हिटलर को सिर्फ हिटलर की मूँछों और वर्दी में ढूँढने वाले वही ग़लती कर रहे हैं जो उस वक्त के कम्युनिस्टों ने की थी

ravishयहाँ रखा हर जूता अपने आप में एक लाश है। जैसे मार दिये जाने के बाद बहुत सी लाशें एक दूसरे के ऊपर लदी-फदी हैं। एक दूसरे से दबी पड़ी हैं। ये सिर्फ जूते नहीं हैं। कई दशकों बाद साठ लाख यहूदियों के शव सिकुड़ कर जूते जैसे हो गए हैं। इन शवों ने ख़ुद को जूते में बदल लिया है। मार दिये जाने के बाद राख़ में बदल दी गईं लाशों ने बड़ी चालाकी से अपने जूते छोड़ दिये हैं। आपको याद दिलाने के लिए कि हिटलर ने जो किया उससे हमारी मानवता इन जूतों में सिकुड़ गई है। अमरीका के वाशिंगटन शहर में होलोकास्ट पर बने संग्रहालय में आप इन जूतों को देखते हुए जूता बन जाते हैं। ये जूते आपको देखते हैं और आप इन जूतों को।

आप इन पंक्तियों को पढ़िये और फिर अपने जूते को हाथ में लीजिये और जूतों की इस ढेर में अपने जूते को रख दीजिये। आपकी आत्मा हिटलर और नात्ज़ी सेना के जूतों की थाप से दहल जानी चाहिए और अगर नहीं दहलती है तो एक बार फिर अपने जूतों को देखियेगा। पूछियेगा। कहीं आप हिटलर की नात्ज़ी सेना या विचारों के जूते तो नहीं हैं !

ऐसे अंधेरे गलियारों में हिटलर की क्रूर दास्तानों के निशान देखते हुए हम बढ़े जा रहे थे। गलियारों में अजब तरह की ख़ामोशी पसरी हुई थी। सिसकियों की आवाज़ से चौंकता रहा कि कौन हो सकता है जो रो रहा है। किसके लिए और क्यों रो रही है ?  सिसकियां सुनने का ऐसा अनुभव कभी हुआ नहीं। हम इन अनाम सिसकियों के साथ हिटलर की क्रूर यातनाओं से गुज़र रहे थे। किताबों में हिटलर के बारे में काफी पढ़ा हैं मगर उन किताबों में सिसकियों की आवाज़ दर्ज नहीं है। होलोकास्ट म्यूज़ियम में आने वाले लोगों की सिसकियाँ मेरे भीतर ठहर गई हैं।

कहीं हिटलर और नात्ज़ी सेना की जलाई हज़ारों किताबों के निशान हैं तो कहीं पुराने वीडियो चल रहे हैं जिसमें नात्ज़ी सेना के हत्यारा दस्तों की करतूतें हैं। लोग मर गए हैं और इन चलते फिरते वीडियो में आज भी मारे जा रहे हैं। हिटलर ने  शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर लोगों को अस्पतालों और पागलखानों से उठवा कर मार दिया। नस्ल की शुद्धता के नाम पर उसकी सेना ने उन जगहों पर धावा बोला जहाँ समलैंगिक हो सकते थे। उन्हें पकड़ा गया और मुक़दमे चलाए गए। समलैंगिकों को पकड़ने के लिए अलग से पुलिस में नौकरशाही टुकड़ी बनाई गई, जो समलैंगिकों और लेस्बियनों को पकड़ कर कंसंट्रेशन शिविरों में मारने के लिए भेज देती थी।

यहाँ समलैंगिकों, शारीरिक चुनौतियों का सामना करे लोगों,  मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के बारे में नहीं लिखा है कि वे कौन थे ? ज़ाहिर है वे सिर्फ यहूदी नहीं होंगे। जर्मन ही होंगे। हिटलर ने हज़ारों की संख्या में राजनीतिक विरोधियों का क़त्ल करवा दिया। वे भी यहूदी नहीं थे। कुछ कम्युनिस्ट थे तो कुछ सोशलिस्ट। ये बात इसलिए बता रहा हूँ कि जब भी समाज में नात्ज़ी विचारधारा जगह पाएगी वो मज़हब या नस्ल के नाम पर लाखों को मार देगी लेकिन विरोध की आवाज़ दबाने के नाम पर तथाकथित अपनों का भी ख़ून माँगेगी।

