जातक कथा है, ‘बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, ललचाना मत, पकड़े जाओगे…!’ बहेलिया जंगल से एक तोते को पकड़कर कस्बे में बेचने जा रहा था. रास्ते में एक साधु ने तोते को तड़पता देखा तो बहेलिये से बोले, ‘भाई, कुछ दिनों से मैं एक तोता पालने की सोच रहा हूँ. क्यों नहीं तुम मुझे ये तोता बेच देते?’ बहेलिया ने दाम लिया और तोता, साधु के आश्रम में पहुँच गया. साधु ने सोचा कि यदि वो तोते को शिक्षित कर देंगे तो जंगल के पक्षियों को जागरूक किया जा सकता है. उन्होंने तोते को रटाना शुरू किया, ‘बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, ललचाना मत, पकड़े जाओगे…!’ कुछ ही दिनों में तोते ने सबक़ रट लिया. तब साधु ने उसे आज़ाद कर दिया.

जंगल में लौटकर तोते ने सभी पक्षियों को रटा दिया, ‘बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, ललचाना मत, पकड़े जाओगे…!’ जब बहेलिये को जंगल में हर तरफ से यह बात सुनायी दी तो वो बहुत मायूस हुआ. लगा, अब रोज़ी-रोटी कैसे चलेगी? फिर सोचा, एक कोशिश करके देखता हूँ. जाल बिछाया. दाना डाला. इन्तज़ार करने लगा. थोड़ी ही देर में पक्षियों का एक झुंड यही कलरव करता उधर आया कि ‘बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, ललचाना मत, पकड़े जाओगे…!’ सारे पंछी दानों पर टूट पड़े. बहेलिया की तो खुशी का ठिकाना न था! उसे कहीं ज़्यादा परिन्दे मिल गये और वो भी काफ़ी कम वक़्त में. ताज्जुब की बात ये भी थी कि जाल में फँसे पक्षी अब भी रट रहे थे, ‘बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, ललचाना मत, पकड़े जाओगे…!’

पता नहीं क्यों, हिन्दुस्तानी समाज इस कहानी का सबक़ कभी नहीं सीख पाया कि तोते की तरह रटना विद्या को हासिल करना नहीं है. ज्ञान को आत्मसात करने से ही बुद्धि आती है. हमारी धार्मिक आबादी की हिस्सेदारी सामने आ चुकी है. सियासी प्रयोगशालाओं को नया हथकंडा मिल गया है. मीडिया भी खूब भाँड-बाज़ी करेगा. लेकिन सच्चाई को निरपेक्ष भाव से शायद ही कोई समझाए. तरह-तरह के रट्टू तोताओं से आपका वास्ता पड़ेगा. कट्टरपन्थी हिन्दू आपको बताएँगे कि कैसे आपकी नस्लों पर ख़तरा गहरा गया है? साक्षी महाराज जैसे लोग आपको उकसाएँगे, ‘अब भी चेत जाओ. जमकर आबादी बढ़ाओ. वर्ना एक दिन ये मुसलमान तुम्हें खा जाएँगे! आत्मरक्षा करनी है तो सामूहिक रूप ज़िम्मेदारी लो. परिवार नियोजन से तौबा करो. खूब बच्चे पैदा करो. देखो, मुसलमान कैसे कई-कई शादियाँ करके दर्जनों बच्चे पैदा कर रहे हैं. उनका इरादा हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बनाने का है. अब भी समझ जाओ.’

एक ही वक़्त पर हर जगह गणेश जी को दूध पिलाने का वैश्विक चमत्कार करके वाले सक्रिय भी हो चुके हैं. अगर आपके कानों तक हिन्दुओं पर गहराते संकट का सनसनीखेज़ विश्लेषण अभी तक नहीं पहुँचा है तो ज़रा अपनी शोहबत पर ग़ौर करें. कहीं ऐसा तो नहीं कि आप सिर्फ़ प्रगतिशील लोगों से घिरे रहते हों. मुख्यधारा से कट गये हों. यदि ऐसा है तो आप अपने बारे में अफ़सोस कर सकते हैं. उधर, कट्टरपन्थी मुसलमानों को भी घुट्टी पिलायी जा रही होगी, ‘जीयो मेरे शेरे, तुमने तो कमाल करके दिखा दिया. देखो-देखो, हिन्दुओं की छाती पर साँप लोट रहा है. किसी बात की चिन्ता मत करना. हम हैं ना. रही बात ग़ुरबत की तो वो अल्लाह-ताला की मर्ज़ी है. इंशाल्लाह! बहुत जल्द तुम खुशियों और ऐशोआराम के समन्दर में तैर रहे होंगे.’ कट्टरपन्थी हिन्दुओं ने तो तय भी कर लिया होगा कि अब से हरेक मुसलमान को ‘बांग्लादेशी’ बोलते हैं. ‘पाकिस्तानी’ तो पहले भी खूब बोल चुके हैं. अगर वो भड़का तो बोल देंगे, भाई मज़ाक कर रहा था. छोड़ो, जाने दो. नहीं भड़का तो औरों के आगे शेखी बघारेंगे कि कैसे उसे मुँह पर ‘बांग्लादेशी’ बोलकर दिखाया. जो भी हो, बड़ा मज़ा आएगा!

