सैय्यद ज़ैगम मुर्तज़ा

बहुत सारी बातें लिहाज़ मे होती हैं ख़ौफ या क़ानून से नहीं। ज़्यादती लिहाज़ ख़त्म कर देती है और जो ढकी छिपी बातें हैं वो सड़क पर आ जाती है। लिहाज़ और डर दोनों की ही एक निश्चित सीमा है। इस सीमा के पार ढिढाई और अड़ियलपन है। सहारनपुर में दलितों को पीटने और घर जलाने वालों की समझ में ये बात नहीं आई। अब गली गली बराबर की मार हो रही है। जो ठकुराई के लिहाज़ का पर्दा था वो राजपूतों ने ख़ुद जलाया और अब शर्म में बता भी नहीं सकते कि दलितों से भरपूर पिटे हैं।

इसी ढिढाई और अड़ियलपन का दूसरा नमूना केरल की घटना है। लगातार पिट रहे लोग अब प्रतिकार पर उतर आए हैं और सामाजिक तानाबाना ख़त्म हो गया है। गमछा गैंग के सत्ता में आने का ख़ौफ ख़त्म हो चुका है। कश्मीर से झारखंड और महाराष्ट्र से अरुणाचल तक ये बात लोगों ने मान ली है कि बीजेपी का लक्ष्य सिर्फ सत्ता में बने रहना है और इसके लिए वो किसी भी हद तक जाएगी।

पिटे हुए धार्मिक और जातीय समूहों ने मान लिया है कि बहुसंख्यक वर्ग की दिलचस्पी भी बस बीजेपी को बनाए रखने में है और बीजेपी की सत्ता में बने रहने में। इस से ज़्यादा कुछ नहीं। बीजेपी अब पांच साल शासन करे या सौ साल, लोगों पर इससे फर्क़ नहीं पड़ रहा। ख़ौफ अब ख़त्म हो रहा है और लोग नए निज़ाम के साथ जीना सीख रहे हैं। बल्कि अब उल्टा प्रतिकार बढ़ रहा है। लोगों को लगने लगा है बीजेपी को हटा नहीं सकते तो फिर सामाजिक समझौते ही क्यों मानें? सियासत समाज का विघटन कर रही है।

नफरत की जो दीवार है उसके पार कम झगड़े नहीं हैं। अफीम अवचेतन में ले जाती है मन के विचार नहीं बदलती। पिनक बढ़ते ही आप निशाने पर होते हैं और नशा उतरते ही पड़ोसी। बहरहाल भंगेड़ियों, चरसियों और अफीमचियों की भीड़ में रहने के नियम जान लीजिए। अकेले और वक़्त-बेवक़्त घर से मत निकलिए। भीड़ से लड़ने और बचकर निकलने के तरीक़े जितने जल्द हो सीख लीजिए।

लोगों को यक़ीन दिलाया जा रहा है कि आप बीजेपी को हटा नहीं सकते। इधर प्रतिकार करने वाले बज़िद हैं कि जब राजनितिक यथास्थिति क़ायम ही रहने वाली है तो फिर क्यों समझौते और सामाजिक लिहाज़ में दबाव सहें? आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ेंगे। आख़िर स्प्रिंग दबाव सहने की अंतिम सीमा तक पहुंच गए है। अब हिम्मत है तो दबाकर रखिए वरना चोट खाने को तैयार रहिए। नंगपन सड़क पर आना तय है और सहारनपुर इसकी शुरुआत है।