हिटलर के उभरने की सामाजिक आर्थिक परिस्थतियों से लेकर उसे अवतारपुरुष के रूप में स्थापित करने के तमाम प्रयासों का ज़िक्र है। हिटलर की सोच ने सिर्फ जर्मनी में क़त्लेआम नहीं कराया बल्कि यूरोप के दूसरे मुल्कों में भी यहूदियों के लिए क़त्लख़ाने खुल गए और उन्हें अलग बस्तियों में रखा जाने लगा जिन्हें ghetto कहा जाता है। भारत में इस शब्द का ख़ूब इस्तमाल होता है लेकिन यह शब्द किस ख़तरनाक मंज़र का गवाह है वाशिंगटन के होलोकास्ट संग्रहालय में आकर पता चला। जनवरी के महीने में मुंबई जा रहा था। एक लड़के ने रोक कर अपने शहर के कुछ स्कूलों के बारे में बताया कि एक राजनीतिक दल से जुड़े लोगों ने टेकओवर करने के बाद से टीचर से लेकर छात्रों के बीच से हमारे समाज को हटा दिया गया है। भारत में ये स्कूल अपवाद ही होंगे लेकिन हिटलर के दौर के जर्मनी में ठीक ऐसा हुआ था। यहूदियों के प्रति हिंसक नफरत एक दिन में पैदा नहीं हुई थी न ही हिटलर ने आकर पैदा कर दिया था। एक समाज या समुदाय को टारगेट करने की पूर्वाग्रहों की पुरानी परंपरा थी जिसे हिटलर के रूप में हथियार मिल गया था।

क्या हम भारत पाक विभाजन की क्रूर दस्तानों को रिकार्ड कर कोई म्यूज़ियम नहीं बना सकते थे !

यह संग्रहालय यहाँ आने वालों से एक सवाल करता है कि क्या आप इन क़िस्सों को और लोगों तक पहुँचायेंगे ? आपको एक बुकलेट दी जाती है जिसमें होलोकास्ट में मारे गए किसी एक यहूदी के जीवन के बारे में लिखा गया है। चारों तरफ से यातना शिविरों की यादों को दर्ज करने वाली आवाजें आ रही थीं। उन शिविरों से बचकर आए लोगों की आपबीती सुनाती इन आवाज़ों के लिए अलग से कमरा बना है जहाँ कुछ लोग बैठकर सुने जा रहे थे। चुपचाप। क्या हम भारत पाक विभाजन की क्रूर दस्तानों को रिकार्ड कर कोई म्यूज़ियम नहीं बना सकते थे !

कोई साधारण घटना नहीं है हिटलर का उदय

The rise of Hitler is not an ordinary incident

हिटलर का उदय कोई साधारण घटना नहीं है। उसका आना सिर्फ तात्कालिक कारणों की वजह से नहीं हुआ। हिटलर होना उस सोच का मंज़िल पर पहुँचना है जो कई पीढ़ियों से हमें वहशी बनाते रहती है। कई बार हिटलर हमारे आसपास तरह तरह के रूपों में होता है और कई बार साक्षात और संपूर्ण हिटलर भी आ जाता है। हिटलर सिर्फ हिटलर में नहीं होता है। हिटलर सिर्फ यहूदियों के ख़िलाफ़ नहीं होता है। आज की दुनिया ही देख लीजिये। हर युग में लोकतंत्र और फ़र्ज़ी जनादेशों और प्रचार प्रसार के नए नए तरीक़ों का इस्तमाल कर हमारे बीच में हिटलर आता है। आज भी आता है। हम उस हिटलर को देखकर आँखें बंद कर लेते हैं कि ये वैसा हिटलर नहीं है। जैसे हिटलर का होना कोई तय फ़ार्मूला हो। भारत में तो हिटलर दीदी नाम जैसे सीरीयलों से हिटलर मान्यता भी प्राप्त कर लेता है। वो पहले क्यूट बनकर आता है फिर अनुशासन का प्रतीक बनता है और फिर तानाशाह। हिटलर को सिर्फ हिटलर की मूँछों और वर्दी में ढूँढने वाले वही ग़लती कर रहे हैं जो उस वक्त के कम्युनिस्टों ने की थी। कभी भी हिटलर के बन जाने की परिस्थितियों को गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा कम्युनिस्ट भी बड़ी संख्या में मारे गए लेकिन वे कभी अपनी इस चूक को नहीं समझ सके। कम्युनिस्ट सोशलिस्ट आज भी इस चूक को दोहराते आ रहे है। तब तो उनकी ताकत थी अब तो वे कुछ भी नहीं है। यातनाओं की ऐसी दास्ताने उनके यहाँ भी थी। स्टैलिन क्या था ? देवता !

