखावों औऱ बड़ी बड़ी बातों में घिरा है। सुन्नत के नाम पर हमें टख़नों से ऊंचे पायजामे, बाल, लिबास, हुलिए सिखाए जा रहे हैं मगर कोई ये नहीं बता रहा कि अख़लाक और किरदार भी सुन्नत का ही हिस्सा हैं। न क़ब्र में आपके हुलिए पर तब्सरे होंगे और न हश्र के मैदान में आपके कपड़ों का हिसाब किताब होगा। वहां तो कपड़ो की वजह से पैदा हुए तकब्बुर, दूसरों के साथ आपके बर्ताव और आपके उन कामों का हिसाब-किताब होगा जो आपने किए हैं। गालियां देना, लोगों का जीना हराम करना, लोगों से लेकर हज़म कर जाना, नाजायज़ हरकतें, क़ब्ज़े सुन्नत नहीं हैं। आप लोग जितनी बड़ी-बड़ी बातें हमें समझा रहे हैं वो मज़हब नहीं है… लेकिन अच्छी तहज़ीब मज़हब का हिस्सा ज़रूर है। मज़हबी जंग लड़ने से पहले इन सबका ख़्याल ज़रूर करलें।

लेखक राज्यसभा टीवी से जुड़े है 


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