प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में कामोव 226टी के निर्माण के लिए अनिल अम्बानी की कंपनी रिलायंस डिफेन्स को चुना था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस सम्बन्ध में रूसी सरकार से सरकारी स्तर पर बातचीत भी चल रही थी। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग ने 15 दिसंबर को ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता को दर्शाने वाली एक रिपोर्ट ने रिलायंस डिफेंस को कामोव 226 टी के साझा निर्माण की जिम्मेदारी सौंप दी थी।

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस रिपोर्ट में, “ रूस की सरकार ने करीब 200 कामोव 226 टी के साझा निर्माण के लिए रिलायंस डिफेंस एंड एयरोस्पेस का चुनाव किया, किन्तु मोदी व उनके रणनीतिकारों की रूस सरकार के सामने उनकी कोई बात नहीं चली। उस प्रस्ताव को ख़ारिज करते हुएरूस की कंपनी रोसटेक ने भारत में कामोव 226टी के निर्माण के लिए हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को अपना साझीदार चुना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस जाने वाले मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के प्रतिनिधि-मंडल में रिलायंस डिफेंस के अनिल अंबानी भी शामिल थे और अम्बानी यह उम्मीद कर रहे थे कि उन्ही की कंपनी को हेलीकाप्टर बनाने का कार्य मिलेगा।

मीडिया में आई खबरोंके मुताबिक जब रशियन कंपनी को इस बात की जानकारी हुई कि रिलायंस कंपनी को कार्य करने का कोई अनुभव नहीं है, उस पर ऋण काफी ज्यादा है। रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस पावर और रिलायंस कम्युनिकेशन जैसी कंपनियों पर कर्ज काफी ज्यादा है। यह राज भी खुला कि रिलायंस अपने पावर, रोड और सीमेंट जैसे कुछ उद्यमों को बेचने की कोशिश कर रहा है। कंपनी के पास 200 हेलिकॉप्टर बनाने के लिए वित्तीय पूँजी नहीं है।

मीडिया में आई खबरोंके मुताबिक भारतीय रक्षा मंत्रालय के अधीन थिंक टैंक आई डी एस ए के उपमहानिदेशक रूमेल दहिया कहते हैं,“रिलायंस डिफेंस के पास किसी भी तरह का अनुभव नहीं है। नए सिरे से अगर साझा करते हैं तो उसको टेक्नोलॉजी समझने में दिक्कत होगी। एच ए एल को रूस निर्मित हथियारों को बनाने का काफी अनुभव है। मिग सीरिज के हवाई जहाजों  के अलावा चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों  पर काम किया है। मौजूदा समय में ध्रुव हेलिकॉप्टर पर काम कर रहे हैं। जबकि रिलायंस के पास इस तरह के काम का कोई अनुभव नहीं है”।

कहा जा रहा है कि इसके अलावा अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप की खराब वित्तीय हालात भी साझीदार नहीं बन पाने में बड़ा कारण है। रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 25 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। भारत की कंपनियों से जुड़ी जानकारी इकठ्ठा करने वाली कैपिटल लाइन के द्वारा जारी एक आंकड़े के मुताबिक अनिल अंबानी के अधीन कंपनियों पर कुल कर्ज एक लाख 14 हजार करोड़ रुपए के करीब है।

उधर हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के उपर किसी तरह का कर्ज नहीं है और जरूरत पड़ने पर सरकार कंपनी को मदद दे सकती है।

हमारे प्रधानमंत्री जी अनिल अम्बानी से लेकर टाटा तक मदद करने के लिए बेताब हैं और उनकी सारी विदेश यात्राओं का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि यहाँ की बड़ी कर्जदार मल्टी नेशनल कंपनियों को विदेशों के प्रोजेक्ट भारत में दिलाये जा सकें, देश के सार्वजानिक उद्योगों को चाहे नष्ट करना पड़े। प्राइवेट कम्पनियाँ उस काम को करने की माहिर भी न हो, लेकिन काम उन्हीं से कराया जायेगा ताकि जो फायदा हो वह उन कंपनियों को हो, देश को नहीं। मोदी साहब की यह नीति कौन सी नीति है इसका खुलासा सरकार को करना चाहिए। अगर इस तरह की नीतियां जारी रही तो निश्चित रूप से देश का भला नहीं होगा। वहीँ उनका थिंक टैंक देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति की कौन से परिभाषा इन कामों के लिए तय कर रहा है?

रणधीर सिंह सुमन

साभार – हस्तक्षेप डॉट कॉम


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