संग्रहालय में गुज़रते रहना किसी यातना से कम नहीं है। जब भी आप यहाँ रखी तस्वीरों और सामानों से सामान्य होते हैं, अग़ल बगल से किसी के सुबुकने की आवाज़ आपको पहचान लेती है। पूछती है कि कहीं तुम तो नहीं थे जो उस वक्त चुप रह गए और आज भी चुप रह जाते हो। कनसंट्रेशन कैंप में लोगों के लाए जाने, उनके कपड़े उतार कर, खास तरह के स्नान के बाद गैस चेंबर में ले जाने की तस्वीरों और मूर्तियों से उन यातनाओं को जीवंत किया गया है। जो मारा जाने वाला था उसी से क़ब्र भी खुदवा ली जाती थी। बाकी लाशों को सामूहिक रूप से मशीन के ज़रिये जला दिया जाता था।

होलोकास्ट म्यूज़ियम देखते समय ये जरूर ख़्याल आया कि भारत में सिख नरसंहार, गोधरा कांड,गुजरात दंगे, भागलपुर से लेकर हाशिमपुरा से लेकर दलित हत्याकांडों का भी संग्रहालय होना चाहिए ताकि हम अपने भीतर की क्रूरता को पहचान सकें। अहमदाबाद में ऐसा कुछ प्रयास हुआ है। मारे गए लोग सिर्फ मुआवज़ा और कांग्रेस बीजेपी की राजनीति के सामान बनकर रह गए हैं। हम उन हत्याकांडों और नरसंहारों से कुछ नहीं सीखते। पहले से बेहतर नहीं हो पाते बल्कि पहले जैसा ही रह जाते हैं। इन हिंसक घटनाओं को सिर्फ मरने वालों की संख्या से नहीं समझा जा सकता।

क्या तुम इस हिंसा को रोक सकते थे ? क्या तुम अब रोक सकते हो?

You could’ve stopped this violence?

इन अनाम और अनगिनत तस्वीरों से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। दरअसल ये तस्वीरें मेरे देखने के लिए नहीं हैं बल्कि  इसलिए लगाई गई हैं ताकि ये हम जैसों को देख सकें। किसी में हँसता खेलता बचपन है तो किसी में खिलखिलाती जवानी। सबकी आँखें आपको जी भर कर देखती हैं। आपको आख़िरी बार के लिए प्यार करती हैं। आपसे एक और बार के लिए मदद माँगती हैं। क्या तुम इस हिंसा को रोक सकते थे ? क्या तुम अब रोक सकते हो?  यहाँ आकर लगा कि चलने के लिए पाँवों पर ज़ोर देना पड़ रहा है। सब चुप हैं, स्तब्ध हैं तभी किसी के सिसिकने की आवाज़ आती है। अब मैं मुड़कर नहीं देखता। समझने लगा हूँ कि कोई है जो रो रहा है। रोते हुए बेहतर हो रहा है।

एक बुरा सपना था हिटलर

Hitler was a nightmare

हिटलर एक बुरा सपना था। वो जीते जी किंवदंतियाँ बनता रहा। नस्ल और मुल्क को गौरवशाली वर्तमान और भविष्य देने के नाम पर ख़ून करता रहा। उसने ख़ूनियों की नात्ज़ी सेना बनाई। अपने दल के लिए निष्ठावान समर्थक पैदा किये। आज भी ऐसे समर्थक मिल जाते हैं जो अलग अलग देशों में अपने नेता को अवतार पुरुष के रूप में स्थापित करने के काम में लगे हैं। वो विरोधियों की निशानदेही करते हैं। विरोध की आवाज़ को दबाने की नीति का समर्थन करते हैं। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिकायत नहीं है। बस उनका ग़ुरूर तोड़ देना चाहता हूँ कि इतिहास में ऐसे ख़ूनी पहले भी हुए हैं और ठीक यही काम कर चुके हैं।अफ़सोस कि ऐसे ख़ूनी अलग अलग जगहों पर दोबारा लौट आते हैं। आप नीचे की तस्वीर में जो लिखा है उसे पढ़ियेगा। आपकी सुविधा के लिए इसका सार लिख देता हूँ। यही लिखा है कि हिटलर ने स्कूलों से लेकर बाज़ारों तक से यहूदियों का बहिष्कार करवाया। उनके उत्पाद लूट लिये गए और जलाए गए। उनके उत्पादों का बहिष्कार ठीक वैसे ही किया गया जैसे कुछ लोग किसी की फ़िल्म के बहिष्कार का एलान करते हैं और समर्थन करते हैं। अगर आप ऐसे लोगों में से है तो आपको मैग्निफाइंग ग्लास से पढ़ना चाहिए कि इसमें क्या लिखा है।

क्या भारत को एक हिटलर चाहिए ?

