अखिलेश राज: अपराधियों को संरक्षण और जेल में बंद मुस्लिम युवाओं पर चुप्पी

  • कुंडा के राजा भैया उर्फ रघुराज प्रताप सिंह, गोंडा के पंडित सिंह उर्फ विनोद कुमार सिंह, अमरोहा के महबूब अली और शाहजहांपुर के विधायक राजेश यादव को सरकार का संरक्षण प्राप्त है.
  • उत्तर प्रदेश विधानसभा में खूंखार अपराधियों की उपस्थिति विधायिका के लिये शुभ संकेत नहीं है. मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, अभय सिंह, विजय मिश्रा, अजय राय और सुशील सिंह जैसे बाहुबली परोक्ष तौर पर सरकार के नजदीक हैं.

ऐसा मानने के कई कारण हैं कि समाजवादी पार्टी और युवा अखिलेश यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की गद्दी पर सत्तासीन उनकी सरकार अपराधियों के लिये एक सुरक्षित पनाहगाह बनती जा रही है.

सरकार अपनी तरफ से अपने कुछ विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ दर्ज विभिन्न आपराधिक मामलों को वापस लेने जा रही है ताकि वे नेता आने वाले चुनावों में वह एक ‘साफ’ छवि के साथ मतदाताओं के बीच जा सकें.

एक तरफ आगामी विधानसभा चुनावों से पहले अपने विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को निबटाने की जल्दबाजी अखिलेश सरकार में दिख रही है, वहीं दूसरी तरफ आतंकवाद के झूठे मामलों में जेलों में बंद मुसलमानों के पुनर्वास का मामला उसकी प्राथमिकता सूची में कहीं नहीं दिखता, जबकि यह उनके चुनावी घोषणापत्र का प्रमुख बिंदु था.

आतंकवाद के ऐसे ही झूठे मामलों में फंसे 14 मुस्लिम युवा हाल ही में लखनऊ जेल से बाहर निकले हैं

आतंकवाद के ऐसे ही झूठे मामलों में फंसे 14 मुस्लिम युवा हाल ही में लखनऊ जेल से बाहर निकले हैं. राज्य के अन्य जिलों में भी ऐसे तमाम युवा हैं. समाजवादी पार्टी ने ऐसे व्यक्तियों के पुनर्वास का वायदा किया था लेकिन अब ऐसा लगता है कि उसने अपना इरादा बदल लिया है. सरकार की इसी उदासीनता का विरोध करते हुए, ऐसे लोगों की लड़़ाई लड़ रहे एक संगठन रिहाई मंच ने बुधवार को लखनऊ में एक पदयात्रा निकाली.

जाहिर तौर पर सरकार की प्राथमिकता अपराध जगत से राजनीति में आने वालों के हितों की रक्षा करना है. प्रतापगढ़ के कुंडा से आने वाले राजा भैया उर्फ रघुराज प्रताप सिंह, गोंडा के पंडित सिंह उर्फ विनोद कुमार सिंह, अमरोहा के महबूब अली और शाहजहांपुर के विधायक राजेश यादव सरकार के इस अपराध-प्रेमी रवैये का फायदा उठाने वाले कुछ चुनिंदा नामों में से एक हैं.

राज्य के अभियोजन निदेशालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार सांसदों, विधायकों और मंत्रियों से संबंधित 65 मामलों का निस्तारण या तो अदालत के द्वारा किया गया है या फिर सरकार के द्वारा मामलों को वापस ले लिया गया है. ऐसे कई मामलों में शिकायतकर्ता द्वारा ‘‘समझौता’’ कर लेने की भी कई घटनाएं बीते दिनों में घटी हैं.

मिर्जापुर से विधायक कैलाश चैरसिया को आपराधिक धमकी देने और जानबूझकर चोट पहुंचाने के मामले में 3 वर्ष की जेल और 9000 रुपये के जुर्माने की सजा मिली थी लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा बरी कर दिये जाने के बाद वह खुला घूम रहे हैं.

