कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती का विरोध करने वालों को शायद भारत का , खास कर दक्षिण भारत का इतिहास ही नहीं मालूम . वरना वे टीपू सुल्तान को खिराजे-अकीदत पेश करते और निज़ाम और मराठों के उस वक़्त के पेशवा को देशद्रोही के लक़ब से याद करते जिन्होंने अँगरेजों का साथ दे कर इस मुल्क के पांवों में गुलामी की जंजीरें डाल दीं थीं.

Biography
टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली के शासनकाल के आखिरी दिनों में मैसूर की रियासत एक बहुत बड़ी सल्तनत बन चुकी थी .इसके साथ ही वे सारी ताकतें जो दक्षिणी भारत में इनकी रियासत के कयाम को अपने लिए ख़तरा समझती थीं , इनके खिलाफ तैयार होने लगी थीं. इनमे से एक मीर निज़ाम था जो पुरे भारत की आज़ादी के मसले को अपनी ज़लील सौदेबाज़ियों का मसला समझता था और कौम का नेतृत्व अपने हाथ में रखने के लिए हर तरह की सौदेबाज़ी को तैयार था , वही दूसरी तरफ मराठे थे जो मुग़ल सल्तनत के खण्डहरों पर अपनी हुकुमत की ईमारत खड़ी करने के ख्वाब देख रहे थे

एक व्यापारी के रूप में इस देश में आने वाले अँगरेज़ एक एक करके पुरे भारत पर क़ब्ज़ा जमाते जा रहे थे और कोलकाता से लेकर लखनऊ तक अपनी विजय के झंडे गाड चुके थे , मगर मैसूर में टीपू सुल्तान की तलवार के सामने आते ही यह तूफ़ान रुक जाता है और लगभग 16 बरस तक ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी जगह से आगे बढ़ कर दिल्ली कूच करने का सपना पूरी नहीं कर पाती .मैसूर की जंगी ताक़त का अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मैसूर को हराने के बाद जब मराठों की बारी आई तो सिंधिया , भोंसले और होलकर जिनकी सेनाओं की तादाद मैसूर से कहीं अधिक थी , कुछ महीनों से ज्यादा अंग्रेजों के सामने नहीं टिक पाए और उनके सामने ढेर हो गए .

टीपू सुलतान पहनते थे ‘राम’ की अंगूठी
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जो लोग टीपू सुल्तान पर हिन्दू-विरोधी होने का बकवास आरोप लगाते हैं , उनको इतिहास का यह तथ्य ही मालूम नहीं कि मैसूर की अधिकांश प्रजा हिन्दू थी जिनका अतीत अशिक्षा , पिछड़ेपन , जहालत और गरीबी तक सीमित था .हिन्दू समाज में इन पिछड़े लोगों को राजपूतों या मराठों जैसी बहादुर कौमों की तरह तलवार चलाने का अधिकार नहीं था जो अपने पूर्वजों के किसी कारनामे पर गर्व करते . इन्ही लोगों को मुसलमानों के साथ खडा कर के टीपू सुल्तान ने कई कई वर्षों तक अंग्रेजों , मराठों और निज़ाम का मुकाबला किया , यह किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होता

………….अगर देशभक्त कहे जाने वाले लोग अंग्रेजों का साथ न देते और देश से गद्दारी का प्रदर्शन न करते तो भारत का इतिहास कुछ और होता .अगर इस तारीख में मीर सादिक , कमरुद्दीन , पुरनिया , मीर निज़ाम अली और मीर आलम जैसे गद्दार पैदा न होते तो भारत का किला कई सालों तक महफूज़ रहता .यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अंग्रेजों के इशारों पर होलकर , मराठे और निज़ाम ने टीपू सुल्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ा था और अंग्रेजों को हर संभव मदद पहुंचाई थी .नाना फडनविस और निज़ाम की नकेल अंग्रेजों के हाथों में थी जो सिर्फ टीपू सुल्तान को हराने के लिए देश की इज्ज़त और आज़ादी का सौदा अंग्रेजों के हाथ कर चुके थे . यहं तक कि ढोंडीया वाग ने कहा था कि मैं मराठों और निज़ाम को कभी माफ़ नहीं करूँगा जो इन चोरों और लुटेरों ( अंग्रेजों ) को हमारे घरों के दरवाज़े तक ले आये हैं . जो कौम गद्दारों को अपनी गोद में पनाह देती है उसके मज़बूत किले भी रेत के घरौंदों की तरह ढह जाते हैं .कौमों की इज्ज़त और आज़ादी को जितना नुकसान दुश्मन नहीं पहुंचाते उससे ज्यादा अंदरूनी गद्दार पहुंचाते हैं.