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उधर, सियासी प्रयोगशालाओं में लोगों की प्रतिक्रियाओं की समीक्षा होगी. कोई बोलेगा, मोदी जी की सरकार ने धार्मिक आबादी के आँकड़े जारी करके बहुत अच्छा किया. देश को उसकी तस्वीर दिखा दी. पारदर्शिता की मिसाल पेश की. ज़िन्दगी भर वोट-बैंक की राजनीति करने वाले काँग्रेसियों ने जानबूझ इस सच्चाई को दबा रखा था. अब तो हिन्दुओं की समझ में आना चाहिए कि उनका जात-पात से ऊपर उठकर भगवा झंडे के नीचे आना क्यों ज़रूरी है? देश को बचाना है तो उस पार्टी के साथ चलना चाहिए जिसके लिए हिन्दू हितों से बढ़कर और कुछ नहीं है. जो हिन्दू राष्ट्र की बात करते हैं, वही राष्ट्रवाद को समझते हैं. लिहाज़ा, हे भारतवासियों और ख़ासकर हे बिहार के हिन्दुओं, कुछ तो अपनी क़ौम का क़र्ज़ चुकाओ. मारे शर्म के ही सही, अब तो भगवा छतरी के नीचे आ जाओ. जात-पात में बहुत बँट लिये. अबकी बार धर्म के नाम पर एक होकर दिखाओ. जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा.

मुसलमानों में जैसे ही ये ध्रुवीकरण होने लगेगा कि बीजेपी को तो वोट नहीं ही देंगे, चाहे जो हो जाए. वैसे ही बीजेपी की हाँडी में चढ़ी खिचड़ी पककर तैयार हो जाएगी. मुसलमानों की ‘एकता’ का हवाला दिया जाएगा. छद्म धर्मनिरपेक्षता और वोट बैंक की राजनीति का बखान गाँव-गाँव में फैलाया जाएगा. इससे ऐसी चुनावी फसल तैयार होगी जैसा हमने 2014 के लोकसभा चुनाव में ख़ासतौर उत्तर प्रदेश में देखा था. 80 में से 5 सीटें मुलायम सिंह यादव के परिवार को मिलीं और 2 सोनिया-राहुल की माँ-बेटा जोड़ी के हत्थे चढ़ीं. बाक़ी 73 पर पूरी शान से भगवा लहराया. जात-पात, अपराधी-शरीफ़, स्थानीय मुद्दे, प्रादेशिक और राष्ट्रीय मुद्दे – सब कुछ हवा हो लिये. बचा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दू का नारा. हिन्दू की तलवार वैसे ही चमक उठी जैसे 1947 में पाकिस्तान में रहने वाले तक़रीबन हर हिन्दू-सिख पर ये भूत सवार था कि सब कुछ छोड़ चलो हिन्दुस्तान! माहौल को गरमाने के लिए दोनों ओर खूब कत्लेआम हुआ. किस धर्म के लोग कम मारे गये और किसके ज़्यादा? इस आँकड़े से क्या फ़र्क़ पड़ा. इंसानियत का ख़ून होना था. वो जमकर हुआ. एतिहासिक हुआ.

उत्तर प्रदेश से आये एतिहासिक चुनाव नतीजो को जो पड़ोसी राज्य बिहार में दोहराने की नहीं सोचेगा कि उसे मूर्ख ही समझा जाएगा. बीजेपी मूर्खों की जमात नहीं है. वहाँ एक से एक दूरदर्शी बैठे हैं. वो बटेर को बाज़ बनाने में माहिर हैं. बहुत दिनों से बटेर की तलाश थी. मिल नहीं रहा था. तभी एक सिद्ध पुरुष ने बताया, ‘पिछले साल से जनगणना विभाग में धार्मिक आबादी का आँकड़ा पड़ा-पड़ा सड़ रहा है. उस साँप को पिटारे से निकालिए. साँप को देखते ही बटेर भाग खड़ी होगी. बटेर के भागते ही हम उसकी जगह बाज़ को बिठा देंगे, जो जल्द ही पूरे जंगल के उन जानवरों की बोटी-बोटी नोचकर खा डालेगा जिन्हें बड़े शिकारी जानवरों ने जूठन के रूप में पूरे जंगल में बिखेर रखा है. बिहार का जंगल इस सफ़ाईकर्मी (बाज़) से साफ़-सुथरा हो जाएगा, तो फिर उसे (बाज़ को) अगले चुनाव वाले जंगल (राज्य) में भेज देंगे.’