मिर्जापुर से सपा विधायक कैलाश चैरसिया आपराधिक छवि के नेता माने जाते हैं

राजा भैया के मामले में भी सरकार ने साल 2006 और 2011 से लंबित गैंगस्टर एक्ट और सात क्रिमिनल लाॅ एमेंडमेंट एक्ट के दो मामलों को वापस ले लिया है. इन धाराओं के तहत किये गए अपराधों के लिये आम आदमी को कई वर्षों तक सलाखों के पीछे रहना पड़ता.

अखिलेश सरकार के कैबिनेट मंत्री पंडित सिंह उर्फ विनोद सिंह गोंडा के मुख्य चिकित्साधिकारी पर हमला करने और अपहरण करने को लेकर सुर्खियों में आए. बीते वर्ष वे एक बार फिर सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने गोंडा के ही रहने वाले एक युवा को चुन-चुनकर भद्दी गालियां दीं.

हालांकि बाद में उन्होंने अपने खिलाफ लगे इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताकर अपना बचाव किया. उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 279 (लापरवाही से गाड़ी चलाने) और धारा 304-ए (लापरवाही से किसी की जान लेने) के मामले दर्ज थे. हालांकि अब इन मामलों को वापस ले लिया गया है.

महबूब अली के मामले में भी आईपीसी की विभिन्न धाराओं में दर्ज 8 मुकदमों को वापस ले लिया गया है जिनमें धारा 352 (हमला करना), धारा 447 (आपराधिक नीयत से घुसना), धारा 506 (अपराधिक नीयत) और धारा 504 (जानते-बूझते अपमान करने) जैसे गंभीर मामले थे.

हालांकि अंबेडकरनगर के बाहुबली सपा नेता अज़ीमुलहक़ पहलवान, रायबरेली के अखिलेश सिंह और चित्रकूट के वीर सिंह ने अपने ही स्तर पर शिकायतकर्ताओं के साथ अदालत के बाहर अपने खिलाफ चल रहे मामलों में ‘समझौता’ कर सरकार को मुकदमें वापस लेने की परेशानी से बचा लिया. हक और उनके साथियों के खिलाफ हत्या के एक मामले के गवाह की हत्या का मामला चल रहा था.

ऐसे मुकदमों में भी ‘समझौते’ की स्थिति पर पहुंचना वास्तव में बेहद आश्चर्यजनक है.वीर सिंह अपने समय के कुख्यात दस्यु सरगना ददुआ के सगे भाई हैं.

मौत से पहले ददुआ पर सपा के कई बड़े नेताओं के संरक्षण देने का आरोप लगता रहा है

मौत से पहले ददुआ पर समाजवादी पार्टी के कई बड़े नेताओं के संरक्षण मिलने के आरोप लगते रहे हैं. उसके खिलाफ हत्या, अपहरण और जबरन वसूली के कई मामले दर्ज थे.अखिलेश सिंह बीते कई वर्षों से रायबरेली के सबसे कुख्यात डाॅन हैं और वे लंबे समय से कानून के शिकंजे से बचने रहने में कामयाब होते आए हैं. उनके मामले में भी समझौते को आश्चर्य की नजरों से नहीं देखा जाना चाहिये.

मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, अभय सिंह, विजय मिश्रा, अजय राय और सुशील सिंह जैसे माफिया सरगना बेहद गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे हुए हैं और इनके खिलाफ चल रहे मामलों में गवाहों का अपने बयानों से मुकर जाना कोई बड़ी बात नहीं है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा में खूंखार अपराधियों की उपस्थिति विधायिका के लिये शुभ संकेत नहीं है. मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी खूनी प्रतिद्वंद्विता के लिये जाने जाते हैं. क्या वे सदन का इस्तेमाल अपना हिसाब बराबर करने के लिये करेंगे? यह एक बेहद डरावनी स्थिति होगी. लेकिन समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार के लिये नहीं क्योंकि शायद उनका मानना है कि जितना अधिक उतना बेहतर.

विधानसभा में विपक्ष के नेता बहुजन समाज पार्टी के स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा से ही गुंडों, माफियाओं और दूसरे अपराधियों को प्रोत्साहित किया है लेकिन उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को वापस लेना बिल्कुल ही असंवैधानिक है. – अतुल चंद्रा (वरिष्ठ पत्रकार)


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