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बैंक और एटीएम के बाहर लाइन लगाकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे लोगों के चेहरे पर परेशानी के भाव तो हैं लेकिन बात करने पर पता चलता है कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के फ़ैसले को समर्थन दे रहे हैं। यह आम आदमी की आवाज़ है जो मानता है कि कुछ दिन की परेशानी झेली जा सकती है लेकिन हमारे सिस्टम में गहरे पैठे भ्रष्टाचार से वह उकता चुके हैं। बैंक कर्मचारियों पर भारी दबाव है लेकिन बैंककर्मी ख़ुश हैं कि उनके सिस्टम में नया और अप्रत्याशित धन के आने से उनकी स्थिति वैसे ही सुधर जाएगी जैसे ब्लड कैंसर से जूझ रहे मरीज़ का पूरा ख़ून बदल दिया जाए। यह बहुत ख़ुशी की बात है कि कॉस्ट अकाउंटेंट सरकार के इस सुधि क़दम में साथ दे रहे हैं और वह बेहतर जानते हैं कि धन का प्रवाह, निकासी और एकाउंटेंसी में स्थिति में काले धन का दख़ल कितना विकराल है। सिस्टम में बड़े नोट के रूप में स्थापित काले धन को बाहर निकालने या उसे बैंकिंग सिस्टम तक लाने में जो भूमिका कॉस्ट अकांटेंट निभा सकते हैं, उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती।

पाँच सौ और एक हज़ार के नोट बंद कर पाँच सौ और दो हज़ार के नए नोट चलन में लाने की आठ नवम्बर की घोषणा के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आम आदमी तारीफ़ करते नहीं थक रहा। वह समझ रहा है कि बड़े नोटों के रूप में देश में जमा काला धन या तो बाहर आएगा या जो लोग यह धन बाहर नहीं ला पाएंगे, उसे दान कर देंगे या नष्ट कर देंगे। इस 30 दिसम्बर के बाद जब बैंकों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया इस वित्तीय वर्ष का हिसाब किताब करेगा तो उसके सामने हैरान कर देने वाले लेकिन सकारात्मक आँकड़े होंगे। यह सही बात है कि पाँच सौ और एक हज़ार रूपए मूल्य के 14 लाख करोड़ रूपए के बैंक नोट चलन से बाहर हो जाएंगे लेकिन यह उम्मीद है कि पाँच से सात लाख करोड़ की नक़दी ही बैंक तक पहुँचेगी और रिज़र्व बैंक अप्राप्त कैश के आधार और अपने सोने के उपलब्ध भंडार के आधार पर नए नोट छापकर उन्हें अकाउंट निर्धारित सिस्टम में ला सकेगा। इस क्रांतिकारी बदलाव से देश को दो बड़े मुनाफ़े होंगे। पहला पाँच लाख करोड़ का हमारा वित्तीय घाटा बैंकों में प्राप्त वैध धन से शून्य हो जाएगा और बैंकों तक नहीं पहुँचने वाले क़रीब नौ लाख करोड़ के नए नोट रिज़र्व बैंक अपने पास रख पाएगा। बिना स्वर्ण भंडार बढ़ाए रिज़र्व बैंक की असेट बढ़ेगी बल्कि वह बैंकों को मदद भी कर पाएगा। बाज़ार में शुष्कता के चलते महँगाई पर क़ाबू पाया जा सकेगा, बेवजह महंगी सम्पत्ति सस्ती होगी और लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़े सस्ते दामों पर मिलेगी। लेकिन इन सब की एक क़ीमत है जो आम हिन्दुस्तानियों को सब्र और सहयोग से ही अदा की जा सकती है।

भारत की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए जीएसटी से भी बेहतर क़दम उठाकर नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचारियों को तो परेशान कर दिया लेकिन कॉस्ट अकांटेंट, बैंकिंग सेक्टर, व्यापारी, पेशेवर, नौकरीपेशा, करदाता, कॉर्पोरेट, कराधन पर कारोबार करने वाले, विदेशी निवेशक, निवेश की सभी एजेंसियों और रिज़र्व बैंक को बहुत बड़ी उम्मीद दी है। इस महान् लेकिन साहसिक क़दम के लिए जिस राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता थी, वह नरेन्द्र मोदी से अधिक कोई और दिखा भी नहीं सकता था। हमारी 17.5 लाख करोड़ रुपए के सालाना सकल घरेलू उत्पाद में पाँच सौ और एक हज़ार के बैंक नोट की 14 लाख करोड़ रुपए की नक़दी पूरे साल चक्कर लगाकर वापस व्यक्ति ए से व्यक्ति ज़ेड तक पहुँच जाती लेकिन सरकार को देश चलाने के लिए ज़रूरी टैक्स नहीं मिल पाता। मोदी ने एक झटके में इस कैश इकॉनोमी को ही नष्ट कर दिया। अब यह पैसा बैंकिंग सिस्टम में आएगा, कर विभाग के पास इसका हिसाब होगा, धन के सिस्टम में आने से सकल घरेलू उत्पाद के आँकडो़ं में ज़बरदस्त उछाल आएगा और इन्हीं कारोबारियों को सरकार बेहतर सुविधा दे पाएगी। रिज़र्व बैंक के कैश एसेट बढ़ने से बैंक जिस नॉन परफ़ॉर्म एसेट के आधार पर घाटे का रोना रो रहे थे, उसे जनता के पैसे से नई जान मिलेगी। नए क़र्ज़ सस्ते और सुगम होंगे, स्टार्ट अप के सपनों के लिए उम्मीद लगाए बेठे करोड़ों युवा बैंकों से आसान क़र्ज़ ले पाएंगे, कर दर घटेगी और मुद्रा के आवागमन का हिसाब रखा जाएगा।

मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया के लिए सिर्फ़ योजना बना देना काफ़ी नहीं था। सिंगापुर की तरह जिस भी देश ने आर्थिक तरक़्क़ी को बुलंदियों तक पहुँचाया है वहाँ सिर्फ़ योजनाओं ने कार्य नहीं किया बल्कि सरकार को ढांचागत सुधार भी करने पड़े हैं। भारत सरकार को उम्मीद है कि चलन से बाहर किए गए जो नोट बैंक तक तक नहीं आ पाएंगे, उसके बराबर नई नक़दी छापकर उसे ढांचागत सुधार में लाया जा सकेगा। भारत में व्यापार और सेवा क्षेत्र की अपार संभावनाएँ हैं लेकिन कहना ना होगा भूमि अधिग्रहण, बिजली पानी की आपूर्ति, वेयर हाउस, वेंडर सर्विस, रेल एवं रोड सम्पर्क, नए बैंक एवं इनमें नई नौकरियों, नई तकनीक की ख़रीद और लागूकरण के लिए जितना धन चाहिए, वह सरकारी ख़ज़ाने में नहीं था। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि सिस्टम में लाए जाने वाले नए धन से अगले वित्तीय वर्ष तक ढांचागत सुधार में हमें क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेंगे जिसकी तुलना हम आज एटीएम के बाहर लगने वाली भीड़ और परेशानी से नहीं कर सकते।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्राथमिकताओं में आतंकवाद पर क़ाबू पाना भी है। पाकिस्तान की सरकारी टकसाल में भारत के छपने वाले करीब दो लाख करोड़ के नक़ली नोट भी मिट्टी बन जाएंगे। इससे ना सिर्प़ भारत की आर्थिक कमर तोड़ने के पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फिरेगा, आतंकवादियों की फंडिंग कमज़ोर होगी, युवा आतंकवाद की तरफ़ आकर्षित नहीं होंगे, हथियारों के अवैध कारोबार पर रोकथाम लगेगी और पाकिस्तान के रवैये में भी तब्दीली आएगी। पाकिस्तान भारत की तरफ़ झुकेगा और आतंकवाद से लड़ाई में भारत को सहयोग करने पर मजबूर होगा। पाकिस्तान सीमा के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन के जिन मार्गों से पाकिस्तान में छपी भारत की नक़ली नक़दी को खपाने का कारोबार हो रहा था, वह पूरा सिस्टम समाप्त हो चुका है। कश्मीर को पाकिस्तान ने नक़ली करेंसी का अड्डा बना रखा था। नोटबंदी के बाद आम कश्मीरी भी मोदी के इस क़दम से ख़ुश है। वह जानता है कि नक़ली नक़दी से आतंकवाद पलता है और इसकी क़ीमत आख़िरकार एक आम कश्मीरी, एक आम भारतीय को चुकानी पड़ती है। आतंकवाद और नक़ली करेंसी के जिस पूरे सिस्टम को तोड़ने के लिए बेहद आसान और सौ फ़ीसदी कारगर क़दम नोटबंदी का हो सकता था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जैसे ही इस सिद्धांत को समझा, राजनीतिक नफ़े नुक़सान की चिंता किए बिना लागू कर दिया। एक महान् लेकिन विशाल देश की आर्थिक स्थिति को बदलने के लिए यह आवश्यक था कि ऐसा क्रांतिकारी क़दम उठाया जाए। नरेन्द्र मोदी ने वह साहस दिखाया जिसे भारत के आर्थिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

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लेखक राकेश सिंह एसोचैम उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष और इंस्टिच्यूट ऑफ़ कॉस्ट अकाउंटेंट संस्थान के पूर्व अध्यक्ष हैं।

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