पड़ोसी की हवा में बहकर संसाधन ना निगल ले 

राष्ट्र सिर्फ धरती का टुकड़ा नहीं है। नागरिक के बिना राष्ट्र की अवधारणा बेमानी है। एक भौगोलिक सीमा के भीतर समस्त संसाधन, संस्था और उनके संप्रभु उपभोगकर्ता राष्ट्र को पूर्णता प्रदान करते हैं। आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए राष्ट्र पुलिस और सेना रखते हैं। सेना की ज़िम्मेदारी बाहरी ख़तरों से राष्ट्रीय सीमा ही नहीं संसाधन, संस्थानों और नागरिकों की भी रक्षा करना है। बदले में राष्ट्र के नागरिक अपनी निजी आय और संसाधनों में अपने हिस्से में से सेना और सैनिकों के परिवार का ख़र्च उठाते हैं। ये बराबरी का नियम है जिसमें दोनों पक्षों के हित निहित हैं और किसी का किसी पर अहसान नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो सरकार किसी भी भौगोलिक सीमा में रहने वाले नागरिकों की मैनेजर है और सुरक्षा एजेंसियां उनकी संपत्ति, हित, संप्रभुता, संसाधन और जान की चौकीदार। परेशानी तब आती है जब मैनेजर ख़ुद को मालिक और चौकीदार ख़ुद को चौधरी समझने लगे। पड़ोसी देश में मैनेजर और चौकीदार इस बीमारी से बुरी तरह ग्रसित हैं और हवा के साथ उनके घर का संक्रमण हमारी सीमा में भी धीरे धीरे दाख़िल हो रहा है। अगर समय रहते नहीं चेते तो वो दिन दूर नहीं जब मैनेजर और चौकीदार हमारी संप्रभुता, संसाधन और आज़ादी निगल जाएंगे।

भंगेड़ियों, चरसियों और अफीमचियों की भीड़ में रहने के नियम जान लीजिए

यूपी के 1/2+1/4+1/4 मुख्यमंत्रियों के जातीय समूह न सिर्फ शासन बल्कि जनता के लिए भी सिरदर्द बन गए हैं। 1/2 मुख्यमंत्री के राजपूतों का स्वाभिमान बात-बात पर आहत हो रहा है। 1/4 मुख्यमंत्री वाले नाॅन जाटव दलित समूह में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ मची है। पासी, कोरी मौर्य की दरोग़ाई सहने को तैयेर नहीं। दूसरे 1/4 मुख्यमंत्री वाले ब्राह्मण इन सबके बीच एडजस्ट नहीं पा रहे। कुछ अदृश्य मुख्यमंत्री हैं जिनके गैंग भी सत्ता की चरस में हिस्सेदारी न मिलती देख छीना झपटी पर उतर आए हैं।

पटेल, केवट, निषाद, सैनी, कुर्मी, लोधे, जाट और गुर्जरों को लग रहा है कि वो ठगी का शिकार बन गए हैं। जिसे आप लोग लाॅ एंड ऑर्डर की समस्या समझ रहे हैं वो दरअसल सत्ता का अंदरूनी संघर्ष है जहां हर कोई ज़्यादा से ज़्यादा जगह घेर लेना चाहता है। इसे लेकर गमछा गैंग में अघोषित अंडरस्टैंडिंग काफी पहले से है सो कोई किसी को रोक नहीं रहा है। धर्म की अफीम चटाकर अलग-अलग झुंडों को एक जगह इकट्ठा तो कर लिया गया लेकिन चुनाव जीतते ही लूट के माल में बंटवारे को लेकर संघर्ष शुरू हो गया है।

नफरत की जो दीवार है उसके पार कम झगड़े नहीं हैं। अफीम अवचेतन में ले जाती है मन के विचार नहीं बदलती। पिनक बढ़ते ही आप निशाने पर होते हैं और नशा उतरते ही पड़ोसी। बहरहाल भंगेड़ियों, चरसियों और अफीमचियों की भीड़ में रहने के नियम जान लीजिए। अकेले और वक़्त-बेवक़्त घर से मत निकलिए। भीड़ से लड़ने और बचकर निकलने के तरीक़े जितने जल्द हो सीख लीजिए। मुल्क में कई साल से नशे की खेती हो रही और फसल लगातार बंपर हुई है। आम आदमी और कमज़ोर तबकों का संघर्ष अभी लंबा चलने वाला है।

लेखक राज्यसभा टीवी में रिपोर्टर/प्रोडूसर है 

नोट – उपरोक्त लेखक के निजी विचार है कोहराम न्यूज़ लेखक द्वारा कही किसी भी बात की ज़िम्मेदारी नही लेता 


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