कुछ बात है की हस्ती,मिटती नहीं हमारी.
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे जहाँ हमारा..

औरंगज़ेब रोड का नाम बदल कर एपीजे अब्दुल कलाम कर देने से औरंगज़ेब के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. जिस औरंगज़ेब को आरएसएस के इतिहासकार हिन्दू विरोधी कहते हैं वे यह नहीं बताते की औरंगज़ेब ने बनारस और इलाहाबाद में हिन्दू मंदिरों को ज़मीन और धन दिया. कहा ये जाता है की जाजिया कर जो की आम हिन्दुओं पर लगाया जाता था,औरंगज़ेब ने उसे ब्राह्मणों और मौलवियों पर लगाना शुरू कर दिया जिसके बाद उसके खिलाफ अनेकों कहानियां प्रचारित की गई. उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर को खजाने से रोज़ाना चार सेर घी मिलता था जिससे वहां ज्योति जलती थी. गुवाहाटी के उमानंद मंदिर के पुजारी को ज़मीन का टुकड़ा और कुछ जंगल की जागीर दी गई ताकि धार्मिक काम में कोई रुकावट न आये.

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भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार प्रोफ़ेसर बी एन पाण्डेय अपनी किताब ‘इतिहास के साथ यह अन्याय’ में लिखते हैं, ‘जब मैं इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।’

हाँ ये सच है औरंगज़ेब ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर के साथ ही साथ गोलकुंडा की जामा मस्जिद को गिराने का आदेश दिया था. बनारस वाली घटना के पीछे का कारण डॉ पट्टाभि सीता रमैय्या ने अपनी किताब ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ में बताया है कि औरंगज़ेब का काफिला बनारस में आ कर रुका और काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं की रानियाँ गंगा नहाने गई. लेकिन उनमे से एक रानी वापस नहीं आई तो खोजबीन शुरू हुई. मालूम चला कि उसे मंदिर में कहीं छुपाया गया है. बहुत खोजने पर नहीं मिली तो गणेश जी की मूर्ति के पीछे से जाने वाली सीढ़ी से तहखाने में पहुंचा गया. वहां रानी बेसुध पड़ी थी. उसकी इज्जत लूट ली गई थी. दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक में मंदिरों पर हमलें धार्मिक नफरत से कम ,वहां मौजूद सोने चांदी को लूटने के लिए अधिक हुए लेकिन जिस औरंगजेब की सादगी का बखान खुद भारतीय इतिहासकार करते हुए नहीं थकते वह भला लूटने की नियत से कैसे कहीं हमला कर सकता है.

औरंगज़ेब ने तो अहमदाबाद के एक व्यापारी के उस क़र्ज़ को अदा किया जो की उसके भाई ने ,खुद औरंगज़ेब के खिलाफ लड़ने के लिए लिया था. औरंगज़ेब ही था जो जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए बाज़ार में जाता था. कुरआन लिखता था और उसके पैसे से खाता था.

anas
पत्रकारिता के क्षेत्र में मो.अनस आज किसी परिचय के मोहताज नही है, लेखन से लेकर समाज सेवा तक उन्होंने अमिट छाप छोड़ी है

उसकी सादगी और जनप्रियता का इससे बड़ा क्या सबूत होगा कि उसने जनता के पैसे का इस्तेमाल किसी भवन निर्माण या ऐयाशी में नहीं किया बल्कि सब लोगों पर खर्च कर दिया.
सड़क का नाम तो बदल देंगे ,औरंगज़ेब ने जो कुछ अपनी ज़िंदगी में किया है उसे कैसे मिटाएंगे ?

तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।


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