What India needs a Hitler?

कभी कभी जीवन में ख़ुद से कुछ सवाल करने चाहिए। क्या आपको हिटलर में कोई ख़ूबी नज़र आती है ? क्या आपने कभी कहा है कि भारत को एक हिटलर चाहिए ? कोई हिटलर ही इस देश को ठीक कर सकता है ? क्या आपको किसी ख़ास वक्त में लगता है कि हिटलर जैसा नेता होना चाहिए ? क्या आप किसी की तारीफ़ में कहते हैं कि बिल्कुल हिटलर जैसा है या जैसी है ? उसके आदेश या मर्ज़ी के बिना कोई टस से मस नहीं कर सकता। क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया है कि हिटलर ने मानवता के साथ क्या किया ? अगर आप किसी भी कारण से हिटलर को पसंद करते हैं ? क्या आपने कभी ऐसा कहा है या सोचते हैं कि अगर ख़ास तरह का समुदाय न हो या उसे सामूहिक रूप से अलग-थलग कर देना चाहिये ? उस समुदाय पर तरह तरह के नियंत्रण होने चाहिए वरना वो एक दिन आपके समुदाय के लिए ख़तरा हो सकता है ?

ये मैंने कुछ सवालों के टेस्ट बनाए हैं। अगर मेरे सवालों का जवाब आप हाँ में देते हैं तो आपको डाक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं। आप जैसे बीमार लोग राजनीति के लिए ख़तरा हो सकते हैं। आप मानवता के हत्यारों को पसंद करने लगे हैं लिहाज़ा आपके भीतर हिटलर जैसी आपराधिक प्रवृत्ति घर कर गई है। यह बीमारी आपको कभी भी हिंसक भीड़ में बदल सकती है और आप हत्यारे हो सकते हैं। जब भी कभी आप हिटलर की तारीफ़ करें या आपके आसपास कोई और करे तो समझियेगा कि वो या आप बीमार हैं और अपनी अधकचरी समझ के चलते देश में स्वर्ण युग लाने के नाम पर समाज से लेकर लोकतंत्र का बेड़ा गर्क़ करने वाले हैं। ऐसे लोगों को सहानुभूति के अलावा अच्छी किताबों की सख़्त ज़रूरत है। इन मूर्खों से दूर रहें और अगर आपके भीतर मूर्खता के ऐसे तत्व हैं तो आप ख़ुद से भी दूर हो जाएँ।

मेरे मित्र ने कहा कि किसी समाज के लिए इस स्तर पर नस्ली हिंसा की स्मृतियों से गुज़रना भयावह है और कभी भूलना भी नहीं चाहिए लेकिन जब इसे इज़रायल और फ़िलिस्तीन के संघर्ष के चश्मे से देखता हूँ तो एक सवाल उठता है कि किसने किससे क्या सीखा। उसका भी शुक्रिया जो मुझे यहाँ तक ले गई। शुक्रिया ऋचा।

अंत में होलोकास्ट म्यूज़ियम में लगी इस तस्वीर को देखिये। जो लिखा है उसे ग़ौर से पढियेगा। एक सवाल अपने आप से पूछियेगा कि कहीं आप या हम इन पड़ोसियों की तरह तो नहीं हैं ?  कहीं आपका बच्चा इन पड़ोसियों की तरह तो नहीं हैं ? कहीं आपने उसे इन पड़ोसियों की तरह तो नहीं बना दिया ?  कहीं आपके नाते रिश्तेदारों में इन पड़ोसियों की तरह तो नहीं है जो ऐसी हिंसा में शामिल रहे हैं ? सहायक रहे हैं ? क्या आप ऐसे किसी को जानते हैं ? अगर हाँ तो उससे जानकारी लीजिये और नाम बदलकर ही सही, उसके बारे में लिखिये। लोगों को बताइये।

रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा से साभार


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