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के वक़्त दुनिया में इसाइयत का साम्राज्य था . जब इस्लाम अपने सच्चे अकीदे और ईमान के साथ दुनिया में आया तो इसाइयत से इसका टकराव अवश्यम्भावी था . इस्लाम ने इसाइयत को तलवार के हर मैदान में शिकस्त दी. जहाँ जहाँ इस्लाम की सैन्य-विजय हुई , वहां के इसाई बाशिंदों ने इस्लाम के सन्देश और मुसलमानों के अख़लाक़ , चरित्र, मसावात आदि गुणों को देख कर अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम कुबूल किया.

यह देख कर इसाई लेखकों और इतिहासकारों ने अपनी अपनी कलम उठा ली और लगभग सारे मुस्लिम शासकों को धर्मान्धता और कट्टरता से जोड़ कर इतिहास में जी भर कर बदनाम किया .इसाई इतिहासकारों के इस षड्यंत्र का शिकार बादशाह औरंगजेब हुए और शेरे-मैसूर टीपू सुल्तान को इसी षड्यंत्र का शिकार बना कर उस जंगे -आज़ादी के अज़ीम सिपाही को खलनायक बना दिया गया .
टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों से अपने देश की आज़ादी की हिफाज़त के लिए खुनी लड़ाइयाँ लड़ीं. ऐसे में अँगरेज़ इतिहासकार अगर टीपू के खिलाफ ज़हर उगलते हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है .अपने इन युद्धों में कई ऐसी रातें आईं जब टीपू सुल्तान ने घोड़े की जीन पर बैठे -बैठे रातें गुजारीं.इन जंगों में मैसूर के कितने जांबाजों का खून बहा,कितने शहर थे जो वीरान हो गए, कितनी बस्तियां थीं जो राख के ढेर में तब्दील हो गयीं और मैसूर के मुजाहिदीन की हिम्मत , बहादुरी और बलिदान की कितनी दास्तानें थीं जिन्हें इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिली क्यूकी इतिहास लिखने वाले लोग टीपू के दुश्मन थे . इसलिए प्रख्यात अभिनेता गिरीश कर्नाड ने कहा है कि यदि टीपू हिन्दू होता तो उनको शिवाजी जैसा सम्मान प्राप्त होता और इतिहास में उन्हें ” शिवाजी द्वितीय ” के सम्मानजनक ख़िताब से नवाज़ा जाता ///
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क्या यह अन्याय नहीं है कि औरंगजेब के खिलाफ लड़ने वाले शिवाजी महाराज को तो हम राष्ट्रनायक का दर्ज़ा देते हैं , मगर हमारे देश के सबसे बड़े दुश्मनों याने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले और उनकी ईंट से ईंट बजाने वाले टीपू सुल्तान को धर्मांध , असहिष्णु और क्रूर कह कर देश के प्रति उनके बलिदानों को फरामोश कर रहे और उनकी जयंती मनाने का विरोध कर रहे है . जो लोग ऐसा कर रहे हैं , वे लोग सही इतिहास से अनजान हैं , ऐसा करने वाले न सिर्फ टीपू सुल्तान के बल्कि देश के गुनाहगार हैं और ऐसा कर के वे टीपू सुल्तान का नहीं बल्कि इस देश की मिटटी का अपमान कर रहे हैं जिसके कण-कण की हिफाज़त के लिए टीपू सुल्तान ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी .///

( मोहम्मद आरिफ दगिया )


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