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ये सब कुछ कितना सीधा-सपाट लग रहा है ना? बिल्कुल दो और दो चार की तरह. इसे जोड़ें या गुणा करें, बात एक ही है. इसीलिए धार्मिक आबादी के आँकड़ों से जुड़े उस ब्यौरे को सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया, जिससे ये समझ में आता कि किस आय-वर्ग के लोगों की आबादी में कितना इज़ाफ़ा हुआ है? सारे आँकड़ों का पेंच इसी बात में छिपा है. क्योंकि इसके ज़ाहिर होते ही ये समझना मुश्किल नहीं होता कि आबादी की वृद्धि-दर का सीधा सम्बन्ध परिवार की आर्थिक स्थिति से होता है. ग़रीबों की सन्तानें ज़्यादा होती हैं. ग़रीब हिन्दू है या मुसलमान, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता. उल्टा, ये और आसानी से कहा जा सकता है कि अगर मुसलमानों की आबादी की वृद्धि-दर ज़्यादा है तो साफ़ है कि वहाँ ग़रीब भी ज़्यादा हैं और ग़रीबी भी. ये अर्थशास्त्र के सैकड़ों साल पुराने सिद्धान्तों से स्थापित हो चुका है. सारी दुनिया इसे जानती है.

लिहाज़ा, चिन्ता करना है तो हिन्दू या मुसलमान की नहीं, ग़रीबी की कीजिए. ग़रीब की सन्तानें ही उसके बुढ़ापे की लाठी होती हैं. उसे बँधी-बँधाई पेंशन और रियायती स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिलतीं. वो ढलती उम्र में कैसे जीएगा? सामाजिक सुरक्षा की सारी बातें समाज के सम्पन्न वर्गों की मुट्ठी में रहती हैं. ग़रीब की बिटिया ब्याह होने से पहले माँ का जितना हाथ बँटाती है, परिवार की आमदनी में जितना योगदान देती है, उसकी तुलना खाते-पीते लोगों की सन्तानों से की ही नहीं जा सकती. इसी तरह, ग़रीब का बेटा भी माँ-बाप के पारिवारिक बोझ को कम उम्र से ही बाँटने लगता है. उसकी शादी जल्दी हो जाती है. इससे घर में बहू के रूप में कमाने वाला एक हाथ भी जल्दी ही बढ़ जाता है. यही सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहता है. बशर्ते, बदलते दौर के साथ कोई ग़रीबी के दलदल से निकलकर मध्यम वर्ग में न जा पहुँचे. दिलचस्प बात ये भी है कि सरकार में बैठा हर क़ाबिल अफ़सर और उसके सियासी आक़ा इन तमाम बातों को बहुत अच्छी तरह जानते हैं.

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ऐसा सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण ही तो अफ़सरों और नेताओं को इस लायक बनाता है कि वो शासक बनकर मलाई काटते रहें. ग़रीब के लिए दाल ज्यों-ज्यों महँगी होती है, वो उसमें पानी बढ़ाता जाता है. मध्यम वर्ग प्याज़ के महँगा होने पर उसकी ख़पत घटाने की सोचता है. ग़रीब अगर थोड़ा जागरूक हो जाए तो अपनी सन्तान को सरकारी स्कूलों में पढ़ने भेजता है और ख़ुद पर गर्व करता है. मध्यम वर्ग अपनी सन्तानों को बढ़िया और महँगे स्कूलों में पढ़ाने के लिए बेताब रहता है. बच्चों को पढ़ाने-लिखाने पर होने वाला खर्च उसके लिए किसी विलासिता से कम नहीं होता. इसकी चर्चाओं में उसकी ज़िन्दगी का बहुत वक़्त गुज़रता है. वो एक-दूसरे को समझाता है कि एक बच्चा पालना ही कैसे भारी हो गया है? दो सन्तानों वाले, उनको क़िस्मतवाला बताते हैं, जिनकी एक ही औलाद है. ऐसा तबक़ा क्या ख़ाक़ बच्चे पैदा करेगा? यही वो तबक़ा है तो हाल-फ़िलहाल में ग़रीबी रेखा से ऊपर उठा है. इसे ही बच्चों की अच्छी शिक्षा के अलावा घर, वाहन, टीवी, फ़्रिज वग़ैरह चाहिए.

याद रखिए, इस संघर्षशील मध्यम वर्ग में सभी धर्मों के लोग हैं. देश में इनकी बहुत बड़ी आबादी है. इसी तबक़े की आबादी की वृद्धि-दर में स्थिरता या कमी आयी है. इसकी सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किस क़ौम की आबादी कितनी रफ़्तार से बढ़ रही है और अब कितनी हो गयी? ये कल्पना भी उन्हें डरा नहीं सकती कि आबादी बढ़ने की मौजूदा रफ़्तार यदि क़ायम रही हिन्दू-मुसलमान की आबादी को बराबर होने में 270 साल लगेंगे. यानी ये डरावना चमत्कार भी सन् 2285 ईसवी में ही हो पाएगा. तब भारत की आबादी 13 हज़ार करोड़ होगी, यानी आज की सौ गुना. क्या ये मुमकिन है? इसीलिए, आँकड़ों को ख़ौफ़नाक मत समझिए.

लेखक – मुकेश कुमार

साभार – AVPNEWS

Reality on muslim population increase, election in Bihar is coming and this may be a propaganda of communal parties.  Writer mukesh Kumar revealing why Muslim population increased.


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